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॥ अष्टसखा कीर्तन: श्रीनाथ जी की शरण ॥

 

दोहा:

वल्लभ सुत विट्ठल भजे, अष्टछाप सुखधाम।

श्री गिरधर की सेवा में, आठों सखा ललाम॥

 

पद:

कलिजुग में गोवर्धन राजा, अष्ट सखा संग सोहे।

श्रीनाथ जी के कीर्तन सुनिके, त्रिभुवन को मन मोहे॥

 

सूरदास जब वीणा साधे, वात्सल्य की धार बहे।

‘अष्टछाप के जहाज’ चले जब, श्याम प्रेम रस माँझ रहे॥

 

कुंभनदास स्वाभिमान जगावें, सीकरी को त्याग दियो।

गिरिराज की तलहटी में, अपना जीवन वार दियो॥

 

परमानंद के मधुर पदों में, परम आनंद समायो है।

कृष्णदास ने मंदिर को, अधिकारी बन सजायो है॥

 

नंददास ‘जड़िया’ कवि सुंदर, रास की लीला गावत हैं।

शब्द-शब्द में शब्द गढ़ें वे, भक्ति की ज्योत जगावत हैं॥

 

गोविंदस्वामी राग सुनावे, तानसेन भी हार गये।

कदम्ब खंडी की शीतल छाया, कृष्ण प्रेम में तार गये॥

 

छीतस्वामी मथुरा तजकर, विट्ठल पद रज चाही है।

भक्त भये वे ऐसे अनूठे, जग में महिमा छाई है॥

 

चतुर्भुजदास सुपुत्र पिता के, भक्ति प्रताप दिखाते हैं।

द्वादश यश की पावन वाणी, गोवर्धन में गाते हैं॥

 

वल्लभाचार्य बीज बोयो, विट्ठल उसे बढ़ायो है।

पुष्टिमार्ग की पावन गंगा, अष्ट सखा ने बहायो है॥

 

जय जय श्री गोवर्धन वासी, जय जय अष्ट सखा अनूप।

 

 

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