मई १६६० का समय था। बीजापुर की आदिलशाही सल्तनत छत्रपति शिवाजी महाराज की बढ़ती शक्ति से भयभीत थी। सिद्दी जौहर के नेतृत्व में एक विशाल सेना ने पन्हाला किले को चारों ओर से घेर लिया था। यह घेरा केवल सैनिकों का नहीं, बल्कि रसद और उम्मीदों का भी था। महीनों बीत गए, बारिश ने रौद्र रूप ले लिया, लेकिन सिद्दी की घेराबंदी टस से मस न हुई।
अश्विनी राय ‘अरुण’ का शोधपरक विश्लेषण:
इतिहासकार बताते हैं कि पन्हाला का वह घेरा रणनीतिक रूप से महाराज के लिए सबसे कठिन समय था। किले के भीतर अन्न कम हो रहा था और बाहर सिद्दी जौहर की ‘अंग्रेजी तोपें’ कहर बरपा रही थीं। इसी समय बाजी प्रभु देशपांडे, जो कि पन्हाला के प्रशासन और सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे थे, महाराज के पास एक योजना लेकर आए।
दृश्य १: गुप्त मंत्रणा
मशाल की मद्धम रोशनी में बाजी प्रभु ने महाराज से कहा— “राजे, यह घेरा अब धीरज का नहीं, बल्कि छल का उत्तर बल से देने का समय है। हम आषाढ़ की इस काली रात का लाभ उठाएंगे।” बाजी का स्वर दृढ़ था। योजना बनी कि दो पालकियाँ निकलेंगी। एक में महाराज के हमशक्ल ‘शिवा काशीद’ बैठेंगे और दूसरी में स्वयं महाराज।
क्लाइमेक्स:
रात के सन्नाटे में जब ६०० मावलों की टोली निकली, तो प्रकृति ने भी साथ दिया। घनघोर वर्षा ने पदचापों को दबा दिया। लेकिन दुर्भाग्य! सिद्दी के गुप्तचरों ने सुराग पा लिया। यहाँ से शुरू हुई वह दौड़, जिसे इतिहास ‘ग्रेट एस्केप’ (Great Escape) के नाम से जानता है।
दृश्य २: मौत की आहट
भोर होने तक सिद्दी मसूद की घुड़सवार सेना महाराज के बिल्कुल करीब पहुँच चुकी थी। विशालगढ़ अभी भी ९ मील दूर था। महाराज की पालकी के साथ चल रहे बाजी प्रभु ने पीछे मुड़कर देखा। धूल का गुबार और घोड़ों की टापें बता रही थीं कि अब भागने का नहीं, लड़ने का समय है।
बाजी प्रभु का महाप्रयाण:
विशालगढ़ के रास्ते में एक सँकरा दर्रा पड़ता था— ‘घोडखिंड’। यहाँ केवल दो आदमी एक साथ खड़े हो सकते थे। बाजी ने तलवार म्यान से निकाली और महाराज के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।
“राजे, यह बाजी अब अपनी अंतिम बाजी खेलेगा। आप विशालगढ़ जाएँ और स्वराज्य की मशाल जलाए रखें। जब तक तोप की गूँज नहीं सुनूँगा, यमराज को भी इस दर्रे की देहरी पार करने नहीं दूँ “।
युद्ध का तांडव (विस्तृत वर्णन):
३०० मावलों ने दर्रे को घेर लिया। सामने सिद्दी मसूद की ३००० की सेना! बाजी प्रभु के दोनों हाथों में ‘दांडपट्टा’ (मराठा तलवार) चमक रहा था। जैसे ही पहली टुकड़ी दर्रे में घुसी, बाजी ने उसे गाजर-मूली की तरह काट दिया।
वीर योद्धाओं के नाम (ऐतिहासिक संदर्भ):
इस युद्ध में केवल बाजी ही नहीं, उनके भाई फुलाजी प्रभु देशपांडे, शंभुसिंह जाधव और सिद्दी हिलाल जैसे वीरों ने भी अपने रक्त का अर्पण किया। बाजी प्रभु का शरीर घावों से भर चुका था। कहते हैं कि उनके कंधे पर घाव इतना गहरा था कि हड्डी दिखने लगी थी, पर बाजी का दांडपट्टा हवा में बिजली की तरह कौंध रहा था।
दृश्य ३: पराकाष्ठा का संघर्ष
दोपहर ढलने को थी, लेकिन घोडखिंड (पावनखिंड) में मौत का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा था। सिद्दी मसूद की सेना बार-बार हमला करती और हर बार बाजी प्रभु के ३०० मावलों की दीवार से टकराकर चकनाचूर हो जाती। बाजी प्रभु अब केवल एक योद्धा नहीं रहे थे, वे एक दैवीय शक्ति बन चुके थे। उनके शरीर पर वार करने की अब कोई जगह शेष नहीं थी।
अश्विनी राय ‘अरुण’ का मर्मस्पर्शी विश्लेषण:
इतिहास की किताबों में कई युद्ध दर्ज हैं, पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जहाँ एक व्यक्ति का धड़ कटने के बाद भी केवल अपनी ‘इच्छाशक्ति’ के बल पर लड़ता रहा हो। बाजी प्रभु का पेट एक गहरे वार से फट चुका था। सामान्य मनुष्य तो वहीं गिर जाता, पर बाजी ने अपनी धोती का एक सिरा फाड़ा, अपनी अंतड़ियों को भीतर धकेला, उसे कसकर बाँधा और फिर से दहाड़ उठे— “हर-हर महादेव!”
रणभूमि का सन्नाटा और हुंकार:
मसूद के सैनिक पीछे हटने लगे। उन्हें लगा कि वे किसी इंसान से नहीं, बल्कि किसी जिन्न या प्रेत से लड़ रहे हैं जिसे मारना असंभव है। बाजी की आँखें अब धुंधली हो रही थीं, पर कान विशालगढ़ की दिशा में लगे थे। वे मन ही मन कह रहे थे— “राजे, थोड़ा और… बस थोड़ा और समय।”
दृश्य ४: वह अंतिम विजय
विशालगढ़ की तलहटी में भी युद्ध जारी था, जिसे छत्रपति स्वयं लड़ रहे थे। जैसे ही महाराज किले के भीतर सुरक्षित पहुँचे, उन्होंने तुरंत तोपचियों को आदेश दिया।
अचानक, पहाड़ियों को चीरती हुई पहली आवाज़ आई— ‘धूम!’
बाजी प्रभु के कांपते हाथों में जैसे नई ऊर्जा आ गई।
दूसरी गूँज— ‘धूम!’
बाजी ने मुस्कुराते हुए एक और दुश्मन का सिर धड़ से अलग कर दिया।
तीसरी, चौथी और अंततः पाँचवीं गूँज— ‘धूम!’
विशालगढ़ से तोपों की गूँज ने बाजी प्रभु को संदेश दे दिया कि उनके ‘राजे’ अब सुरक्षित हैं। स्वराज्य की मशाल अब नहीं बुझेगी। बाजी ने अपनी तलवारें नीची कीं, आसमान की ओर देखा, और धरती माँ की गोद में ऐसे गिरे जैसे कोई बच्चा थकान के बाद सो जाता है।
उपसंहार: ‘घोडखिंड’ से ‘पावनखिंड’ का सफर
जब शिवाजी महाराज को बाजी प्रभु के बलिदान का समाचार मिला, तो उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उन्होंने कहा— “बाजी की बदौलत आज स्वराज्य सुरक्षित है।” महाराज ने स्वयं उस दर्रे का नाम ‘पावनखिंड’ रखा, क्योंकि वह बाजी प्रभु देशपांडे और उनके ३०० मावलों के पवित्र रक्त से अभिसिंचित हुआ था।
अश्विनी राय ‘अरुण’ की कलम से (निष्कर्ष):
बाजी प्रभु देशपांडे की यह कहानी हमें सिखाती है कि शरीर नश्वर है, पर स्वामिभक्ति और राष्ट्रभक्ति अमर है। आज २०२६ में, जब हम एक विकसित भारत का सपना देखते हैं, तो हमें बाजी प्रभु जैसे नींव के पत्थरों को नहीं भूलना चाहिए। उनकी यह गाथा हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए शौर्य का सबसे बड़ा ग्रंथ है।
बाजी प्रभु देशपांडे: पावनखिंड के युद्ध का वह महान योद्धा और ऐतिहासिक साक्ष्य