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अजेय: वीर यशवंत अग्रवाडेकर और गोमांतक दल की महागाथा
अध्याय १: सियोलिम का अंगारा और गोमांतक की शपथ
साल १९३८ का रहा होगा। गोवा के सियोलिम ग्राम की हवाओं में समंदर की नमी तो थी, पर साथ ही घुटन की एक ऐसी बू थी जो किसी भी स्वाभिमानी नवयुवक का दम घोंटने के लिए पर्याप्त थी। करीब साढ़े चार सौ साल! साठ-सत्तर साल की अंग्रेज़ी हुकूमत में पूरा भारत छटपटा उठा था, यहाँ तो साढ़े चार शताब्दियों से पुर्तगाली दमन का क्रूर पहरा था। सालज़ार की तानाशाही का वह दौर था, जहाँ कोंकणी बोलना गुनाह था और आज़ादी का नाम लेना सीधे ‘अगुआडा जेल’ की काल कोठरी का निमंत्रण।
इसी सियोलिम ग्राम में १५ जनवरी, १९१८ को जन्मा एक बालक अब २० वर्ष का गबरू जवान हो चुका था। नाम था—यशवंत अग्रवाडेकर। चौड़ी छाती, आँखों में जलते हुए अंगारे और बाहुओं में बिजली सी फड़कन।
“यशवंत! कब तक हम अपनी ही धरती पर दोयम दर्जे के नागरिक बनकर जिएंगे?” एक गुप्त तहखाने में मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में बैठे विहान ने पूछा।
यशवंत ने मेज पर रखी भारत माता की तस्वीर की ओर देखा और अपनी हथेली को चाकू की नोक से चीर दिया। बहते हुए खून को तिलक की तरह अपने माथे पर लगाते हुए उसने गंभीर, सिंह जैसी गर्जना में कहा—
“जब तक इस देह में प्राण हैं, तब तक सालाज़ार के कारिंदों को चैन की नींद सोने नहीं दूंगा। अहिंसा की बातें महलों में अच्छी लगती हैं विहान, इस क्रूर पुर्तगाली पुलिस को केवल बारूद की भाषा समझ आती है। आज से हम सिर्फ एक दल हैं—गोमांतक दल!”
उस रात मुट्ठी भर कसमसाते नवयुवकों ने गोआ की मुक्ति की सौगंध ली। देखते ही देखते, गोमांतक दल पुर्तगाली हुकूमत के लिए एक दुःस्वप्न बन गया। कभी किसी पुर्तगाली चौकी पर हमला, कभी गोला-बारूद के गोदामों को उड़ाना, तो कभी अत्याचारी अफ़सरों को सरेआम यमलोक भेजना। यशवंत अग्रवाडेकर का नाम पुर्तगाली पुलिस के लिए खौफ़ का दूसरा नाम बन चुका था।
गवर्नर जनरल के दफ़्तर में यशवंत की फ़ाइल सबसे ऊपर रहती थी। हुकूमत इस कदर बौखला गई कि उस दौर में यशवंत की गिरफ्तारी पर पाँच हजार रुपए का जिंदा या मुर्दा इनाम घोषित कर दिया गया। मगर यशवंत को पकड़ना हवा को मुट्ठी में कैद करने जैसा था।
अध्याय २: अनजुना का चक्रव्यूह: १७ दिसंबर, १९५८
वक्त का पहिया घूमा। भारत आज़ाद हो चुका था, मगर गोवा अब भी फिरंगियों की बेड़ियों में जकड़ा सिसक रहा था। यशवंत अग्रवाडेकर अब ४० वर्ष के परिपक्व, मंझे हुए गुरिल्ला कमांडर बन चुके थे। उनके चेहरे पर आई झुर्रियां उम्र की नहीं, बल्कि देश के लिए रातों की जागृति की गवाह थीं।
१७ दिसंबर, १९५८ की वह एक धुंधली, कँपकँपाती सुबह थी। अनजुना का जंगल अपनी घनी झाड़ियों और ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के कारण अभेद्य लग रहा था। यशवंत अपने दल के एक गुप्त मिशन के सिलसिले में अकेले ही इस जंगल के रास्ते आगे बढ़ रहे थे। चारों तरफ अजीब सा सन्नाटा था—ऐसा सन्नाटा जो किसी बड़े तूफ़ान के आने से पहले पसरता है।
अचानक, सूखी पत्तियों के चरमराने की आवाज़ आई। यशवंत के कान खड़े हो गए। वे एक पल के लिए ठिठके। आवाज़ दूर से आ रही थी, मगर उसमें एक भारीपन था। वे तुरंत संभले और फुर्ती से एक विशालकाय, पुराने बरगद के पेड़ के पीछे छिप गए।
उन्होंने आँखें मूँद लीं और अपनी श्रवण-शक्ति को केंद्रित किया। बूटों की भारी थपथपाहट से धरती का सीना काँप रहा था।
“अरे! यह किसी एक या दो लोगों के पदचाप की आवाज़ तो नहीं लगती…” यशवंत ने मन ही मन अंदाज़ा लगाया, “यह तो कोई बहुत बड़ी सैनिक टोली जान पड़ती है। पुर्तगाली मिलिट्री की गश्त?”
नहीं, वह महज़ कोई गश्त नहीं थी। वह पुर्तगाल सरकार की पूरी सैन्य शक्ति का एक ऐसा चक्रव्यूह था जो केवल एक अकेले शेर को पिंजरे में बंद करने के लिए रचा गया था। सियोलिम के इस लाल को मिटाने के लिए लिस्बन से सीधे आदेश आए थे। पुर्तगाली ब्रिगेडियर ने अपनी कलाई घड़ी देखी और अपने कप्तानों को इशारा किया। अनजुना के उस जंगल को चारों तरफ से घेर लिया गया था।
और उस घेरे में सैनिकों की संख्या कितनी थी? पूरे आठ हजार!
हाँ, इतिहास की चाटुकार किताबों ने बाद में इसे महज़ एक छोटी सी ‘पुलिस मुठभेड़’ का नाम देकर पन्ना पलट दिया। मगर कोई उन मक्कार इतिहासकारों से पूछे कि क्या आठ हजार आधुनिक हथियारों से लैस सैनिक कभी किसी एक अपराधी को पकड़ने के लिए मुठभेड़ करने जाते हैं? आठ हजार सैनिक तो युद्ध के लिए जाते हैं! पुर्तगालियों के लिए यशवंत अग्रवाडेकर कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक समानांतर सेना थे।
अध्याय ३: छापामार महायुद्ध: एक सिंह बनाम आठ हजार भेड़िए
“सरेंडर, अग्रवाडेकर! तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं है। पूरे जंगल को आठ हजार सैनिकों ने घेर रखा है!” लाउडस्पीकर पर पुर्तगाली कैप्टन की आवाज़ गूंजी।
पेड़ के पीछे खड़े यशवंत के होठों पर एक कड़वी, मगर जादुई मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी रायफल को चूमा, उसकी मैगज़ीन जाँची। गोलियाँ सीमित थीं, मगर हौसला असीम।
“सरेंडर? अग्रवाडेकर की डिक्शनरी में यह शब्द पुर्तगाल के जहाजों के साथ ही वापस चला गया था साहेब!” यशवंत की कड़कती आवाज़ जंगल में गूंजी और इसके साथ ही उनकी रायफल ने आग उगल दी।
‘धांय-धांय!’ पहली ही गोली पुर्तगाली लाउडस्पीकर पकड़ने वाले सैनिक की छाती के पार हो गई। और इसके साथ ही शुरू हुआ वह महायुद्ध, जिसकी मिसाल दुनिया के सैन्य इतिहास में ढूँढे नहीं मिलती।
एक तरफ आधुनिक तोपें, स्वचालित रायफलें और आठ हजार प्रशिक्षित सैनिक थे, और दूसरी तरफ चप्पे-चप्पे से वाकिफ गोमांतक दल का वह इकलौता नायक। यशवंत ने गुरिल्ला (छापामार) रणनीति का ऐसा खेल शुरू किया कि पुर्तगाली सेना दंग रह गई। वे हवा की तरह आते, हमला करते और घनी झाड़ियों में विलीन हो जाते।
कभी वे किसी पहाड़ी के ऊपर से पत्थरों की आड़ लेकर गोलियाँ बरसाते, तो अगले ही पल नीचे घाटी के दलदल में छिपकर पीछे से वार करते। पुर्तगाली सैनिकों को समझ ही नहीं आ रहा था कि वे किसी एक आदमी से लड़ रहे हैं या भूतों की किसी फौज से। दो दिन, तीन दिन, चार दिन… समय बीतता गया। अनजुना का जंगल बारूद के धुएं से भर गया था।
यशवंत भूखे थे, प्यासे थे। उनके होठ सूख चुके थे, शरीर पर कंटीली झाड़ियों के दर्जनों घाव थे जिनसे खून रिस रहा था। मगर उनकी आँखों की चमक और अचूक निशाना कम नहीं हुआ था। जहाँ पुर्तगाली सैनिक कदम रखते, वहीं अग्रवाडेकर की गोली उनका स्वागत करती।
हुकूमत की बौखलाहट का आलम यह था कि उन दिनों पंजी (पणजी) का कोई भी अस्पताल खाली नहीं बचा था। स्ट्रेचरों पर कराहते, लहूलुहान पुर्तगाली सैनिकों की लाइनें लगी थीं। अस्पतालों के गलियारे गोमांतक दल के इस सेनापति के खौफ़ की गवाहियाँ दे रहे थे। इतिहास भले ही इस पर कोई ‘नियमित जांच’ या ‘महामारी’ का पर्दा डाल दे, मगर सच तो यही था कि आठ हजार की उस घमंडी सेना के पैर यशवंत ने उखाड़ दिए थे।
अध्याय ४: अंतिम मोर्चा और वीरगति
संघर्ष अपने चरम पर पहुँच चुका था। कई दिनों के इस अनवरत युद्ध ने यशवंत के शरीर को शिथिल कर दिया था, मगर उनकी आत्मा अब भी अजेय थी। गोलियाँ ख़त्म होने की कगार पर थीं। अंतिम मैगज़ीन को रायफल में लोड करते हुए यशवंत ने आसमान की तरफ देखा। उन्हें पता था कि आज इस माटी का कर्ज चुकाने का अंतिम दिन है।
पुर्तगाली सेना ने उन्हें एक तंग घाटी के मुहाने पर घेर लिया था। अब लुका-छिपी का समय ख़त्म हो चुका था। यह आमने-सामने की मुठभेड़ थी।
“पकड़ो इसे! गोली मारो!” पुर्तगाली सार्जेंट चिल्लाया।
यशवंत चट्टान की ओट से बाहर निकल आए। लहूलुहान, फटे हुए कपड़ों में, मगर सीना ताने। उनकी रायफल की आख़िरी गोलियाँ पुर्तगाली अफ़सरों के सीने नापती चली गईं। आमने-सामने की उस भीषण गोलीबारी में, दुश्मनों की दर्जनों गोलियाँ इस महावीर के सीने में आकर समा गईं।
महज़ ४० वर्ष की उस भरी जवानी में, जहाँ लोग अपने परिवार और भविष्य के ताने-बाने बुनते हैं, यशवंत अग्रवाडेकर ने माँ भारती की गोद में अपनी अंतिम सांस ली। वे धरती पर गिरे, तो ऐसा लगा मानो गोवा की माटी ने अपने सबसे लाडले बेटे को आलिंगन में ले लिया हो।
पुर्तगाली कमांडर डरते-डरते उनकी मृत देह के पास पहुँचा। उसने बूट से छूकर देखा कि कहीं यह शेर अभी भी ज़िंदा तो नहीं? हाँ, यशवंत अग्रवाडेकर शहीद हो चुके थे। वे वीरगति को प्राप्त हुए, मगर पुर्तगालियों का यह अरमान अधूरा ही रह गया कि वे जीते-जी इस योद्धा को हथकड़ी पहना सकें। वे अपनी आख़िरी सांस तक स्वतंत्र रहे, अजेय रहे!
अध्याय ५: उपसंहार: ‘ऑपरेशन विजय’ की राह और अमर विरासत
इतिहास गवाह है कि यशवंत अग्रवाडेकर की यह शहादत व्यर्थ नहीं गई। उन्होंने अपनी आहुति से पुर्तगाली साम्राज्य की चूलें हिला दी थीं। उनके इस पराक्रम ने पुर्तगाली सेना के मनोबल को इस कदर ध्वस्त कर दिया था कि वे भीतर से पूरी तरह टूट चुके थे। उनके सारे सैनिक अस्पतालों में भर्ती थे, और जो बचे थे, उनके दिलों में ‘गोमांतक दल’ का ऐसा खौफ़ था कि वे साये से भी डरते थे।
यही वह पल था, जिसकी मजबूत पीठ पर पैर रखकर भारतीय सेना के लिए आगे का रास्ता बेहद आसान हो गया था। जब सेना आगे बढ़ी, तो पुर्तगालियों की तरफ से विरोध करने वाला कोई बचा ही नहीं था। परिणामतः, १८ दिसंबर १९६१ को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ की शुरुआत की और मात्र ३६ घंटों के भीतर, १९ दिसंबर को बिना किसी बड़े प्रतिरोध के, ४५० साल पुराने पुर्तगाली साम्राज्य ने घुटने टेक दिए। गोवा आज़ाद हो गया!
आज़ादी के बाद, न जाने वह गोमांतक दल कहाँ विलीन हो गया और उसके सदस्य इतिहास के किस अंधेरे कोने में खो गए। मगर सच कभी नहीं मरता।
आज, जब आप गोवा के ऐतिहासिक अगुआडा इंटरएक्टिव म्यूज़ियम (Aguad Interactive Museum) की दीवारों के पास से गुज़रेंगे, तो वहाँ की डिजिटल दीर्घाओं में वीर यशवंत अग्रवाडेकर की यह अलौकिक शौर्य-गाथा पूरी भव्यता के साथ प्रदर्शित दिखाई देगी। आने वाली पीढ़ियाँ वहाँ ठहरकर इस महानायक के चरणों में अपना शीश नवाती हैं।
इतना ही नहीं, हर वर्ष जब ‘गोवा मुक्ति दिवस’ (Goa Liberation Day) का पावन अवसर आता है, तो गोवा सरकार और स्वयं मुख्यमंत्री महोदय द्वारा वीर यशवंत अग्रवाडेकर के परिवार और उनकी प्रथम पीढ़ी के वारिसों को राजकीय सम्मान से विभूषित किया जाता है। कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें याद करता है, उनके त्याग को नमन करता है।
इतिहासकारों ने भले ही पन्ने चुराए हों, मगर अश्विनी राय ‘अरुण’ की लेखनी और बक्सर की माटी से इस महावीर को कोटि-कोटि वंदन है! जब तक सूरज-चाँद रहेगा, वीर यशवंत अग्रवाडेकर का नाम अमर रहेगा!
जय हिंद! जय गोवा!
वीर यशवंत अग्रवाडेकर अमर रहें!
गोवा मुक्ति संग्राम के गुमनाम नायक: वीर यशवंत अग्रवाडेकर और गोमांतक दल का इतिहास