रामकथा के विविध आयाम: संस्कृति का प्राकट्य और पूर्णता का दर्शन

 

​”पूर्ण से पूर्ण का अवतरण ही शाश्वत विधान है, और रामकथा के विविध आयामों में ही संस्कृति का प्राण है।”

​रचना: रामकथा के विविध आयाम

​साझा संकलन: राम कथा के विविध परिप्रेक्ष्य!

​प्रकाशक: अयोध्या शोध संस्थान, अयोध्या

​शोधकर्ता व लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​१. ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

​यह महज़ एक लेख या रचना नहीं है, बल्कि भव्य श्री राम मंदिर निर्माण के उस पावन कालखंड से पूर्व, अयोध्या शोध संस्थान के वृहद् सभागार में लोकार्पित एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ का हिस्सा है। जब संपूर्ण राष्ट्र रामलला के आगमन की प्रतीक्षा में वैचारिक रूप से उद्वेलित था, तब ‘राम कथा के विविध परिप्रेक्ष्य!’ नामक इस साझा संकलन में मेरी इस शोधपरक रचना ‘रामकथा के विविध आयाम’ को स्थान मिला। यह आलेख भारतीय संस्कृति के मूल अधिष्ठान और रामकथा की प्रासंगिकता पर एक गंभीर विमर्श है।

 

​२. संस्कृति का जन्म और प्रकृति पर विजय

​मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि जब मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र और आवास) को सरलता से पूरा करने में सक्षम हो गया, अर्थात जब उसने आदिम अवस्था से निकलकर प्रकृति की प्रतिकूलताओं पर पूर्णतया नियंत्रण स्थापित कर लिया, उसके पश्चात ही उसने एक सुसभ्य, अनुशासित और सुगठित समाज का निर्माण किया।

​इसी सभ्य समाज की वैचारिक और आत्मिक प्रगति के परिणामस्वरूप हमारी ‘संस्कृति’ का जन्म हुआ। भारतीय संस्कृति का मूल ध्येय केवल भौतिक संपदा का संचय करना कभी नहीं रहा, बल्कि इसका मूल आधार सदैव मनुष्य को आंतरिक और आध्यात्मिक पूर्णता प्रदान करना ही रहा है।

 

​३. पूर्णता का सनातन दर्शन: उपनिषद् का मर्म

​भारतीय मनीषा का परम सत्य ईशावास्योपनिषद् के उस शांति पाठ में निहित है, जिसका उल्लेख इस शोध-लेख में विधिक रूप से किया गया है:

​ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

​अर्थात्, वह परब्रह्म पूर्ण है और उसकी यह दृश्यमान सृष्टि भी पूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्म से ही इस पूर्ण जगत का आगमन (उत्पत्ति) हुआ है। यदि उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल भी दिया जाए (अर्थात प्रलय काल में सृष्टि का लय भी हो जाए), तो भी अंत में केवल ‘पूर्ण’ (वह शाश्वत ब्रह्म) ही शेष रहता है।

​रामकथा वास्तव में इसी पूर्णता को मानव रूप में धरातल पर उतारने का नाम है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का चरित्र इसी पूर्ण ब्रह्म की लौकिक और आदर्श अभिव्यक्ति है, जो समाज को शून्य से पूर्णता की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

​(क्रमशः… इसी पुस्तक से)

​जय सियाराम!

अश्विनी राय ‘अरूण’

मांगोडेहरी, बक्सर, बिहार

 

 

ब्लॉसम ऑफ वर्ड्स: ‘The Spirit Mania’ प्रकाशन और अंजलि जी के प्रति लेखक अश्विनी राय ‘अरुण’ का कृतज्ञता संदेश

 

 

 

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