गुनाहों का देवता और वैचारिक क्रांति: डॉ. धर्मवीर भारती का अमर साहित्यिक अवदान
“छह बरस से साठ बरस तक की कौन-सी ऐसी स्त्री है, जो अपने रूप की प्रशंसा पर बेहोश न हो जाए।”
हिंदी साहित्य के सबसे लोकप्रिय और कालजयी उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ का यह प्रसंग आज भी पाठकों को भाव-विभोर कर देता है। इस अमर कृति के रचनाकार कोई और नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लेखक, नाटककार, प्रखर कवि और गंभीर सामाजिक विचारक डॉ. धर्मवीर भारती थे। भारती जी की लेखनी में रूमानियत की भीनी खुशबू भी थी और समाज की कड़वी सच्चाइयों को बेनकाब करने वाला आक्रोश भी।
प्रारंभिक जीवन और अकादमिक उत्कर्ष
डॉ. धर्मवीर भारती जी का जन्म २५ दिसंबर १९२६ को सांस्कृतिक और साहित्यिक नगरी इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुआ था। उनके पिता श्री चिरंजीव लाल वर्मा और माता श्रीमती चंदादेवी ने उनके भीतर बचपन से ही संस्कारों का बीजारोपण किया था। उनकी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा डी.ए.वी. हाई स्कूल में हुई और उच्च शिक्षा के लिए वे प्रसिद्ध प्रयाग विश्वविद्यालय पहुँचे।
वहाँ से प्रथम श्रेणी में एम.ए. करने के बाद, उन्होंने ‘सिद्ध साहित्य’ पर अपना शोध प्रबंध प्रस्तुत कर पी-एच.डी. (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की। भारती जी के जीवन में केवल दो ही मुख्य व्यसन थे: अध्ययन और यात्रा। यही कारण है कि उनके विशद अध्ययन और देश-विदेश के यात्रा-अनुभवों का गहरा प्रभाव उनके पूरे साहित्य में स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने स्वयं लिखा था:
“जानने की प्रक्रिया में होने और जीने की प्रक्रिया में जानने वाला मिज़ाज़ जिन लोगों का है, उनमें मैं अपने को पाता हूँ।” (ठेले पर हिमालय)
प्रयोगधर्मिता और रंगमंच पर ‘अंधा युग’ का महा-प्रस्थान
भारती जी की रचनात्मकता बहुआयामी थी। उनके उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ को हिंदी कथा-साहित्य में कहानी कहने का एक अनुपम और क्रांतिकारी प्रयोग माना जाता है, जिस पर आगे चलकर विख्यात फिल्मकार श्याम बेनेगल ने इसी नाम से एक अद्भुत फिल्म का निर्माण किया।
वहीं दूसरी ओर, उनका लिखा ‘अंधा युग’ एक ऐसा अमर और प्रासंगिक गीति-नाट्य है, जो महाभारत के युद्ध के अंतिम दिन पर आधारित होते हुए भी स्वातंत्र्योत्तर भारत (आज़ादी के बाद) में आई नैतिक मूल्यहीनता, अमानवीयता और वैचारिक अंधेपन के प्रति गहरी चिंता व्यक्त करता है। इब्राहिम अलकाज़ी, राम गोपाल बजाज, अरविन्द गौड़, रतन थियम, एम.के. रैना और मोहन महर्षि जैसे भारतीय रंगमंच के तमाम दिग्गज निर्देशकों ने इस नाटक का देश-विदेश में अनगिनत बार मंचन किया है।
भारती जी का वैचारिक बल हमेशा पूर्व और पश्चिम के जीवन-मूल्यों, जीवन-शैली और मानसिकता के संतुलन पर रहा। वे न तो किसी विचारधारा का अंधा विरोध करते थे और न ही अंधा समर्थन। उनका स्पष्ट मानना था:
”पश्चिम का अंधानुकरण करने की कोई ज़रूरत नहीं है, पर पश्चिम के विरोध के नाम पर मध्यकाल में तिरस्कृत और सड़े-गले मूल्यों को भी अपनाने की ज़रूरत नहीं है।”
यदि किसी को समाज, देश या विश्व की नब्ज़ को भारती जी की दृष्टि से समझना हो, तो उनका कोई भी उपन्यास, कहानी संग्रह (जैसे ‘गुलकी बन्नो’) या निबंध संकलन उठाकर देख सकता है।
सम्मान, पुरस्कार और जीवन की कड़वी मजबूरी
साहित्य और पत्रकारिता (विशेषकर ‘धर्मयुग’ पत्रिका के संपादन) के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें अपने जीवनकाल में अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया:
पद्मश्री (भारत सरकार)
व्यास सम्मान (के.के. बिड़ला फाउंडेशन)
भारत भारती सम्मान (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
राजेन्द्र प्रसाद सम्मान
महाराष्ट्र गौरव
महाराजा मेवाड़ फाउंडेशन का सर्वश्रेष्ठ नाटककार पुरस्कार
वैली टर्मेरिक द्वारा सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार
परंतु, जीवन के उत्तरार्ध में सामाजिक विसंगतियों और मानवीय क्रूरता को करीब से देखने वाले इस संवेदनशील लेखक ने एक बेहद मर्मभेदी बात कही थी:
“मनुष्य का एक स्वभाव होता है। जब वह दूसरे पर दया करता है तो वह चाहता है कि याचक पूरी तरह विनम्र होकर उसे स्वीकार करे। अगर याचक दान लेने में कहीं भी स्वाभिमान दिखाता है तो आदमी अपनी दानवृत्ति और दयाभाव भूलकर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है।”
यह पंक्तियाँ सोचने पर विवश करती हैं कि समाज के किस खोखलेपन या किस छद्म दानी के अहंकार ने भारती जी जैसी महान आत्मा को इतना आहत किया होगा, जिसने उन्हें यह लिखने पर मजबूर कर दिया कि लोग दया के नाम पर भी सामने वाले के स्वाभिमान को कुचलना चाहते हैं।
महाप्रयाण: क्या ऐसा होना चाहिए था?
और फिर, हिंदी साहित्याकाश का यह सूर्य हमेशा के लिए अस्त हो गया। ४ सितंबर १९९७ को मायानगरी मुंबई में ७० वर्ष की आयु में डॉ. धर्मवीर भारती जी इस नश्वर संसार को छोड़कर महाप्रयाण कर गए।
अश्विनी, आपसे यह प्रश्न पूछता है कि “क्या ऐसा होना चाहिए था?”—हर उस साहित्य प्रेमी के दिल की हूक है जो भारती जी को पढ़ता है। ७० साल की उम्र साहित्य के इस ‘देवता’ के लिए बहुत कम थी। यदि नियति उन्हें कुछ वर्ष और देती, तो हिंदी साहित्याकाश कुछ और अद्भुत मोतियों से समृद्ध होता। परंतु विधाता के विधान के आगे सब विवश हैं; वे चले गए, लेकिन अपने पीछे विचारों, शब्दों और भावनाओं का एक ऐसा अमर समंदर छोड़ गए जो आने वाली सदियों तक भटके हुए समाज को रास्ता दिखाता रहेगा।
हिंदी के इस परम साधक, प्रखर सामाजिक चेतना के संवाहक और युग-द्रष्टा लेखक को अश्विनी राय ‘अरुण’ का कोटि-कोटि सादर नमन!
धन्यवाद !
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