यह मेरा घर: संस्कारों और स्मृतियों का आशियाना
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
एक भौतिक स्थान के रूप में ‘घर’ की परिभाषा वह मकान होती है, जहाँ शरण या आराम की मानसिक अथवा भावनात्मक तृप्ति प्राप्त हो।
यह मेरा घर
यह मेरा घर,
प्यारा घर,
मेरे बचपन का न्यारा घर,
यह मेरा घर।
बचपन गुज़रा,
अल्हड़पन गुज़रा…
यहीं पे गुज़री कुल्हड़ वाले पानी की वो कहानी।
आई जवानी…
अरे हाँ, रे हाँ! आई जवानी लिखने नई कहानी।
यहीं तो आई यह जवानी।
अपनों का संग लेकर, सपनों को संग लेकर,
यह तो है मेरा घर,
जहाँ गुज़रा बचपन, आई जवानी।
मेरा प्यारा घर,
सपनों से सुंदर न्यारा घर।
यह मेरा घर!
घर वो है जो संस्कारों से पोषित हो, जहाँ माँ के ममता भरे हाथ हों और पिता की छत्रछाया हो। जहाँ भाई-बहनों का अटूट प्यार बरसता हो; जहाँ सुबह अलसाई सी और शाम सुकून से नशीली हो। जहाँ बच्चों का खिलखिलाता शोर हो; जहाँ पायल की रुनझुन और चूड़ियों की खनखनाहट का अनूठा संगीत हो, और नन्हें कदमों की तुतलाहट भरे गीत हों। जहाँ रूठने-मनाने का जीवंत एक्शन हो, तो कभी एक-दूसरे को चिढ़ाती खट्टी-मीठी कॉमेडी। जहाँ पिता का कड़क अंदाज़ हो, तो माँ का वात्सल्य भरा दुलार।
और क्या कहूँ, कुछ-कुछ ऐसा ही तो है मेरा घर। प्यारा घर, न्यारा घर! सपनों से भी प्यारा घर!
धन्यवाद!