images (4)

पंजाब का वो दशक, व्यवस्था का द्वंद्व और सिनेमा का सच

एक विस्तृत और निष्पक्ष केस स्टडी: उग्रवाद के उदय से लेकर वर्तमान पंजाब की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और सिनेमाई नैरेटिव का विश्लेषण।

 

प्रस्तावना: इतिहास की खिड़की और सिनेमा का चश्मा 

जुलाई 2026 में ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज़ हुई फिल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम: पंजाब ’95 / कल्लू गेरा) ने स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे जटिल और दर्दनाक अध्याय की राख को एक बार फिर कुरेद दिया है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के खोजी अभियान और उनकी शहादत पर आधारित है। परंतु, यदि हम भारत के इस सीमावर्ती राज्य के उस पूरे दौर को केवल 164 मिनट की एक फिल्म के चश्मे से देखेंगे, तो इतिहास के प्रति घोर अन्याय होगा।

पंजाब का उग्रवाद का दौर (1980-1995) कोई एकआयामी (One-dimensional) घटना नहीं थी। यह राजनीतिक अवसरवाद, सीमा पार की साजिशों, चरमपंथी बर्बरता, और राज्य द्वारा आतंकवाद को कुचलने के नाम पर की गई अभूतपूर्व ज्यादतियों का एक अत्यंत धुंधला और जटिल ‘ग्रे एरिया’ (Grey Area) था। यह आलेख बिना किसी राजनीतिक झुकाव के, उस पूरे दशक की एक ईमानदार और तटस्थ केस स्टडी प्रस्तुत करता है।

 

भाग अ: बारूद की बुनियाद — पंजाब में उग्रवाद का उदय और कारण पंजाब में उग्रवाद की शुरुआत रातों-रात नहीं हुई। इसकी जड़ें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असंतोष में गहरी धंसी हुई थीं:

१. हरित क्रांति के बाद का सामाजिक-आर्थिक संकट: 1960 और 70 के दशक की ‘हरित क्रांति’ ने पंजाब को आर्थिक रूप से समृद्ध तो बनाया, लेकिन इसके दूरगामी दुष्परिणाम भी सामने आए। कृषि में मशीनीकरण के कारण ग्रामीण युवा बड़े पैमाने पर बेरोजगार होने लगे। भूमि का असमान वितरण बढ़ा और छोटे किसान कर्ज के जाल में फंस गए। इस बेरोजगार और हताश युवा वर्ग को धार्मिक कट्टरपंथ ने आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर लिया।

२. राजनीतिक उपेक्षा और ‘आनंदपुर साहिब प्रस्ताव’ (1973): सिखों की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी ‘शिरोमणि अकाली दल’ ने पंजाब को अधिक स्वायत्तता (Autonomy), चंडीगढ़ को पूरी तरह पंजाब में शामिल करने, और नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर ‘आनंदपुर साहिब प्रस्ताव’ पारित किया। तत्कालीन केंद्र सरकार (कांग्रेस) ने इन मांगों को अलगाववादी मानकर खारिज कर दिया, जिससे दिल्ली और पंजाब के बीच कड़वाहट की खाई चौड़ी हो गई।

३. जरनैल सिंह भिंडरावाले का उभार और दिल्ली का अवसरवाद: इतिहासकार मानते हैं कि अकाली दल के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने के लिए शुरुआत में कांग्रेस के कुछ धड़ों ने दमदमी टकसाल के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाले को परोक्ष रूप से बढ़ावा दिया। परंतु, जल्द ही भिंडरावाले एक अनियंत्रित शक्ति बन गए। उन्होंने सिखों के सशस्त्र सशक्तीकरण की बात शुरू की, जिसने आगे चलकर उग्रवाद का रूप ले लिया।

४. ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 का खूनी मोड़: जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में छिपे उग्रवादियों को निकालने के लिए भारतीय सेना द्वारा चलाया गया ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। अकाल तख्त का ढहना और स्वर्ण मंदिर पर गोलाबारी ने आम सिखों की धार्मिक भावनाओं को गहरे जख्म दिए। इसके कुछ महीनों बाद अक्टूबर 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या और उसके बाद दिल्ली व देश के अन्य हिस्सों में हुए सिख विरोधी दंगों ने पंजाब के युवाओं को पूरी तरह से हथियार उठाने और ‘खालिस्तान’ के सशस्त्र आंदोलन की ओर धकेल दिया।

 

भाग ब: आतंकवाद का खूनी दौर और उग्रवादियों की बर्बरता अक्सर मानवाधिकारों की बहसों में उग्रवादियों द्वारा की गई हिंसा को पृष्ठभूमि में धकेल दिया जाता है, जबकि तटस्थता की मांग है कि उनके द्वारा मचाई गई तबाही का भी पूरा ब्योरा दर्ज हो:

१. निर्दोष नागरिकों का कत्लेआम: खालिस्तानी उग्रवादी गुटों (जैसे बब्बर खालसा, भिंडरावाले टाइगर फोर्स, खालिस्तान लिबरेशन फोर्स) ने पंजाब में खौफ का राज स्थापित किया। बसों और ट्रेनों से गैर-सिख (हिंदू) यात्रियों को उतारकर कतारों में खड़ा करके गोलियों से भून दिया गया। इसके परिणामस्वरूप हजारों हिंदू व्यापारी और परिवार अपनी जान बचाकर पंजाब से पलायन करने को मजबूर हुए।

२. मध्यममार्गी सिखों और नेताओं की हत्याएं: उग्रवादियों ने केवल हिंदुओं को ही नहीं, बल्कि उन उदारवादी और शांतिप्रिय सिखों को भी निशाना बनाया जिन्होंने हिंसा का विरोध किया। पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह, कम्युनिस्ट नेता, पत्रकार, और यहाँ तक कि आम सिख किसान जो उग्रवादियों को अपने घरों में शरण देने से मना करते थे, उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई।

३. सामाजिक पतन और ‘तालिबानी’ फरमान: 1980 के दशक के उत्तरार्ध तक उग्रवादी आंदोलन में अपराधियों और जबरन वसूली करने वाले गिरोहों की एंट्री हो चुकी थी। गांवों में जबरन वसूली (Protection Money) आम बात हो गई थी। उग्रवादियों ने महिलाओं के पहनावे (जैसे सलवार-कमीज अनिवार्य करना) और शादियों में मांस-शराब पर प्रतिबंध लगाने जैसे दकियानूसी ‘तालिबानी’ फरमान जारी करना शुरू कर दिया था। ग्रामीण महिलाओं के साथ यौन शोषण और अभद्रता की घटनाओं ने आम पंजाबी जनता का उग्रवादियों से मोहभंग कर दिया, जो अंततः उनके पतन का सबसे बड़ा कारण बना।

४. सीमा पार (पाकिस्तान) का समर्थन: इस पूरे आंदोलन को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) द्वारा हथियारों, पैसों और सुरक्षित पनाहगाहों के जरिए हवा दी जा रही थी, ताकि भारत को ‘हजारों जख्मों से लहूलुहान’ (Bleed India by a Thousand Cuts) किया जा सके।

 

भाग स: पंजाब पुलिस का रिपोर्ट कार्ड — ‘अच्छे कार्य’ बनाम ‘काले कारनामे’ उग्रवाद को कुचलने में पंजाब पुलिस की भूमिका इतिहास का सबसे विवादित पन्ना है। उनके कार्यों को दो स्पष्ट श्रेणियों में देखा जाना चाहिए:

१. सकारात्मक पक्ष (अच्छे कार्य): आतंकवाद का खात्मा और शांति की बहाली

जब 1980 के दशक में पंजाब पुलिस पूरी तरह डिमोटिवेट हो चुकी थी, तब महानिदेशक (DGP) जे.एफ. रिबेरो और उनके बाद के.पी.एस. गिल (K.P.S. Gill) ने कमान संभाली।

क. ‘गोली का जवाब गोली से’ (Bullet for Bullet): रिबेरो द्वारा शुरू की गई और केपीएस गिल द्वारा कठोरता से लागू की गई इस नीति ने पुलिस बल में नया जोश भरा। पुलिस अधिकारियों ने अपनी और अपने परिवारों की जान दांव पर लगाकर आतंकवाद का मुकाबला किया। उग्रवादियों ने पुलिसकर्मियों के परिवारों को भी नहीं बख्शा था, लेकिन इसके बावजूद पुलिस डटी रही।

ख. शांति और लोकतांत्रिक बहाली: ऑपरेशन ब्लैक थंडर (1988) के जरिए पुलिस ने बिना स्वर्ण मंदिर को नुकसान पहुंचाए उग्रवादियों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया। पुलिस की इसी आक्रामक रणनीति के कारण 1992 में पंजाब में विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके और एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार सत्ता में आई, जिसने उग्रवाद की कमर तोड़ दी।

 

२. नकारात्मक पक्ष (काले कारनामे): मानवाधिकारों का हनन और राज्य प्रायोजित आतंक

आतंकवाद को खत्म करने की अंधी दौड़ में कानून और संविधान को ताक पर रख दिया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाओं ने इस पर विस्तृत रिपोर्ट जारी की थीं:

क. फर्जी मुठभेड़ (Fake Encounters) और ‘लावारिस’ लाशें: जैसा कि जसवंत सिंह खालरा ने उजागर किया और बाद में सीबीआई (CBI) ने प्रमाणित किया—पुलिस ने हजारों सिख युवकों को अवैध रूप से हिरासत में लिया, उन्हें टॉर्चर कर मार डाला, और फिर उनके शवों को श्मशान घाटों में ‘अज्ञात’ या ‘लावारिस’ बताकर गुप्त रूप से जला दिया। अमृतसर और तरनतारन के श्मशान घाटों के रजिस्टरों में ‘अज्ञात शव, पुलिस द्वारा लाए गए’ की प्रविष्टियां इसका सबसे बड़ा दस्तावेजी सबूत बनीं।

ख. कैश और प्रमोशन का खूनी खेल: उग्रवादियों के सिर पर रखे गए नकद इनामों को हड़पने के लिए पुलिस ने निर्दोष नागरिकों को मारना शुरू कर दिया। हथियारों की री-साइकलिंग (एक ही गुप्त हथियार को बार-बार लाशों के पास प्लांट करना) पुलिस की मानक कार्यप्रणाली (SOP) बन गई थी।

ग़. ‘पुलिस कैट्स’ की क्रूरता: आत्मसमर्पण कर चुके अपराधियों को पुलिस ने गुप्त विंग ‘कैट्स’ में शामिल किया, जिन्होंने आम जनता पर बेइंतहा जुल्म ढाए ताकि पुलिस को मनमर्जी करने का बहाना मिलता रहे।

 

भाग द: पंजाब की दुर्दशा से आज के पंजाब तक का सफर एक दशक की हिंसा ने देश के सबसे समृद्ध राज्य को एक ऐसे गहरे गर्त में धकेल दिया, जिससे वह आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है:

१. आर्थिक पतन (The Economic Toll)

क. औद्योगिक पलायन: उग्रवाद के दौरान पंजाब से बड़ी मिलें और उद्योग (जैसे होजरी और टेक्सटाइल) शिफ्ट होकर पड़ोसी राज्यों (हरियाणा, हिमाचल और उत्तर प्रदेश) में चले गए।

ख. कृषि का ठहराव: अशांति के कारण किसानों का दीर्घकालिक कृषि तकनीकों में निवेश 17% तक घट गया, जिससे पंजाब की कृषि विकास दर धीमी पड़ गई। राज्य पर भारी कर्ज का बोझ लाद दिया गया, क्योंकि सुरक्षा बलों के रख-रखाव का पूरा खर्च पंजाब के राजस्व से काटा गया।

२. सामाजिक ताने-बाने का बिखराव और आज की स्थिति

क. नशे का जाल (Drug Menace): बंदूकें तो शांत हो गईं, लेकिन 2000 के दशक के बाद पंजाब में ‘नशे’ (Chitta/Drugs) का एक नया और भयानक दौर शुरू हुआ। बेरोजगार युवाओं को, जो कभी आतंकवाद की ओर मुड़े थे, अब ड्रग्स के दलदल में धकेल दिया गया।

ख. पलायन (Donkey Route/Immigration): आज के पंजाब का युवा राज्य में भविष्य न देखकर भारी कर्ज लेकर कनाडा, यूके और ऑस्ट्रेलिया भाग रहा है। पंजाब के गांवों में केवल बुजुर्ग आबादी बची है।

ग़. गैंगस्टर कल्चर और खालिस्तान का भूत: वर्तमान पंजाब में ‘गैंगस्टर संस्कृति’ (जैसे सिद्धू मूसेवाला की हत्या) का उभार और विदेशों में बैठे तत्वों द्वारा इंटरनेट के माध्यम से खालिस्तानी नैरेटिव को दोबारा जीवित करने का प्रयास यह दिखाता है कि पंजाब के जख्म आज भी पूरी तरह भरे नहीं हैं।

 

भाग ए: इस विशाल इतिहास में फिल्म ‘सतलुज’ का स्थान इस वृहद और खूनी इतिहास के कैनवास पर यदि हम फिल्म ‘सतलुज’ (पंजाब ’95) को रखकर देखें, तो इसके दो पहलू साफ नजर आते हैं:

१. एक ईमानदार लेकिन आंशिक प्रयास: यह फिल्म जसवंत सिंह खालरा के व्यक्तिगत साहस और व्यवस्था की क्रूरता को दिखाने का एक बेहद साहसिक और ईमानदार प्रयास है। भारतीय सिनेमा में अमूमन ‘राज्य’ (State) को हमेशा सही दिखाया जाता है, लेकिन यह फिल्म पुलिसिया बर्बरता के उस सच को हिम्मत से दिखाती है जिसे सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई ने खुद स्वीकार किया था।

२. ऐतिहासिक असंतुलन (Historical Imbalance): इतिहास की कसौटी पर यह फिल्म इसलिए अधूरी रह जाती है क्योंकि यह पंजाब की त्रासदी को केवल एकतरफा (पुलिस बनाम पीड़ित) रूप में पेश करती है। उग्रवादियों द्वारा मचाई गई तबाही पर फिल्म की चुप्पी इसे एक संतुलित ऐतिहासिक दस्तावेज़ बनने से रोकती है। यह फिल्म इतिहास का ‘सच’ तो दिखाती है, लेकिन ‘पूरा सच’ नहीं दिखाती।

 

निष्कर्ष: इतिहास से सीखने का सबक

पंजाब की यह केस स्टडी हमें सिखाती है कि आतंकवाद किसी भी देश या समाज के लिए नासूर है, जिसे कुचलना सरकार की जिम्मेदारी है। परंतु, जब राज्य स्वयं कानून और मानवाधिकारों को कुचलकर ‘आतंक का जवाब आतंक’ से देने लगता है, तो वह अपने ही नागरिकों का विश्वास खो देता है। फिल्म ‘सतलुज’ और उस पर लगा वर्तमान प्रतिबंध (जुलाई 2026) यह साबित करता है कि स्वतंत्र भारत का यह सबसे काला अध्याय आज भी इतना संवेदनशील है कि व्यवस्था इस पर खुले दिल से चर्चा करने से भी कतराती है। पंजाब को आज प्रतिबंधों या सेंसरशिप की नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘सच्चाई और सुलह आयोग’ (Truth and Reconciliation Commission) की आवश्यकता है जो दोनों पक्षों के घावों को स्वीकार करे और पंजाब को एक खुशहाल भविष्य की ओर ले जाए।

 

साक्ष्य और अकादमिक संदर्भ सूची (Sources for Technical & Legal Protection)

१. न्यायिक दस्तावेज (खालरा मामला): CBI vs. Jaspal Singh & Others (2005), विशेष सीबीआई कोर्ट, पटियाला; भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2011 में इस सजा को बरकरार रखने का अंतिम फैसला।

२. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) रिकॉर्ड: In re: Presumed Enforced Disappearances and Mass Cremations in Punjab, ऐतिहासिक आदेश दिनांक 10 अक्टूबर 2006 (जिसमें 2,097 अवैध अंतिम संस्कारों के लिए 27.94 करोड़ रुपये के मुआवजे की पुष्टि की गई)।

३. आर्थिक प्रभाव पर रिसर्च पेपर: Prakarsh Singh (2019), “Impact of terrorism on investment decisions of farmers: evidence from the Punjab insurgency”, म्यूनिख पर्सनल रीपेक आर्काइव (MPRA).

४. अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार रिपोर्ट्स: Human Rights Watch & Amnesty International (1991-1995), “A Policy of Impunity in Punjab, India”.

५. पुलिस अधिकारियों के संस्मरण: जे.एफ. रिबेरो की आत्मकथा “Bullet for Bullet: My Life as a Police Officer” (पेंगुइन बुक्स).

६. ओटीटी प्रतिबंध का आधिकारिक आधार: भारत सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021’ की धारा 69A के तहत जारी प्रशासनिक निर्देश (जुलाई 2026)।

 

 

पंजाब 95 और सतलुज फिल्म समीक्षा: जसवंत सिंह खालरा और 90 के दशक का असली सच

 

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *