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महाप्रभु जगन्नाथ की पावन रथयात्रा: पौराणिक गाथा, रथों का शिल्प और आत्मिक पुकार

 

​निलाद्रौ शंखमध्ये च विमला पुरुषोत्तमे।

जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥

​सनातन संस्कृति में ईश्वर जब गर्भगृह से निकलकर स्वयं अपनी प्रजा और भक्तों के सुख-दुख साझा करने पगडंडियों पर आते हैं, तो उस महामहोत्सव को हम ‘श्री जगन्नाथ रथयात्रा’ के रूप में मनाते हैं। पुरुषोत्तम पुरी (ओडिशा) की यह रथयात्रा केवल आस्था का सैलाब नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच के उस आत्मीय संबंध का उत्सव है, जहाँ जात-पांत, ऊंच-नीच के सारे भेद मिटकर केवल ‘हरि बोल’ और ‘जय जगन्नाथ’ का जयघोष शेष रह जाता है।

 

​अर्द्धनिर्मित मूर्तियों का रहस्य: राजा इंद्रद्युम्न और विश्वकर्मा की शर्त

​इस अलौकिक विग्रह के प्राकट्य की कथा अत्यंत मर्मस्पर्शी है। मालवा के परम प्रतापी राजा इंद्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर के समीप निवास करते थे, उन्हें समुद्र में बहता हुआ एक विशालकाय दिव्य काष्ठ (लकड़ी का लट्ठा) प्राप्त हुआ। राजा ने जब उस काष्ठ से भगवान विष्णु के भव्य विग्रह के निर्माण का निश्चय किया, तो स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई का रूप धारण कर राजदरबार में प्रस्तुत हो गए।

​शिल्पी ने राजा के सम्मुख एक अत्यंत कठिन शर्त रखी—”मैं जिस कक्ष में मूर्तियों का निर्माण करूँगा, उसके पूर्ण होने तक कोई भी भीतर प्रवेश नहीं करेगा। यदि द्वार खुला, तो मैं उसी क्षण कार्य बंद कर दूँगा।”

​राजा ने शर्त सहर्ष स्वीकार कर ली। आज जहाँ श्री जगन्नाथ जी का मुख्य मंदिर है, उसी के समीप एक कक्ष में मूर्तियाँ गढ़ी जाने लगीं। कई दिनों तक बंद द्वार के भीतर से छेनी-हथौड़ी की आवाज़ आती रही, परंतु एक दिन अचानक आवाज़ आना बंद हो गई। कई दिनों से अन्न-जल त्यागे उस वृद्ध बढ़ई की सुरक्षा को लेकर महारानी गुंडिचा का हृदय सहज शंका से भर उठा। उन्होंने महाराजा से द्वार खुलवाने का आग्रह किया।

​जैसे ही महाराजा के आदेश पर द्वार खोला गया, वह वृद्ध बढ़ई अंतर्धान हो चुका था और कक्ष में प्रभु जगन्नाथ, सुभद्रा तथा अग्रज बलभद्र की अर्धनिर्मित काष्ठ मूर्तियाँ शेष थीं। अपने हाथों प्रभु के अंगों को अपूर्ण देखकर महाराजा और महारानी घोर अवसाद और दुख में डूब गए।

​उसी क्षण एक आकाशवाणी गूंजी—”हे राजन! व्यर्थ दुखी मत हो। हम इसी निराकार और अलौकिक रूप में यहाँ स्थापित होना चाहते हैं। इन मूर्तियों को पवित्र द्रव्यों से सुसंस्कृत कर मंदिर में प्रतिष्ठित करवा दो।” आज भी वे अपूर्ण और विस्मयकारी विग्रह साक्षात ब्रह्म रूप में पुरुषोत्तम पुरी में प्रतिष्ठित और सुशोभित हैं।

 

​रथयात्रा की पृष्ठभूमि: माता सुभद्रा की द्वारिका भ्रमण की इच्छा

​धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रथयात्रा की शुरुआत के पीछे बहन सुभद्रा की एक आत्मीय इच्छा थी। द्वापर युग में एक बार माता सुभद्रा ने अपने भाइयों—श्रीकृष्ण और बलराम जी से द्वारिका नगरी के भ्रमण और उसे साक्षात देखने की इच्छा प्रकट की। अपनी लाडली बहन की इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण और बलराम ने उन्हें अलग-अलग भव्य रथों में बैठाकर संपूर्ण नगर का भ्रमण कराया था। माता सुभद्रा की इसी नगर भ्रमण की पावन स्मृति में हर वर्ष पुरी में इस भव्य रथयात्रा का आयोजन किया जाता है।

​यह महाउत्सव प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जगन्नाथपुरी में आरंभ होता है। यह पुरी का प्रधान और विश्वप्रसिद्ध पर्व है, जहाँ देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।

 

​त्रिमूर्ति के अलौकिक रथ: अद्वितीय शिल्प और विनिर्देश

​पुरी की रथयात्रा में प्रयुक्त होने वाले तीनों रथ विशाल, भव्य और वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं। इन रथों के निर्माण की तैयारी प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया के पावन दिन से शुरू हो जाती है और सबसे विशेष बात यह है कि हर साल पूर्णतः नए रथों का निर्माण किया जाता है। इन तीनों रथों की अपनी विशिष्ट पहचान, नाम और विनिर्देश हैं:

महाप्रभु जगन्नाथ के रथ का नाम: नंदीघोष (या गरुड़ध्वज / कपिलध्वज), रथ की ऊँचाई ४५ फुट, पहियों की संख्या १६ पहिये (व्यास ७ फुट), ध्वज (झंडे) का नाम त्रैलोक्यमोहिनी,  खींचने वाली रस्सी शंखचूड़ (वासुकी का स्वरूप)

अग्रज बलभद्र के रथ का नाम: तलध्वज, रथ की ऊँचाई ४४ फुट, पहियों की संख्या १२ पहिये (व्यास ७ फुट), ध्वज (झंडे) का नाम उनानी, खींचने वाली रस्सी वासुकी

बहन सुभद्रा के रथ का नाम: पद्मध्वज (या दर्पदलन), रथ की ऊँचाई ४३ फुट, पहियों की संख्या १२ पहिये, ध्वज (झंडे) का नाम नदम्बिक, खींचने वाली रस्सी स्वर्णचूड़ा

रथयात्रा के दिन सबसे पहले बड़े भाई बलभद्र जी का रथ ‘तलध्वज’ प्रस्थान करता है। उसके पश्चात बहन सुभद्रा जी का रथ ‘पद्मध्वज’ चलना शुरू होता है और सबसे अंत में भक्तों के सर्वस्व, जगत के नाथ महाप्रभु जगन्नाथ जी का रथ ‘नंदीघोष’ अपने शंखचूड़ रस्से के सहारे आगे बढ़ता है। सैकड़ों लोग इन मोटे-मोटे रस्सों को खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं।

 

गुंडिचा मंदिर: मौसी का घर और नौ दिनों का उत्सव

यह रथयात्रा मुख्य मंदिर से निकलकर लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर जाकर संपन्न होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। यह वही पावन स्थल है जहाँ देवशिल्पी विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था।

यह उत्सव पूरे नौ दिनों तक चलता है। भगवान अपनी मौसी के घर नौ दिनों तक आतिथ्य स्वीकार करते हैं, जहाँ उन्हें विभिन्न प्रकार के छप्पन भोग और ‘पोडा पीठा’ अर्पित किया जाता है। ९ दिन पूरे होने के बाद, भगवान पुनः अपनी ‘बहुड़ा यात्रा’ (उल्टी रथयात्रा) के माध्यम से मुख्य जगन्नाथ मंदिर में वापस विराजते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि इस रथयात्रा का दर्शन और रथ खींचने का पुण्य सौ अश्वमेध यज्ञों के बराबर फल देने वाला होता है।

 

आंतरिक पुकार: एक भक्त का आश्वासन

आलेख के इस तथ्यात्मक प्रवाह से इतर, एक सामान्य भक्त का हृदय हर वर्ष आषाढ़ आते ही मचलने लगता है। हम सब सांसारिक बेड़ियों में जकड़े जीव हर बार टीवी स्क्रीन या अखबारों में रथ के पहियों को घूमते देख अपनी आँखें मूँद लेते हैं और महाप्रभु से मौन संवाद करते हैं:

“हे भगवन! हम पर भी कभी कृपा करें। हर बार की तरह इस बार भी मैं खुद को यही आश्वासन दे रहा हूँ कि हे नाथ! अगली बार मैं भी सब छोड़कर तेरे द्वार आऊंगा, उस वासुकी और स्वर्णचूड़ा रस्से को अपने हाथों में थामूंगा और धूल में लोटकर धन्य हो जाऊंगा।”

हे जगत के स्वामी! यह आध्यात्मिक और आत्मीय कृपा संसार के समस्त सुधी जनों और जीव मात्र पर बनाए रखना। सबको अपने नयनपथ का गामी बनाना।

जय जगन्नाथ!

जय बलभद्र!

जय सुभद्रा!

 

 

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