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बक्सर की गलियाँ, ‘टांय-टांय फ़ुस्स’ और नियति का महा-यूर्टन!

 

​दौड़-धूप से भरा आज का दिन बड़ा ही कौतुकपूर्ण रहा…

​मेरे आलेख का विषय था—”प्रवासी साहित्य: स्वरूप एवं अवधारणा”। काफी कुछ लिख तो डाला था, मगर एक जगह जाकर कलम थोड़ी अटक गई। मन में इच्छा हुई कि इस विषय पर ज़रा गुरुजनों की राय ले ली जाए। तुरंत फ़ोन लगाया आदरणीय श्री रामेश्वर प्रसाद वर्मा जी को। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “विषय अत्यंत गंभीर है अश्विनी, मैं तुम्हारी इस विधा में कोई विशेष सहायता नहीं कर पाऊँगा। हाँ, एक काम करो, तुम तुरंत दीपक राय से मिलो; शायद पूरे बक्सर में एक वही हैं जो इस विषय पर तुम्हारी प्रामाणिक मदद कर सकते हैं। उन्होंने अपने यहाँ एक समृद्ध पुस्तकालय भी बना रखा है।”

​बस, फिर क्या था! मैं भागा-भागा ‘चरित्रवन’ स्थित दीपक राय जी के आवास पर जा पहुँचा। मगर हाय री किस्मत… वो घर पर मौजूद नहीं थे। नंबर लेकर फ़ोन घुमाया तो बात हुई। बोले, “अश्विनी जी, आप शाम को आइए!”

​यहाँ तो मामला ‘टांय-टांय फ़ुस्स’ हो गया।

​अब सोचा कि जब चरित्रवन तक आ ही गया हूँ, तो क्यों न लगे हाथ उमेश पाठक जी से ही भेंट कर लूँ? फ़ोन लगाया… पहली बार में घंटी बजती रही, दूसरी बार में बात हुई। बोले, “अरे अश्विनी जी बोलिए! आज कैसे याद किया?” मैंने कहा, “हम तो आपके घर के बिल्कुल नज़दीक खड़े हैं, सोचा आपसे मिल लें; कहाँ हैं आप?” जवाब मिला, “भाई, अभी तो मैं विद्यालय में हूँ!”

​लो जी, बात ख़त्म… यहाँ भी वही ढाक के तीन पात!

​वहाँ से निराश होकर जब मुख्य सड़क पर आया, तो ज़हन में कौंधा कि कितने दिनों से रमेश जी बुला रहे हैं। आज मौक़ा भी है और दस्तूर भी; क्यों न उनके यहाँ ही अलख जगाई जाए। चले गए उनके घर… पूछा, “रमेश जी हैं?” उत्तर मिला, “हाँ-हाँ, हैं… आइए बैठिए।” मन ही मन सोचा—चलो भगवान का शुक्र है, आज का एक काम तो ठिकाने लगा।

​चाय-पानी की मनुहार हुई, तो मैंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। थोड़ी ही देर में रमेश जी सामने हाज़िर हुए। अभी हमारी औपचारिक बातचीत शुरू भी नहीं हुई थी कि अचानक दो लोग हाँफते-भागते भीतर आए। बोले, “चलिए, घाट पर जाना है। क्या वो लोग आ गए?” रमेश जी ने उनसे पूछा। संक्षिप्त जवाब आया, “हाँ!”

​फिर रमेश जी मेरी तरफ मुखातिब हुए और बोले, “माफ़ करिएगा अश्विनी जी, मुझे इसी वक्त श्मशान घाट जाना पड़ रहा है… एक बेहद नज़दीकी रिश्तेदार की मृत्यु हो गई है।”

​अब भीतर से आवाज़ आई—’चल मन, अपने घर की ओर…!’

​परंतु दिल कहाँ मानने वाला था! उसने भीतर से फिर उकसाया—ज़रा विहान जी से बात कर लो, शायद वो मिल जाएँ। फ़ोन लगाया… मगर नेटवर्क की ख़ता कहिए या किस्मत की, फ़ोन लगा ही नहीं। अंततः थके कदमों से मैं घर के लिए निकल पड़ा।

​रास्ते में अचानक विहान जी का घर सामने आ गया। मन ठिठका—क्या किया जाए? चलो, पूछ ही लेते हैं। भीतर जाकर आवाज़ दी, “विहान जी हैं क्या?” सामने उनके बड़े सुपुत्र आए और आदर से बोले, “अरे! आइए-आइए… पिताजी तो घर पर नहीं हैं, कहीं बाहर निकले हैं।”

​मैंने मन ही मन कहा—धत्त तेरे की! आज दिन ही खराब है क्या?

​तभी उनके सुपुत्र ने स्वयं विहान जी को फ़ोन मिलाया। इस बार नियति मेहरबान थी, दूसरी ही घंटी में फ़ोन उठ गया। मेरे बोलते ही विहान जी की आवाज़ आई, “हाँ जी अश्विनी जी, बोलिए…?” मैंने कहा, “सर, मैं तो आपके घर पर ही खड़ा हूँ!” वो सहसा हँसे और बोले, “अरे भाई! मैं तो अभी प्रीतम जी के यहाँ बैठा हूँ… आप तुरंत आ जाइए, यहाँ से महज़ दस कदम की दूरी पर है।”

​बस, अगले ही पल मेरा दाख़िला आदरणीय प्रीतम जी के घर पर हुआ।

​वहाँ का नज़ारा अद्भुत था! प्रीतम जी, विहान जी और महेश जी की त्रिमूर्ति की बैठक पहले से ही जमी हुई थी। मैंने सबको सादर प्रणाम किया और उस मंडली में विराज गया। पहले कुशल-क्षेम पूछा गया, और फिर शुरू हुई मेरे आलेख के विषय पर गंभीर चर्चा। जोरों की वैचारिक परिचर्चा के अंत में बस इतना ही निष्कर्ष निकला कि थोड़ी-बहुत जोड़-तोड़ और काँट-छाँट के बाद, जो मैंने लिखा है—वही सर्वथा श्रेष्ठ और सटीक है!

​इसके बाद चाय का दौर चला… कुछ साहित्यिक परिचर्चा हुई, थोड़ी हँसी-ठिठोली हुई और फिर देखते ही देखते माहौल अचानक गंभीर हो गया।

​प्रीतम जी ने मेरी ओर देखते हुए बड़े धीर-गंभीर स्वर में कहा, “अश्विनी जी! आपके आने से ठीक पहले हम सब यहाँ आपके विषय में ही चर्चा कर रहे थे। आपने निश्चित रूप से ‘बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना’ के बारे में सुना ही होगा। महेश जी इस समय बक्सर ज़िले के अध्यक्ष हैं और मैं महामंत्री हूँ। हम सबका सर्वसम्मति से यह विचार बना है कि इस प्रतिष्ठित संस्था की ज़िला कार्यकारिणी में आपको शामिल किया जाए। इस विषय पर हमारी पहले भी बात हो चुकी है। अब आप अपने विचार से हमें अवगत कराएँ।”

​मैं स्तब्ध था… अब तक जो सिर्फ दूसरों को सुन रहा था, वह भीतर तक हिल गया। मैंने मन ही मन सोचा—हे भगवान! आप भी धन्य हैं! कहाँ मैं एक आलेख के लिए भटक रहा था और कहाँ आपने सीधे इस मुकाम पर ला खड़ा किया!

​मैंने संयत होकर कहा, “हाँ सर, क्यों नहीं? मैं इस प्रस्ताव से अत्यंत हर्षित, विस्मित और प्रफुल्लित हूँ। इस सम्मान के लिए ‘हाँ’ के सिवा भला मैं और क्या कह सकता हूँ!”

​ऐतिहासिक संयोग देखिए… ‘बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना’ इसी वर्ष २०१८ में अपने गौरवशाली १०० वर्ष पूरे कर रहा है। और मैं उस शताब्दी वर्ष में इस ऐतिहासिक संस्था से जुड़ने वाला पहला व्यक्ति बना। नाम जोड़ दिया गया, दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर भी हो गए। शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रांतीय राजधानी की राजाज्ञा के अनुसार एक राष्ट्र-स्तरीय महाआयोजन भी बक्सर की धरती पर कराना तय हुआ।

​इसी बीच, मेरी आगामी पुस्तक ‘बिहार: एक आईने की नज़र से‘ के विमोचन की बात भी उठी। उन सभी मनीषियों ने एक स्वर में कहा कि इस महाआयोजन का समय पुस्तक के विमोचन के लिए सर्वश्रेष्ठ होगा; क्योंकि इस ऐतिहासिक मंच से विमोचित होने वाली कृति सीधे राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान दर्ज कराएगी।

​चर्चा समाप्त हुई और हम सब अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े…

​अब आप ही कहें… मैं हैरान हूँ, विस्मित हूँ, परेशान हूँ या विधाता की इस अनूठी योजना पर नतमस्तक हूँ? आखिर मैं क्या हूँ…??

​अश्विनी राय ‘अरूण’

मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार

 

 

 

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