इतिहास की ‘चुप्पी’ और ८ हजार सैनिकों से लोहा लेने वाला अजेय योद्धा: वीर यशवंत अग्रवाडेकर
”शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा।”
मगर विडंबना देखिए, हमारे देश में इतिहास के पन्ने उन लोगों के लिए तो बड़ी सहूलियत से खुल जाते हैं जो महलों में बैठकर संधियाँ करते रहे, लेकिन जब बात माटी के उन सच्चे सपूतों की आती है जिन्होंने अपने खून से आज़ादी की इबारत लिखी, तो इतिहासकार कतराकर निकल जाते हैं। यह कहानी भी एक ऐसे ही गुमनाम, मगर अदम्य महानायक की है, जिसे इतिहास ने भुला दिया ताकि कुछ व्यवस्थापकों के कॉलर ऊँचे रहें।
अनजुना के जंगलों में नियति का वो घेरा: १७ दिसंबर, १९५८
तारीख थी १७ दिसंबर, १९५८। स्थान—गोवा का घना अनजुना जंगल।
क्रांतिकारी यशवंत अग्रवाडेकर कहीं जा रहे थे कि एकाएक उन्हें आभास हुआ कि कोई उनका पीछा कर रहा है। वे चौंककर संभले और एक विशाल पेड़ की ओट में छिपकर आहटों का अंदाज़ा लगाने लगे। पैरों की चाप गहरी थी। उन्होंने मन ही मन कहा—”अरे! यह किसी एक या दो लोगों के पदचाप की आवाज़ नहीं लगती, यह तो कोई बहुत बड़ी सैनिक टुकड़ी जान पड़ती है।”
उनका अंदाज़ा सही था। पुर्तगाली हुकूमत ने उस पूरे जंगल को चारों तरफ से घेर रखा था। वह पूरी सेना पुर्तगाल सरकार के सीधे आदेश पर सिर्फ और सिर्फ एक इंसान—यशवंत अग्रवाडेकर को जीवित या मृत पकड़ने के लिए आई थी। कहने को तो बाद में सरकारी कागज़ातों और इतिहास की किताबों में इसे महज़ एक ‘मुठभेड़’ (Encounter) का नाम दे दिया गया, जो एक पुलिस दल और अग्रवाडेकर के बीच हुई थी, जिसमें वे वीरगति को प्राप्त हुए।
इतिहास के कड़वे सवाल: मुठभेड़ या महायुद्ध?
परंतु, आज कोई तो उठकर इस चाटुकार इतिहास से ये तीखे सवाल पूछे:
क्या किसी एक क्रांतिकारी से ‘मुठभेड़’ करने के लिए पुलिस आठ हजार सैनिकों की फौज के साथ चलती है?
क्या आठ हजार सैनिक मुठभेड़ के लिए जाते हैं या किसी महायुद्ध के लिए?
और सबसे बड़ा सवाल—इस भयानक युद्ध से पुर्तगाल के कितने सैनिक ज़िंदा वापस लौटे थे? इसका जवाब इतिहास क्यों नहीं देता?
इतिहासकार इस पर कभी प्रकाश नहीं डालेंगे, क्योंकि इस सच को स्वीकार करने का अर्थ होगा—उस समय की शासन व्यवस्था और सैन्य तमगों की साख पर सवालिया निशान लग जाना। अपने अहम और साख को बचाए रखने की इसी आदत ने इस महान क्रांतिकारी के पराक्रम को बिसरा दिया।
आठ हजार आधुनिक सैनिकों से लगातार कई दिनों तक अकेले छापामार (गोरिल्ला) युद्ध लड़ता यह कालजयी योद्धा अंततः वीरगति को प्राप्त हो गया, मगर जीते-जी पुर्तगालियों के हाथ नहीं आया। वे कैसे शहीद हुए, कब हुए, खुद को देश पर न्योछावर किया या किसी छद्म वार का शिकार हुए—यह आज भी रहस्य है। परंतु, दस्तावेज़ गवाह हैं कि गुमशुदगी के २,२०० और सैनिकों के मारे जाने के १,५०० केस आज भी पुर्तगाली अदालतों में धूल फांक रहे हैं। इतिहास भले ही कोई रेगुलर मेडिकल जांच का बहाना बना दे, लेकिन उसे जवाब देना होगा कि उन दिनों पणजी (पंजी) के सारे अस्पताल पुर्तगाली सैनिकों से क्यों पटे पड़े थे?
ऑपरेशन विजय की असली बुनियाद
जानकारों और रणनीतिकारों की मानें तो यशवंत अग्रवाडेकर का यह वही आत्मोत्सर्ग था, जिसकी पीठ पर पैर रखकर आगे बढ़ते हुए भारतीय सेना ने गोवा, दमन और दीव को करीब ४५० साल के क्रूर पुर्तगाली साम्राज्य से आज़ाद कराया था। इसी शहादत की आंच थी कि अंततः १८ दिसंबर १९६१ को भारतीय सेना ने गोवा में ‘ऑपरेशन विजय’ का बिगुल फूँका और मात्र ३६ घंटों के भीतर, १९ दिसंबर को पुर्तगाली गवर्नर ने आत्मसमर्पण कर दिया। गोवा आज़ाद हो गया, मगर उस आज़ाद सुबह का सूरज देखने के लिए अग्रवाडेकर नहीं थे।
कौन थे यह महावीर?
हमारे दिलों पर राज करने वाले इस राष्ट्रभक्त का नाम है—श्री यशवंत अग्रवाडेकर।
जन्म: १५ जनवरी, १९१८ (ग्राम—सियोलिम, गोवा)।
दहशत का पर्याय: वे पुर्तगाली पुलिस की दृष्टि में इतने खतरनाक और अडिग क्रांतिकारी थे कि उस दौर में उनकी गिरफ्तारी पर पुर्तगाल सरकार ने ५,००० रुपए (जो उस समय एक बहुत बड़ी धनराशि थी) का इनाम घोषित कर रखा था।
संगठन का नाम: उन्होंने जिस भूमिगत सशस्त्र क्रांतिकारी दल का गठन किया था, उसका नाम था—गोमांतक दल।
विस्मय और कड़वाहट की बात देखिए कि देश आज़ाद हुआ, गोवा मुक्त हुआ, मगर आज़ादी के बाद ना तो उस ‘गोमांतक दल’ का कहीं अता-पता चला और ना ही उसके रणबांकुरे सदस्यों का। वे कहाँ खो गए, किस गुमनामी के अंधेरे में विलीन हो गए, किसी ने सुध नहीं ली।
मगर इतिहास की इस कृतघ्नता के बीच, हम और हमारी लेखनी देश की माटी के लिए मिट जाने वाली हर उस भूली-बिसरी और उपेक्षित पुण्य आत्मा को कोटि-कोटि नमन करती है, वंदन करती है!
शहीद यशवंत अग्रवाडेकर अमर रहें!
एक विनम्र सूचना: अत्यंत प्रयासों के बाद भी हम इंटरनेट और पुस्तकालयों के संसार से इस महान योद्धा का कोई प्रामाणिक चित्र (फ़ोटो) खोज पाने में असमर्थ रहे। इसके लिए हम सुधी पाठकों से अत्यंत क्षमाप्रार्थी हैं। यदि किसी के पास उनका चित्र हो, तो साझा कर इस ऋण को चुकाने में मदद करें।
अश्विनी राय ‘अरूण’
मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार
नियति का चक्र: बक्सर की गलियों से बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के शताब्दी वर्ष तक का संस्मरण