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अंडमान-निकोबार की ६ प्रमुख जनजातियाँ: आदिम मानव सभ्यता का जीवित दस्तावेज़ और उनका प्रजातीय वर्गीकरण

 

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और नीले समंदर के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह मानव इतिहास, नृविज्ञान (Anthropology) और आदिम सभ्यताओं का एक ऐसा जीवंत संग्रहालय है, जो सदियों से बाहरी दुनिया की चकाचौंध से दूर अपनी मूल अस्मिता को बचाए हुए है। इस सुदूर द्वीप समूह में कुल ६ प्रमुख जनजातियाँ (Tribes) निवास करती हैं। मानवविज्ञानियों ने इनके शारीरिक गठन, इतिहास और भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर इन्हें दो मुख्य प्रजातीय (Racial) समूहों में विभाजित किया है:

 

नेग्रिटो समूह (Negrito Tribes): अंडमान द्वीपों के प्राचीन शिकारी

यह समूह मुख्य रूप से अंडमान के द्वीपों में पाया जाता है। नृविज्ञानियों का मानना है कि इनका ऐतिहासिक और आनुवंशिक (Genetic) संबंध अफ्रीका के प्राचीन मानव समूहों से रहा है। ये आज भी आधुनिक कृषि से दूर, पूरी तरह शिकार और प्रकृति के उत्पादों के संग्रहण (Hunter-Gatherers) पर निर्भर हैं। इस समूह में ४ प्रमुख जनजातियाँ आती हैं:

जारवा (Jarawa): ये मुख्य रूप से दक्षिण और मध्य अंडमान के घने सदाबहार जंगलों में निवास करते हैं। एक समय बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे रहने वाले जारवा अब धीरे-धीरे सीमित संपर्क में आ रहे हैं, लेकिन उनकी जीवनशैली आज भी प्रकृति से जुड़ी है।

सेंटिनली (Sentinelese): इन्हें दुनिया की सबसे अधिक अलग-थलग और रहस्यमयी जनजाति माना जाता है। ये ‘उत्तरी सेंटिनल द्वीप’ पर रहते हैं। आधुनिक समाज से इनका संपर्क बिल्कुल शून्य है और ये बाहरी दुनिया के किसी भी हस्तक्षेप को तीर-धनुष से कड़ा जवाब देते हैं। भारत सरकार भी इनकी निजता का पूरा सम्मान करती है।

ग्रेट अंडमानी (Great Andamanese): ब्रिटिश काल में यह सबसे बड़ी जनजाति हुआ करती थी, लेकिन बीमारियों और संघर्ष के कारण इनकी आबादी तेजी से घटी। वर्तमान में ये मुख्य रूप से ‘स्ट्रेट आइलैंड’ (Strait Island) पर सरकार की देखरेख में रह रहे हैं और अपनी भाषा व अस्तित्व को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं।

ओंगे (Onge): ये ‘लिटिल अंडमान’ (Little Andaman) द्वीप के आंतरिक हिस्सों में निवास करते हैं। यह समुदाय भी अपनी अनूठी लोक-संस्कृति, कला और पारंपरिक जड़ी-बूटियों के ज्ञान के लिए जाना जाता है।

 

मंगोलोयड समूह (Mongoloid Tribes): निकोबार के कुशल कृषक

यह समूह मुख्य रूप से निकोबार द्वीप समूह में निवास करता है। इनका शारीरिक गठन, नैन-नक्श और सांस्कृतिक ताना-बाना दक्षिण-पूर्वी एशिया (जैसे म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया) से काफी मिलता-जुलता है। नेग्रिटो समूह के विपरीत, ये जनजातियाँ खेती, बागवानी (जैसे नारियल और सुपारी) और पशुपालन (विशेषकर सुअर पालन) में काफी कुशल हैं। इस समूह में २ प्रमुख जनजातियाँ आती हैं:

निकोबारी (Nicobarese): यह इस पूरे द्वीप समूह की सबसे बड़ी जनजातीय आबादी है। ये मुख्य रूप से ‘कार निकोबार’ द्वीप पर रहते हैं। यह समुदाय काफी प्रगतिशील है, शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली को अपना चुका है और मुख्यधारा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

शोम्पेन (Shompen): ये ‘ग्रेट निकोबार’ के आंतरिक जंगलों और नदियों के किनारों पर रहते हैं। शोम्पेन बेहद शर्मीले स्वभाव की अर्ध-खानाबदोश (Semi-Nomadic) जनजाति है, जो मुख्य रूप से जंगली फलों के संग्रहण और छोटे-मोटे शिकार पर निर्भर है।

 

विशेष सुरक्षा श्रेणी: पीवीटीजी (PVTG) का सुरक्षा कवच

इन ६ जनजातियों में से निकोबारी जनजाति को छोड़कर बाकी सभी ५ जनजातियों (जारवा, सेंटिनली, ग्रेट अंडमानी, ओंगे और शोम्पेन) को भारत सरकार द्वारा ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह’ (PVTGs – Particularly Vulnerable Tribal Groups) का दर्जा दिया गया है।

इस दर्जे का मुख्य कारण इनकी बेहद कम और लगातार घटती आबादी, आधुनिक बीमारियों के प्रति अति-संवेदनशीलता और साक्षरता की बेहद कम दर है। सरकार इनके क्षेत्रों को ‘ट्राइबल रिज़र्व’ घोषित करके इनके जल, जंगल और ज़मीन की कड़ाई से सुरक्षा करती है, ताकि आदिम सभ्यता की ये अमूल्य कड़ियाँ हमेशा सुरक्षित रहें।

 

निष्कर्ष: विविधता का महासागर

अंडमान-निकोबार की ये जनजातियाँ हमें याद दिलाती हैं कि विकास की अंधी दौड़ के बीच भी इंसान और प्रकृति का वह पुराना, आत्मीय रिश्ता आज भी जीवित है। नेग्रिटो का शिकार-संग्रहण और मंगोलोयड का कृषि-कौशल मिलकर भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक विविधता को एक नया और अनूठा क्षितिज प्रदान करते हैं।

धन्यवाद!

 

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