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बर्फ की लपटें: कारगिल की चोटियों से उठी शौर्य और शहादत की वो अमर दास्तान

 

१. खामोश शुरुआत: जब पहाड़ सुलग उठे

मई १९९९ की शुरुआत थी। कश्मीर की वादियों में अभी बर्फ पिघलना शुरू ही हुई थी। द्रास और बटालिक की विशाल, सफेद चोटियां हमेशा की तरह शांत और रहस्यमयी लग रही थीं। भारतीय सेना के जवान हर साल की तरह अपनी रूटीन गश्त पर थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि इन खामोश, सफेद चादरों के पीछे विश्वासघात का एक काला तूफान अपनी जड़ें जमा चुका है।

तभी एक स्थानीय चरवाहे (ताशी नामग्याल) ने कुछ अजीब देखा। १८,००० फीट की ऊंचाई पर, जहां इंसान का सांस लेना भी दूभर होता है, वहां कुछ साए घूम रहे थे। वे आम लोग नहीं थे, वे अत्याधुनिक हथियारों से लैस घुसपैठिए थे, जिन्होंने चुपके से भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया था।

पलक झपकते ही पहाड़ों की वो शांति, तोपों और मशीनगनों की गड़गड़ाहट में बदल गई। कारगिल का वो महायुद्ध शुरू हो चुका था, जिसने आने वाले दो महीनों तक पूरे देश की सांसें रोक दी थीं।

 

२. पहला झटका: उम्मीदों का ढहना और अंधेरा

कहानी का यह वो हिस्सा है जहां दर्द और लाचारी का गहरा अंधेरा छा जाता है। शुरुआत में भारतीय सेना को लगा कि ये चंद आतंकवादी हैं, लेकिन जल्द ही हकीकत सामने आ गई। ऊपर की चोटियों पर पाकिस्तान की सेना बंकर बनाकर बैठ चुकी थी। भारतीय जवान नीचे घाटी में थे और दुश्मन ठीक उनके सिर के ऊपर।

नीचे से ऊपर चढ़ने वाले हर हिंदुस्तानी सिपाही को दुश्मन आसानी से अपनी गोली का निशाना बना रहा था। शुरुआती कुछ दिनों में भारत ने अपने कई जांबाज अफसरों और जवानों को खो दिया। कैप्टन सौरभ कालिया और उनकी टीम को बर्बरता से शहीद कर दिया गया था। जब उनके पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटे हुए वतन वापस आए, तो पूरे देश की आंखें आंसुओं से नम थीं और सीने में प्रतिशोध की आग भड़क रही थी। यह युद्ध का सबसे निचला और दर्दनाक मोड़ था, जहां लग रहा था कि प्रकृति और परिस्थिति दोनों भारत के खिलाफ खड़ी हैं।

 

३. जज्बे का उभार: जब पत्थरों में जान आ गई

लेकिन, भारतीय सेना हार मानने के लिए नहीं बनी थी। ‘ऑपरेशन विजय’ का बिगुल फूंका गया। वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने ‘सफेद सागर’ मिशन के तहत आसमान से आग बरसानी शुरू की।

अब कहानी में नया मोड़ आ चुका था। अब बारी थी तोलोलिंग और टाइगर हिल को वापस पाने की। -१० डिग्री के जमा देने वाले तापमान में, जहां खून जम जाए, वहां भारतीय जवान सिर्फ एक जोड़ी रस्सी और अपने हौसले के दम पर सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ने लगे। रात के अंधेरे में, जब दुश्मन को लगता था कि इस रास्ते से कोई नहीं आ सकता, भारतीय सेना के चीते रेंगते हुए मौत के मुंह में घुस रहे थे।

 

४. महानायकों की दहाड़: “यह दिल मांगे मोर!”

युद्ध अब अपने सबसे रोमांचक और रोंगटे खड़े कर देने वाले पड़ाव पर था। गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच रेडियो सेट पर एक गूंज सुनाई देती है—”यह दिल मांगे मोर!” यह कोड वर्ड था कैप्टन विक्रम बत्रा (शेरशाह) का।

एक तरफ १३ जैक राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा दुश्मन के बंकरों को तबाह कर रहे थे, तो दूसरी तरफ १८ ग्रेनेडियर्स के महज १९ साल के जवान योगेंद्र सिंह यादव शरीर में १५ गोलियां लगने के बाद भी दुश्मन के बंकर में घुसकर उन्हें अपनी संगीन से चीर रहे थे। कैप्टन अनुज नय्यर अपनी सगाई की अंगूठी जेब में रखे आखिरी सांस तक लड़ रहे थे।

एक पल के लिए लगता कि भारतीय सेना पीछे हटेगी, लेकिन अगले ही पल कोई जांबाज भारत माता का जयकारा लगाते हुए दुश्मन की तोप के मुंह पर अपनी छाती अड़ा देता। मौत का खौफ खत्म हो चुका था, सिर्फ एक ही जिद बाकी थी—चोटी पर तिरंगा फहराना है!

 

५. अंत: विजय का सूरज और आंसुओं का सैलाब

२६ जुलाई १९९९ को वह सुबह आई, जिसका पूरे देश को इंतजार था। भारतीय सेना ने कारगिल की आखिरी चोटी से भी दुश्मन का नामोनिशान मिटा दिया। जब द्रास की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराया, तो हवाओं ने भी शहीदों को सलामी दी।

लेकिन इस जीत की कीमत बहुत भारी थी। ५२७ से ज्यादा वीर सपूत हमेशा के लिए भारत मां की गोद में सो चुके थे।

कहानी का अंत एक अजीब कशमकश पर आकर टिकता है। एक तरफ देश में दिवाली जैसा जश्न था, लोग सड़कों पर तिरंगा लेकर झूम रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, देश के ५२७ घरों के चूल्हे बुझे हुए थे। कोई बूढ़ा बाप अपने इकलौते बेटे की अर्थी को कंधा दे रहा था, तो कोई नवविवाहिता अपनी सूनी कलाइयों को देखकर रो रही थी। कैप्टन विक्रम बत्रा ने जाने से पहले कहा था—”या तो तिरंगा फहराकर आऊंगा, या तिरंगे में लिपटकर आऊंगा, लेकिन आऊंगा जरूर।” उन्होंने अपना वादा निभाया था।

 

निष्कर्ष: कारगिल की अमर लौ

आज भी जब आप कारगिल वॉर मेमोरियल जाएंगे, तो वहां की ठंडी हवाएं आपको उन वीरों की फुसफुसाहट सुनाएंगी। कारगिल विजय दिवस सिर्फ सैन्य ताकत की जीत नहीं है। यह कहानी है उस अदम्य मानवीय जज्बे की, जो मौत को सामने देखकर भी मुस्कुराया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम चैन की नींद सो सकें, इसलिए कोई बर्फीली चोटियों पर अपने खून से वतन का भूगोल लिख गया था।

शहीदों को शत्-शत् नमन। जय हिन्द, जय भारत! 🇮🇳

 

 

 

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