अज्ञेय का ‘शेखर: एक जीवनी’: ‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य’ का सौंदर्य या अनैतिकता और उग्र-अहंकार का उदात्तीकरण?
‘शेखर: एक जीवनी’ एक ऐसे चरित्र (शेखर) की कथा है जो जन्म से ही हर नियम, हर परंपरा, हर संबंध और हर अनुशासन के प्रति विद्रोही है। अज्ञेय उसे फाँसी के फंदे से पहले के अंतिम क्षणों में अपने अतीत का पुनर्मूल्यांकन करते हुए प्रस्तुत करते हैं। परंतु जब शेखर के विद्रोह की प्रकृति को परखा जाता है, तो इसके चार बड़े वैचारिक और नैतिक प्रपंच उजागर होते हैं:
१. संबंधों की मर्यादा का क्षरण और बहन-तुल्य रिश्तों का यौनिक-कुंठा में रूपांतरण
उपन्यास में शेखर और शशि (उसकी मौसी की लड़की, जो रिश्ते में उसकी बहन लगती है) के संबंधों का चित्रण इस कृति का सबसे विवादित और संवेदनहीन पक्ष है।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: अज्ञेय शेखर और शशि के संबंध को पारंपरिक विवाह और सामाजिक बंधनों से परे ‘असीम प्रेम’ और ‘आत्मिक स्वतंत्रता’ का नाम देते हैं।
पोस्टमार्टम: ‘स्वतंत्रता’ के इस बौद्धिक आवरण के पीछे वास्तव में पारिवारिक-सामाजिक वर्जनाओं (Inces-taboo) को तोड़ने और मर्यादाओं के हनन को जायज ठहराने का खेल था। अज्ञेय ने भारतीय परिवार संस्था की बुनियाद—रिश्तों की शुचिता और गरिमा—पर सीधा आघात किया। उन्होंने सामाजिक नैतिकता को ‘बंधन’ और मर्यादाहीन कामुकता को ‘स्वातंत्र्य’ घोषित कर दिया, जिसने युवाओं के मन में रिश्तों के प्रति अविश्वास और अराजकता पैदा की।
२. उग्र-अहंकार (Self-Obsession/Narcissism) को ‘महानता’ का दर्जा
शेखर का चरित्र किसी सामाजिक क्रांति या देश-हित के लिए विद्रोही नहीं बनता, बल्कि उसका विद्रोह केवल उसके अपने ‘अहं’ (Ego) की तुष्टि के लिए है।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: शेखर किसी का अनुशासन स्वीकार नहीं कर सकता—न माता-पिता का, न गुरु का, न समाज का और न ही धर्म का। उसे हर स्थापित व्यवस्था ‘दमनकारी’ लगती है।
पोस्टमार्टम: यह यथार्थवादी मनोविज्ञान नहीं, बल्कि उग्र नार्सिसिज्म (Narcissism/आत्म-मुग्धता) का उदात्तीकरण था। अज्ञेय ने यह संदेश दिया कि जो व्यक्ति जितना अधिक अनुशासनहीन, अभद्र और दूसरों की भावनाओं के प्रति निष्ठुर होगा, वह उतना ही बड़ा ‘विचारक’ और ‘विद्रोही’ है। इसने युवाओं को सामाजिक उत्तरदायित्वों से काटकर केवल अपने स्वार्थ और अहं के इर्द-गिर्द सिमटने की प्रेरणा दी।
३. मातृ-सत्ता और माता के चरित्र का घृणास्पद चित्रण
कहानी में शेखर का अपनी माँ के साथ संबंध अत्यंत कटु और विकृत दिखाया गया है।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: माँ को एक कठोर, तानाशाह और अव्यावहारिक स्त्री के रूप में चित्रित करना जिससे शेखर निरंतर घृणा करता है।
पोस्टमार्टम: फ्रायडवादी (Freudian) मनोविज्ञान की अधकचरी समझ को भारतीय परिवेश पर जबरन थोपने की कोशिश की गई। भारतीय संस्कृति में माँ का पद सर्वोपरि और पूजनीय रहा है, लेकिन अज्ञेय ने मातृ-प्रेम को शंकास्पद और दमनकारी बनाकर प्रस्तुत किया, ताकि पाठक के मन में अपने ही पारिवारिक संस्कारों के प्रति वितृष्णा पैदा हो।
४. क्रांतिकारी आंदोलनों का रोमांटिक और अव्यवस्थित उपयोग
शेखर का झुकाव कुछ समय के लिए स्वाधीनता संग्राम और उग्रवादी क्रांतिकारियों की ओर भी दिखाया जाता है।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: शेखर का देशप्रेम किसी विचारधारा या संगठन से संचालित न होकर केवल उसकी निजी सनक और रोमांच (Thrill) का हिस्सा है।
पोस्टमार्टम: अज्ञेय ने भारत के महान स्वाधीनता संग्राम और क्रांतिकारियों के आत्मोत्सर्ग को शेखर जैसे ‘पथभ्रष्ट और कुंठित मानसिक स्थिति वाले युवा’ का निजी खिलौना बना दिया। शेखर का देशप्रेम देश के लिए नहीं, बल्कि अपनी ही पीड़ा (Suffering) और आत्म-दया (Self-pity) का एक नाटक था।
निष्कर्ष (The Bottom Line)
अज्ञेय का ‘शेखर: एक जीवनी’ कोई महान मनोवैज्ञानिक क्रांति नहीं, बल्कि पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं का बौद्धिक विध्वंस है।
इस उपन्यास ने:
१. ‘व्यक्ति-स्वातंत्र्य’ के नाम पर नैतिक वर्जनाओं और रिश्तों की पवित्रता को नष्ट किया।
२. उग्र-अहंकार, अनुशासनहीनता और अनैतिकता को ‘उच्च बौद्धिकता’ का दर्जा दिया।
३. पारिवारिक संस्कारों और मातृ-संवेदना के प्रति घृणा का भाव जगाकर युवा पीढ़ी को समाज-विमुख बनाया।
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