कुंभनदास: अष्टछाप के प्रथम और परम स्वाभिमानी कवि
परिचय और पृष्ठभूमि
कुंभनदास जी अष्टछाप के कवियों में सबसे वरिष्ठ थे। उनका जन्म संवत् १५२५ (सन् १४६८) के आसपास गोवर्धन (मथुरा) के पास ‘जमुनावत’ गाँव में हुआ था। वे एक संपन्न किसान परिवार से थे, लेकिन उनका मन सदैव गिरधर की भक्ति में रमा रहता था। उन्होंने सन् १४९२ में महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से दीक्षा ली थी।
अकबर और कुंभनदास: “संतन को कहाँ सीकरी सों काम?”
कुंभनदास जी के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना मुग़ल सम्राट अकबर से जुड़ी है। जब अकबर ने उनकी प्रसिद्धि सुनी, तो उन्हें फतेहपुर सीकरी आने का निमंत्रण भेजा। कुंभनदास जी को सांसारिक चकाचौंध से विरक्ति थी, लेकिन सम्राट का आदेश टाल न सके। वहाँ पहुँचने पर जब अकबर ने उनसे कुछ सुनाने का आग्रह किया, तो उन्होंने जो पद गाया, वह हिंदी साहित्य में ‘स्वाभिमान की अमर वाणी’ बन गया:
“संतन को कहाँ सीकरी सों काम?
आवत जात पनहियाँ टूटीं, बिसरि गयो हरि नाम।
जाको मुख देखे दुख उपजत, ताको करनो परी प्रनाम॥”
(अर्थात: संतों का राजदरबार से क्या लेना-देना? यहाँ आने-जाने में मेरी जूतियाँ टूट गईं और भगवान का नाम भी भूल गया। जिसे देखने मात्र से दुःख होता है, उसे प्रणाम करना पड़ रहा है।)
अकबर उनकी इस निर्भीकता और सच्ची भक्ति से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उन्हें बहुत धन-दौलत देनी चाही, लेकिन कुंभनदास ने उसे विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया।
काव्यगत विशेषताएँ
कुंभनदास जी ने केवल ‘पद’ शैली में रचना की। उनके पदों में बनावटीपन या अलंकारों का बोझ नहीं है; उनमें एक भक्त के हृदय की सहज पुकार है। उनके पदों का मुख्य विषय कृष्ण की बाल-लीला और निकुंज-लीला है।
संगीत प्रेम: वे संगीत के मर्मज्ञ थे और श्रीनाथ जी के सम्मुख राग-रागिनियों में पद गाते थे।
रचना संसार: उनका कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं मिलता, लेकिन उनके लगभग ५०० पद ‘कुंभनदास के पद’ के नाम से संकलित हैं।
विरक्ति और महाप्रयाण
कुंभनदास जी इतने विरक्त थे कि उन्होंने जीवन भर गोवर्धन और श्रीनाथ जी के मंदिर का साथ नहीं छोड़ा। वे कहते थे कि भगवान के मुखारविंद के दर्शन के बिना उन्हें कहीं चैन नहीं मिलता। संवत् १६४० के आसपास उन्होंने अपनी देह त्यागी।