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महागाथा ‘मास्टर दा’ की: चटगाँव विद्रोह, बर्बरता का अंत और आज़ादी का सुनहरा सपना

 

“दाँत तोड़े, नाखून उखाड़े, पर वो झुका न पाए शीश को,

खाड़ी के पानी में बहा दिया, उस अजर-अमर जगदीश को।”

इतिहास की किताबों के धुंधले पन्नों से अलग, कुछ नायक ऐसे होते हैं जिनकी गाथाएँ वक़्त की छाती पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो जाती हैं। एक ऐसा ही नाम है—सूर्य सेन। जिन्हें बंगाल की मिट्टी और देश का हर देशभक्त बड़े प्यार और आदर से “मास्टर दा” कहकर पुकारता था। २२ मार्च १८९४ को चटगांव के नोआपाड़ा के निवासी रामानिरंजन के यहां जन्मा यह सीधा-साधा स्कूल शिक्षक, ब्रिटिश हुकूमत के लिए वो काल बनेगा, जिसकी कल्पना गोरी सरकार ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

नेशनल हाईस्कूल के इस सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक की आँखों में केवल छात्रों का भविष्य नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र भारत का सुनहरा सपना तैर रहा था।

 

क्रांति की पाठशाला और युगान्तर का प्रभाव

कहानी की शुरुआत १९१६ से होती है, जब इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान एक अध्यापक ने युवा सूर्य सेन के भीतर राष्ट्रभक्ति की चिंगारी सुलगाई। यह चिंगारी तब शोला बनी, जब वे ‘अनुशीलन समिति’ से जुड़े। इसके बाद, बहरामपुर कॉलेज (अब मुर्शिदाबाद विश्वविद्यालय) से बी.ए. की पढ़ाई के दौरान उनका परिचय ‘युगान्तर’ दल के क्रांतिकारी विचारों से हुआ। यहीं से मास्टर दा ने कलम के साथ-साथ क्रांति का ककहरा भी सीखना और सिखाना शुरू कर दिया।

 

१८ अप्रैल १९३०: जब चटगाँव में ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हुआ

इतिहासकार एम. मलिक के अनुसार, यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वो टर्निंग पॉइंट है, जिसने अंग्रेजों के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी थी। मास्टर दा ने बंगाल के आज़ादी के दीवानों को संगठित कर ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ (IRA) का गठन किया।

१८ अप्रैल १९३० की उस ऐतिहासिक रात को, मास्टर दा के नेतृत्व में दर्जनों जाँबाज़ों ने चटगाँव के सरकारी शस्त्रागार पर धावा बोल दिया। क्रांति की वह ज्वाला ऐसी भड़की कि हुकूमत के नुमाइंदे अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। यूनियन जैक को उखाड़ फेंका गया और तिरंगा फहराकर चटगाँव को कुछ दिनों के लिए पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। ब्रिटिश साम्राज्य के इतिहास में यह एक ऐसा करारा तमाचा था, जिसकी गूँज लंदन तक सुनाई दी।

 

महासमर का विस्तार और वीरांगनाओं का शौर्य

चटगाँव की इस चिंगारी ने पूरे देश में दावानल का काम किया।

पंजाब में वीर हरिकिशन ने वहाँ के गवर्नर की हत्या का प्रयास किया।

दिसंबर १९३० में विनय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता की तिकड़ी ने कलकत्ता की ‘राइटर्स बिल्डिंग’ में घुसकर अत्याचारी पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया।

मास्टर दा की इस सेना में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि दो साहसी बेटियाँ—प्रीतिलता वाद्देदार और कल्पना दत्त भी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रही थीं। सत्ता डगमगाते देख अंग्रेज अपनी चिरपरिचित बर्बरता पर उतर आए। जब चारों तरफ से घेरा कड़ा हुआ, तो वीरांगना प्रीतिलता ने आत्मसमर्पण करने के बजाय ज़हर खाकर मातृभूमि की गोद में सोना स्वीकार किया, जबकि कल्पना दत्त को देश निकाला यानी आजीवन कारावास की सज़ा हुई।

 

छल का जाल, क्रूरता की पराकाष्ठा और अंतिम बलिदान

इस महाविद्रोह के बाद मास्टर दा छिपकर संगठन चलाते रहे। वे कभी किसान, कभी पुजारी, तो कभी एक धार्मिक मुसलमान का भेष धरकर अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकते रहे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। मास्टर दा ने ‘नेत्र सेन’ नाम के एक व्यक्ति के घर शरण ली। मगर धन के लालच में आकर उस गद्दार ने ब्रिटिश पुलिस को मुखबिरी कर दी और फरवरी १९३३ में मास्टर दा को गिरफ्तार कर लिया गया।

देशभक्ति का न्याय: इससे पहले कि गद्दार नेत्र सेन अंग्रेजों से अपना इनाम ले पाता, क्रांतिकारी किरण सेन हाथ में एक लंबा चाकू (दा) लेकर उसके घर में घुसे और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। नेत्र सेन की पत्नी स्वयं मास्टर दा की बड़ी समर्थक थीं, इसलिए उन्होंने कोर्ट में कभी उस वीर क्रांतिकारी का नाम उजागर नहीं किया जिसने उनके पापी पति को दंड दिया था।

१२ जनवरी १९३४ को फाँसी देने से पहले, अमानवीय ब्रिटिश शासकों ने मास्टर दा पर वो जुल्म ढाए जिन्हें सुनकर आज भी रूह काँप जाती है। जल्लादों ने हथौड़े से उनके सारे दाँत तोड़ दिए, प्लास से एक-एक नाखून खींच लिया और शरीर के सारे जोड़ तोड़ डाले। जब उनका अचेत और लहूलुहान शरीर फाँसी के फंदे तक घसीटकर लाया गया, तब भी उनके चेहरे पर आज़ादी की चमक थी। उनके साथ वीर क्रांतिकारी तारकेश्वर दस्तीदार को भी फाँसी दी गई।

क्रूरता की हद तो तब पार हुई जब उनके मृत शरीर को अंतिम संस्कार तक नहीं दिया गया। अंग्रेजों ने उनके पार्थिव शरीर को एक लोहे के पिंजरे में बंद किया और बंगाल की खाड़ी के अथाह पानी में फेंक दिया।

 

मास्टर दा का वसीयतनामा और अमर स्मृतियाँ

अपनी मृत्यु से ठीक पहले, उन्होंने अपने मित्रों को लिखे अंतिम पत्र में कहा था:

“मौत मेरे दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। मेरा मन अनंत काल की ओर उड़ रहा है… ऐसे सुखद समय पर, मैं तुम सबके पास क्या छोड़ जाऊँगा? केवल एक चीज़—यह मेरा सपना है, एक सुनहरा सपना—स्वतंत्र भारत का सपना। १८ अप्रैल १९३०, चटगाँव के विद्रोह के दिन को कभी मत भूलना… अपने दिल में उन देशभक्तों के नामों को स्वर्णिम अक्षरों में लिखना जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की वेदी पर अपना जीवन बलिदान किया है।”

 

इतिहास और कला जगत में मास्टर दा का स्थान

इस महान हुतात्मा की स्मृति में भारत सरकार ने १९७८ में और बांग्लादेश की सरकार ने १९९९ में डाक टिकट जारी किए। बांग्लादेश सरकार ने चटगाँव जेल के उस फाँसी वाले स्थान को एक पवित्र स्मृति स्थल का रूप दिया है। कोलकाता मेट्रो ने बांशद्रोणी स्टेशन का नाम ‘मास्टर सूर्य सेन मेट्रो स्टेशन’ रखकर उन्हें नमन किया है। दक्षिणेश्वर के पास ‘सूर्य सेन रोड’ आज भी उनके नाम की गवाही देती है।

 

साहित्य और सिनेमा ने भी इस वीर को अमर रखने का प्रयास किया है:

कल्पना दत्त की बहू मानिनी दे ने उन पर ‘डू ऑर डाई’ (Do or Die) नामक प्रामाणिक पुस्तक लिखी।

आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ (२०१०) में अभिनेता अभिषेक बच्चन ने और बेदब्रत पाइन की फिल्म ‘चिटगाँव’ (२०१२) में महान अभिनेता मनोज वाजपेयी ने ‘मास्टर दा’ के जीवंत और जुझारू चरित्र को परदे पर अमर कर दिया।

आज भी, कोलकाता उच्च न्यायालय के ठीक सामने लगी ‘मास्टर दा’ की एकमात्र पूर्णाकार मूर्ति हमें याद दिलाती है कि हमारी आज़ादी की कीमत क्या थी।

शत-शत नमन इस अमर बलिदानी को!

वन्दे मातरम्!

अश्विनी राय ‘अरूण’

मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार

 

 

रामकथा के विविध आयाम: अयोध्या शोध संस्थान की ऐतिहासिक पुस्तक में लेखक अश्विनी राय ‘अरुण’ का दार्शनिक लेख

 

 

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