प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’: सामाजिक यथार्थ या घृणा फैलाने वाला प्रायोजित कथानक?
‘सद्गति’ कहानी का मुख्य पात्र दुखी चमार (दलित) है, जो अपनी बेटी की सगाई का मुहूर्त निकलवाने के लिए पंडित घासीराम (ब्राह्मण) के घर जाता है। पंडित उससे बिना किसी पारिश्रमिक के दिन भर कठोर शारीरिक श्रम (लकड़ी चीरना, झाड़ू लगाना) करवाता है। भूखा-प्यासा दुखी लकड़ी चीरते-चीरते दम तोड़ देता है। अंत में पंडित घासीराम उसकी लाश को पाँव में रस्सी बाँधकर घसीटते हुए खेत में फेंक आता है।
आइए, इस कहानी की शल्य-चिकित्सा (Postmortem) तीन प्रमुख वैचारिक कोणों से करते हैं:
१. पात्रों का अस्वाभाविक और एकतरफा दानवीकरण (Stereotyping)
प्रेमचंद ने पंडित घासीराम के चरित्र को इस तरह चित्रित किया है जैसे उसके भीतर दया, धर्म, या सामान्य मानवीय संवेदना का एक कण भी न हो।
पोस्टमार्टम: भारतीय ग्रामीण समाज में बुराइयाँ और विषमताएँ थीं, लेकिन समाज पूरी तरह से अमानवीय राक्षसों से नहीं भरा था। प्रेमचंद ने एक पूरे वर्ग (ब्राह्मण समाज) को अत्यंत क्रूर, हृदयहीन और शोषक के रूप में इस तरह सामान्यीकृत (Stereotype) किया कि पाठक के मन में सुधार के बजाय वर्ग-द्वेष और घृणा का ज्वार उमड़े। यह साहित्य का काम नहीं, बल्कि समाज को विखंडित करने का वामपंथी औज़ार है।
२. पीड़ित का पूर्ण अमानवीकरण और लाचारी का उदात्तीकरण
दुखी चमार को कहानी में एक ऐसे पात्र के रूप में दिखाया गया है जिसके पास न कोई आत्म-सम्मान है, न सोचने की क्षमता, और न ही इनकार करने का साहस। वह भूखा-प्यासा रहकर भी बेगार करता जाता है और अंततः मर जाता है।
पोस्टमार्टम: प्रेमचंद ने शोषित पात्र को इतना असहाय और चेतना-हीन दिखाया कि वह अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाना तो दूर, मना भी नहीं कर सकता। यह पात्र को ‘स्वाभिमानी’ बनाने के बजाय उसकी लाचारी को भुनाने का प्रयास है। प्रगतिशील साहित्य का यह पसंदीदा ढर्रा रहा है—शोषित को इतना असहाय दिखाओ कि क्रांति का एकमात्र रास्ता हिंसक वामपंथ ही बचे।
३. सामाजिक समरसता के सारे द्वार बंद करना
कहानी के अंत में जब दुखी की मृत्यु होती है, तो गाँव का कोई भी व्यक्ति—न तो पंडित और न ही समाज का कोई अन्य अंग—कोई प्रायश्चित करता है। अंत में लाश को घसीटकर फेंका जाता है।
पोस्टमार्टम: इस कहानी का अंत किसी सामाजिक चेतना या सुधार की ओर नहीं ले जाता। यह पाठक के मन में यह स्थायी भाव भर देता है कि इस समाज में कोई उम्मीद नहीं बची है, यहाँ का ताना-बाना पूरी तरह सड़ चुका है। यह सामाजिक समरसता और भातृत्व के भाव को समूल नष्ट करने की साजिश थी।
निष्कर्ष (The Bottom Line)
प्रेमचंद की ‘सद्गति’ सामाजिक सुधार की कहानी नहीं, बल्कि समाज के ताने-बाने को तोड़ने और वर्ग-विद्वेष भड़काने वाली प्रायोजित रचना है।
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