इलाहाबाद विश्वविद्यालय का वह हॉस्टल का कमरा, मेज पर बिखरी किताबें, सिगरेट का सुलगता हुआ धुआं और खिड़की के बाहर थरथराते डैफोडिल्स के फूल… यहीं से शुरू होती है चंदर और सुधा के उस प्रेम की इबारत, जिसे डॉ. धर्मवीर भारती ने ‘गुनाहों का देवता’ कहकर पुकारा।
देवत्व का मुखौटा और सुबकती मोहब्बत: ‘गुनाहों का देवता’ की संपूर्ण महायात्रा
सुबह की भीनी धूप जब प्रोफेसर साहब के सिविल लाइंस वाले आलीशान बंगले के आंगन में उतरती थी, तो ऐसा लगता था मानो शुचिता और मर्यादा ने खुद उस घर को अपना ठिकाना बना लिया हो। चंदर, जो प्रोफेसर साहब का सबसे मेधावी छात्र था, उनके उपकारों और आदर्शों के इतने गहरे बोझ तले दबा था कि वह खुद को उस घर का एक हिस्सा मानने लगा था। और वहीं थी सुधा—चंचल, निष्पाप, अल्हड़, जिसके लिए चंदर ही उसकी दुनिया का केंद्र था।
इन दोनों के बीच जो पनपा, वह सिर्फ प्रेम नहीं था, वह एक ऐसी रूहानी इबादत थी जिसमें जिस्म की कोई चाह नहीं थी। लेकिन इस निश्छल प्रेम पर जब ‘देवत्व’ और ‘आदर्श’ का अत्यधिक भूत सवार हुआ, तो जिंदगी के सुर बिगड़ने लगे। चंदर खुद को देवता साबित करने की होड़ में इतना अंधा हो गया कि जब प्रोफेसर साहब ने सुधा के विवाह का प्रस्ताव किसी और के साथ रखा, तो चंदर ने अपने दिल की आवाज को दबा दिया। उसने अपने ही हाथों सुधा का आंचल किसी और को सौंप दिया।
शायद उस वक्त चंदर के भीतर का द्वंद्व और उसका दर्द इस मशहूर शेर की तरह छटपटा रहा था:
तुम्हें पाने की हसरत में, खुद को खो दिया मैंने,
मर्यादा के अंधे खेल में, दिल को रो दिया मैंने।
विनती: मूक समर्पण की जलती हुई लौ
जैसे ही सुधा विदा होकर इस कहानी के मुख्य मंच से दूर जाती है, वैसे ही प्रयागराज के उस सन्नाटे में एक और किरदार उभरता है—विनती। जहाँ सुधा का प्रेम मुखर था, अधिकारपूर्ण था, वहीं विनती का चरित्र इस उपन्यास की सबसे मर्मस्पर्शी और मूक वेदना है।
विनती चंदर से प्रेम करती है, लेकिन उसके प्रेम में कोई मांग नहीं है, कोई लालसा नहीं है। वह जानती है कि चंदर के दिल के गर्भगृह में सिर्फ सुधा की मूरत स्थापित है, फिर भी वह चुपचाप चंदर के हर रूप को स्वीकार करती है। जब चंदर समाज से, आदर्शों से टूटकर पतन की ओर बढ़ रहा होता है, तब भी विनती एक साए की तरह उसके साथ खड़ी रहती है। वह एक ऐसी भारतीय नारी की मूक सिसकी है जो सिर्फ देना जानती है, दीपक की तरह खुद जलकर दूसरों के जीवन में उजाला करना जानती है।
पम्मी, उसका भाई और वह गुलाब का बगीचा
जब इंसान अंदर से पूरी तरह खाली हो जाता है, तो वह उस खालीपन को भरने के लिए भटकाव की राह पकड़ता है। सुधा को खोने के बाद चंदर का तथाकथित ‘देवत्व’ एक ढोंग साबित होने लगा था। वह खुद से नफरत करने लगा था और इसी छटपटाहट में उसकी मुलाकात होती है पम्मी से।
पम्मी आधुनिकता, बेबाकी और एक अलग किस्म के अल्हड़पन से भरी हुई है। वह समाज के नियमों को अपने सैंडल की नोक पर रखती है।
गुलाब का बगीचा: पम्मी का भाई और उनके घर के ‘गुलाब का बगीचा’ इस कहानी में रंगों और खुशबुओं का एक नया संसार रचते हैं। वह गुलाब का बगीचा महज़ फूलों का झुंड नहीं था; वह पम्मी के भीतर की उन कोमल भावनाओं और उस छिपे हुए प्रेम का प्रतीक था, जिसे वह अपनी आधुनिकता के झूठे मुखौटे के पीछे छुपाए रखती थी।
भटकाव की रातें: पम्मी और चंदर का रिश्ता जीवन के उस भटकाव को दिखाता है जहाँ पवित्रता के सारे नियम टूट जाते हैं। चंदर पम्मी के जिस्म में अपनी रूह के जख्मों का मरहम ढूंढने की कोशिश करता है, लेकिन हर रात के बाद उसका खालीपन और गहरा हो जाता है।
गेसू, यूनिवर्सिटी और पढ़ाकू साथियों की दुनिया
प्रयागराज विश्वविद्यालय (इलाहाबाद यूनिवर्सिटी) इस कहानी की रीढ़ है। ‘गेसू’ और यूनिवर्सिटी के वे तमाम पढ़ाकू मित्र केवल पात्र नहीं हैं, वे उस दौर के बौद्धिक समाज का जीवंत आईना हैं।
होस्टलों के कमरों में सिगरेट के धुएं और चाय की प्यालियों के बीच मार्क्स, फ्रायड और दर्शनशास्त्र पर बड़ी-बड़ी बहसें होती थीं। गेसू और उसके साथी दुनिया भर के क्रांतिकारी विचारों पर तो बात करते थे, लेकिन जब खुद के जीवन में जाति, धर्म और सामाजिक रूढ़ियों से लड़ने का वक्त आता था, तो वे सब घुटने टेक देते थे। चंदर भी उसी यूनिवर्सिटी का सबसे चमकीला सितारा था, जो अपनी किताबों और रिसर्च में तो अव्वल रहा, लेकिन जिंदगी के व्यावहारिक इम्तिहान में बुरी तरह फेल हो गया।
जब शहर खुद एक किरदार बन जाए: प्रयागराज का भूगोल
भारती जी ने इस उपन्यास में प्रयागराज को सिर्फ एक पृष्ठभूमि नहीं रखा, बल्कि वह शहर खुद चंदर और सुधा के सुख-दुख को जीता है:
अल्फ़्रेड पार्क: यह वह गवाह है जहाँ चंदर और सुधा ने न जाने कितनी शामें गुज़ार दीं। वहाँ के पेड़ों की छांव, डैफोडिल्स के फूल और शाम की ठंडी हवाएं आज भी इन दोनों के मूक संवादों और आंसुओं की गवाही देती हैं।
द चौक: जहाँ एक तरफ यूनिवर्सिटी और सिविल लाइंस की दुनिया शांत और संभ्रांत थी, वहीं ‘चौक’ का इलाका अपनी पूरी रंगीनियत, भीड़-भाड़ और चकाचौंध के साथ खड़ा था। जब चंदर अपने अंदर के वैचारिक तूफ़ान से भागना चाहता था, तो वह खुद को चौक की इसी अंधाधुंध भीड़ में गुम कर देना चाहता था।
सिविल लाइंस: वह इलाका जो ऊंचे वर्ग, भव्य बंगलों और एक सख्त अनुशासन को दिखाता था। प्रोफेसर साहब का बंगला इसी सिविल लाइंस की मर्यादाओं का प्रतीक था, जिसकी अदृश्य दीवारों को लांघने की हिम्मत चंदर कभी नहीं कर पाया।
गुनाह, देवत्व और खुद से सच बोलने का संकट
कहानी का सबसे बड़ा सच यही है कि चंदर का गुनाह यह नहीं था कि उसने सुधा से बेपनाह मोहब्बत की; उसका गुनाह यह था कि उसने सुधा, विनती, पम्मी और खुद से—सबके साथ एक ही समय पर न्याय करने और ‘देवता’ बनने के चक्कर में किसी के साथ भी सच का दामन नहीं थामा। वह हाड़-मांस के इंसानों के बीच रहकर पत्थरों के नियम चलाना चाहता था।
उपन्यास का अंत सुधा की मृत्यु और चंदर के कभी न खत्म होने वाले पछतावे के साथ एक ऐसा सन्नाटा बुनता है, जो पाठक के दिल को चीर कर रख देता है। तब भारती जी की यह शायरी दिल की गहराइयों में गूंजती है:
चली गई वह छोड़ कर इस महफ़िल को वीरान,
अब ढूँढता फिरे चंदर, अपनी ही रूह का मकाम।
’गुनाहों का देवता’ आज के युवाओं को यही सिखाता है कि प्यार करो तो उसमें पूरी ईमानदारी रखो, संस्कारों का सम्मान करो लेकिन अपनी आत्मा की आवाज़ को मत दबाओ, और जिंदगी में चाहे जो हो जाए—कम से कम खुद से सच बोलने की हिम्मत कभी मत हारना।
धन्यवाद !
डॉ. धर्मवीर भारती का जीवन परिचय: ‘गुनाहों का देवता’ से ‘अंधा युग’ तक का सफर