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सुरों का सिकंदर और संघर्ष की महागाथा: संगीतकार प्यारेलाल के जीवन का संगीतमय सफ़र

 

“ज़ु ज़ु ज़ू ज़ु ज़ू ज़ु ज़ु ज़ु ज़ु ज़ू…

यशोदा का नंदलाला बृज का उजाला है,

मेरे लाल से तो सारा जग झिलमिलाए…”

​जब ३ सितंबर १९४० को प्रसिद्ध बिगुल वादक पंडित रामप्रसाद शर्मा जी के घर एक नन्हे बालक ने जन्म लिया, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह बच्चा आगे चलकर भारतीय सिनेमा के संगीत का भूगोल बदल देगा। पिता ने लाडले का नाम रखा—प्यारेलाल। पिता ही प्यारेलाल के पहले गुरु बने, जिन्होंने उन्हें संगीत की मूल बातें, सुरों का उतार-चढ़ाव और वायलिन की जादुई बारीकियां सिखानी शुरू कीं।

 

१२ वर्ष की अल्पायु और रंजीत स्टूडियो की वो तंग गलियाँ

​नियति हमेशा बड़े कलाकारों की परीक्षा कड़े इम्तिहानों से लेती है। जब प्यारेलाल के परिवार की वित्तीय स्थिति बेहद खराब हो गई, तो घर में चूल्हा जलना भी दूभर हो गया। ऐसे में महज़ १२ वर्ष की नन्ही सी उम्र में, जहाँ बच्चों के हाथों में खिलौने और किताबें होती हैं, प्यारेलाल के हाथों में भारी-भरकम वायलिन आ गया।

​वे मुंबई के ‘रंजीत स्टूडियो’ और अन्य रिकॉर्डिंग रूम्स के चक्कर काटने लगे ताकि वायलिन बजाकर परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर सकें। उस दौर की तंगहाली और उनके दिल की छटपटाहट शायद मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में इस अमर गीत की तरह गूंजती रही होगी:

“राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है,

दुख तो अपना साथी है…

सुख है एक छाँव ढलती आती है जाती है,

दुख तो अपना साथी है…”

 

जब लक्ष्मी से मिले प्यारे: एक अमर दोस्ती की शुरुआत

​मुश्किलें चाहे जितनी थीं, लेकिन प्यारेलाल के हौसले कभी कम नहीं हुए। वे बेहद महत्वाकांक्षी थे; अपनी उंगलियों और वायलिन के दम पर दुनिया फतह करना और देश-विदेश की यात्राएं करना उनका सपना था। और इसी सपने को पंख मिले जब उनकी मुलाकात अपने से ३ साल बड़े एक लड़के से हुई—लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर।

​प्यारेलाल जी उन दिनों को याद करते हुए भावुक होकर कहते हैं:

​”उन दिनों लक्ष्मीकांत ‘पंडित हुस्नलाल भगतराम’ के साथ काम करते थे। धीरे-धीरे हम एक-दूसरे के घर आने-जाने लगे। साथ में वायलिन और मैंडोलिन बजाते, कभी क्रिकेट खेलते और संगीत पर लंबी चर्चाएं करते। हमारे शौक, हमारे संघर्ष और हमारे सपने बिल्कुल एक जैसे थे, इसलिए हम बहुत जल्दी पक्के दोस्त बन गए।”

 

६००० रुपये का वो पहला बड़ा काम और पिता के लिए सोने की अंगूठी

​इन दोनों प्रतिभावान दोस्तों की किस्मत का सितारा तब चमका जब महान संगीतकार सी. रामचंद्र जी ने प्यारेलाल को बुलाकर कहा, “मैं तुम्हें एक बड़ा काम देने वाला हूँ।” वे लक्ष्मीकांत से पहले ही बात कर चुके थे। इसके बाद यह जोड़ी चेन्नई (मद्रास) पहुँची, जहाँ ढाई साल तक उन्होंने साथ काम किया।

​फिल्म थी ‘देवता’ (१९५६) जिसमें जेमिनी गणेशन, वैजयंती माला और सावित्री जैसे दिग्गज कलाकार थे। इस काम के लिए उन्हें पहली बार एक साथ ६,००० रुपये मिले थे। प्यारेलाल जी कहते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में एक साथ इतने पैसे कभी नहीं देखे थे। एक सच्चे और संस्कारी बेटे की तरह, प्यारेलाल ने उन पैसों में से सबसे पहले १,२८० रुपये की एक सोने की अंगूठी खरीदी और अपने पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा जी के चरणों में अर्पित कर दी। यह एक कलाकार के संस्कारों की सबसे सुंदर मिसाल थी।

 

६३५ फिल्मों का सफरनामा और सिनेमा के शहनशाहों का साथ

​साल १९६३ में फिल्म ‘पारसमणि’ से ‘लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल’ (L-P) नाम की जो आंधी उठी, उसने अगले साढ़े तीन दशकों तक हिंदी सिनेमा को अपने सुरों से सराबोर रखा। १९६३ से लेकर १९९८ तक, इस जादुई जोड़ी ने ६३५ हिंदी फिल्मों के लिए कालजयी संगीत की रचना की।

​उन्होंने अपने समय के हर उस फिल्ममेकर के साथ काम किया जो सिनेमा का ‘शोमैन’ या ‘महान नायक’ कहलाता था। इस फेहरिस्त में शामिल थे:

​शोमैन राज कपूर साहब (बॉबी, सत्यम शिवम सुंदरम, प्रेम रोग)

​सदाबहार देव आनंद साहब (जॉनी मेरा नाम)

​बी.आर. चोपड़ा साहब, शक्ति सामंत जी, मनमोहन देसाई जी (अमर अकबर एंथनी)

​यश चोपड़ा साहब (दाग), सुभाष घई जी (कर्ज, राम लखन, खलनायक)

​और भारत भूषण मनोज कुमार साहब (रोटी कपड़ा और मकान)।

​उनकी धुनों में आम आदमी का दर्द भी था और त्योहारों का उल्लास भी। तभी तो पूरा देश गा उठा था:

“एक हमें आँख की लड़ाई मार गई,

दूसरी तो यार की जुदाई मार गई…

बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई!”

​और जब सरहद पार बैठे किसी परदेसी के कानों में इनकी धुन गूंजी, तो उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े:

​”चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है,

चिट्ठी है वतन से चिट्ठी आयी है…

बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद,

वतन की मिट्टी आई है…”

 

सावन का महीना और सुरों की अमर विरासत

​अश्विनी भाई, प्यारेलाल जी के संगीत की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वह सीधे लोक-संस्कृति की मिट्टी से जुड़ा हुआ था। लता मंगेशकर और मुकेश जी की आवाज़ में फिल्म ‘मिलन’ का यह गाना आज भी हर भारतीय के दिल में हिलोरे मारता है।

​आइए, प्यारेलाल जी के इस पावन जन्मदिवस पर हम सब मिलकर उनकी इस अमर विरासत को नमन करें, खुशियां मनाएं और गुनगुनाएं:

​”सावन का महीना, पवन करे सोर,

हाँ, जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर…

मौजवा करे क्या जाने, हमको इशारा,

जाना कहाँ है पूछे, नदिया की धारा,

मरज़ी है तुम्हारी, ले जाओ जिस ओर…

जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर…”

​भारतीय संगीत को वायलिन की थिरकन और सिम्फनी की भव्यता देने वाले उस्ताद प्यारेलाल जी को विद्वद्वर अश्विनी राय ‘अरुण’ और समस्त संगीत प्रेमियों की ओर से जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएं और सादर नमन!

​धन्यवाद !

 

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