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जंगलों का देवदूत: ‘जारवा के डॉक्टर’ पद्म श्री डॉ. रतन चंद्र कर की अविश्वसनीय दास्तान

 

​एक हाथ में नारियल और केलों से भरी टोकरी, दूसरे हाथ में जीवन रक्षक दवाइयाँ, और आँखों में अनजान आदिम दुनिया का खौफ… यह दृश्य था साल १९९८ का, जब कलकत्ता विश्वविद्यालय के नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज से पढ़ा एक डॉक्टर, अंडमान के कदमतला जेटी से एक छोटी नाव में बैठकर ‘लखरालुंगटा’ के घने जंगलों की तरफ बढ़ रहा था। सामने तीर-धनुष ताने जारवा जनजाति के लोग खड़े थे। वह डर का क्षण था, लेकिन उस डॉक्टर के पीछे उसकी पत्नी अंजलि का वो हौसला और खुद का वो संकल्प था, जिसने इतिहास बदल दिया।

​यह कहानी है ‘जारवा के डॉक्टर’ के नाम से मशहूर पद्म श्री डॉ. रतन चंद्र कर की, जिन्होंने १९९८-१९९९ में खसरे (Measles) की महामारी से विलुप्त हो रही जारवा जनजाति को नई जिंदगी दी।

 

​प्रारंभिक जीवन: मेदिनीपुर से नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज तक

​डॉ. रतन चंद्र कर का जन्म पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के घाटल उप-मंडल के बनहरिसिंहपुर गाँव में हुआ था। मेदिनीपुर की माटी के संस्कारों को समेटे हुए वे चिकित्सा की उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता के विख्यात नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज (NRS) आए, जहाँ से उन्होंने १९८२ में एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री प्राप्त की। जब उन्हें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जनजातियों की सेवा का अवसर मिला, तो उनके बेटों (तनुमॉय और अनुमॉय) को उनकी सुरक्षा की चिंता थी। लेकिन नागालैंड की ‘कोन्याक’ जनजाति के बीच काम कर चुके डॉ. कर ने इस चुनौती को अपने जीवन का सबसे बड़ा मिशन माना।

 

​विश्वास की वो पहली पट्टी: उपहार में केले और ज़ख्म पर मरहम

​जारवा लोग बाहरी दुनिया से नफरत करते थे और उन पर हमला कर देते थे। डॉ. कर जब पहली बार उनके इलाके में पहुंचे, तो वे दोस्ती के प्रतीक के रूप में नारियल और केले लेकर गए थे। उन्होंने देखा कि एक जारवा युवक जंगली सूअर के शिकार के दौरान बुरी तरह घायल हो गया था। डॉ. कर ने आगे बढ़कर बिना डरे उसके घाव पर मरहम-पट्टी की।
​दवा का असर ऐसा हुआ कि अगले ही दिन जब वे दोबारा गए, तो जारवा बच्चों ने उन्हें गले लगा लिया। जो जारवा कल तक तीर तानकर खड़े थे, वे अब डॉ. कर के सबसे पक्के दोस्त बन चुके थे। इसी अटूट विश्वास के दम पर उन्होंने १९९८-१९९९ के खसरे के प्रकोप और बाद में हेपेटाइटिस-ई तथा कंजेक्टिवाइटिस जैसी महामारियों से लड़कर जारवा जनजाति की आबादी को, जो महज २५० रह गई थी, आज ५५० से पार पहुँचा दिया है।

 

​डॉ. रतन चंद्र कर की कालजयी पुस्तक: ‘द जारवाज़ ऑफ द अंडमान्स’ का अनमोल विवरण

डॉ. कर ने जारवा समुदाय के बीच बिताए अपने दशकों के अनुभवों, उनकी अनकही संस्कृति और उनके मानवीय व्यवहार को एक अद्भुत किताब में समेटा है, जिसका नाम है—”The Jarawas of the Andamans” (अंडमान के जारवा)। यह पुस्तक केवल एक डॉक्टर की डायरी नहीं है, बल्कि मानवविज्ञान (Anthropology) का एक अनमोल दस्तावेज़ है।

इस किताब के कुछ बेहद मुख्य और संवेदनशील विवरण इस प्रकार हैं:

भाषा और संस्कृति का संगम: डॉ. कर ने लिखा है कि जारवा लोगों का इलाज करने के लिए उन्होंने सबसे पहले उनकी भाषा सीखी। वे बताते हैं कि जारवा समाज में कोई लिखित भाषा नहीं है, लेकिन उनके इशारों और ध्वनियों में एक गजब का संगीत और आत्मीयता होती है।

अस्पताल बनाम प्रकृति: किताब में ज़िक्र है कि जारवा लोग बंद कमरों या आधुनिक अस्पतालों की चारदीवारी से घबराते थे। इसलिए डॉ. कर ने कदमतला अस्पताल में एक विशेष ‘जारवा वार्ड’ बनाया, जिसकी छत खुली रखी गई और उन्हें उनकी पारंपरिक आदतों के अनुसार जीने की छूट दी गई, ताकि वे मानसिक रूप से बीमार न पड़ें।

शिकार और जीवन-शैली: पुस्तक विस्तार से बताती है कि जारवा पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हैं। वे शहद इकट्ठा करने में माहिर होते हैं और एक विशेष जंगली पत्ती का रस अपने शरीर पर मलते हैं, जिससे मधुमक्खियाँ उन्हें नहीं काटतीं। जंगली सूअर का शिकार और कछुए पकड़ना उनकी जीविका का मुख्य साधन है।

बाहरी दुनिया का खतरा: डॉ. कर ने अपनी किताब में एक गंभीर चेतावनी भी दी है। उन्होंने लिखा है कि जारवा लोगों के लिए बाहरी दुनिया की आधुनिकता (जैसे शराब, तंबाकू और जंक फूड) उनकी बीमारियों से भी ज्यादा खतरनाक है। अंडमान ट्रंक रोड (ATR) के कारण जारवा संस्कृति को जो नुकसान पहुँच रहा है, उस पर उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त की है।

 

निष्कर्ष: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा ‘पद्म श्री’ (२०२३) का सम्मान
​चिकित्सा और समाज सेवा के क्षेत्र में डॉ. रतन चंद्र कर के इस युगांतकारी और निस्वार्थ योगदान के लिए भारत सरकार ने साल २०२३ में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा। महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों जब उन्हें यह पुरस्कार मिला, तो वह केवल एक डॉक्टर का सम्मान नहीं था, बल्कि मानवता की उस जीत का सम्मान था जिसने एक पूरी आदिम संस्कृति को विलुप्त होने के भंवर से खींच निकाला था।

 

​धन्यवाद!

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