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सुहाना सफ़र और मौत से साक्षात्कार: संगीत के महाशिल्पी ‘सलिल दा’ का दार्शनिक संगीत

 

​”सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं,

हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं…”

​मुकेश जी की आवाज़ में गाए इस गीत की ये पंक्तियाँ जब भी कानों में गूंजती हैं, तो मन प्रकृति के किसी अनजाने, हसीं गलियारे में खो जाता है। लेकिन नियति का खेल देखिए, इस सुहाने सफ़र की सुरीली धुनें रचने वाला वो महाशिल्पी, खुद भी एक दिन इस दुनिया के कोहरे में हमेशा के लिए खो गया। तारीख़ थी—५ सितंबर १९९५। इसी दिन भारतीय संगीत जगत के एक दैदीप्यमान नक्षत्र, सलिल चौधरी उर्फ ‘सलिल दा’ ने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया था।

 

​जीवनी: चाय के बागानों से संगीत के शिखर तक

​सलिल चौधरी का जन्म १९ नवंबर १९२५ को पश्चिम बंगाल के २४ परगना ज़िले के गज़नी गाँव में हुआ था। उनका बचपन असम के चाय के बागानों में बीता, जहाँ उनके पिता एक डॉक्टर के रूप में कार्यरत थे। असम के उन बागानों की हरी-भरी वादियों, वहाँ के स्थानीय लोक-संगीत और चाय बागान के मज़दूरों के संघर्ष ने सलिल दा के संवेदनशील मन पर गहरा असर डाला। उनके पिता को पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत (Western Classical Music) का बेहद शौक था, जिसके चलते सलिल दा बचपन से ही मोज़ार्ट, बीथोवेन और बाख जैसे दिग्गजों के संगीत को सुनते हुए बड़े हुए। यही कारण था कि उन्होंने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के बांसुरी, पियानो और वायलिन जैसे वाद्ययंत्रों पर महारत हासिल कर ली और बाद में कोलकाता के बंगाली नवजागरण और ‘इप्टा’ (IPTA – इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन) से जुड़कर अपनी संगीत यात्रा को वैचारिक धार दी।

 

करियर: एक बहुआयामी जीनियस का संघर्ष और उदय

​सलिल दा का करियर पारंपरिक संगीतकारों जैसा नहीं था; वे एक साथ संगीतकार, कवि, पटकथा लेखक और नाटककार थे। इप्टा (IPTA) के दिनों में उनके लिखे जन-गीतों (जैसे ‘मानव नइले पदब नइले’) ने पूरे बंगाल में क्रांति ला दी थी। जब वे कोलकाता से मुंबई (तब बंबई) आए, तो उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया। वे केवल धुनें नहीं बनाते थे, बल्कि ऑर्केस्ट्रेशन, काउंटर-मेलोडी और वेस्टर्न कॉयर (Choir) का हिंदी गानों में ऐसा अनूठा प्रयोग करते थे जिसे सुनकर तत्कालीन दिग्गज संगीतकार भी हैरान रह जाते थे। बंगाली और हिंदी सिनेमा के अलावा, उन्होंने मलयालम सिनेमा में भी ‘चेम्मीन’ (Chemmeen) जैसी फिल्म के लिए ऐसा ऐतिहासिक संगीत दिया, जिसने उन्हें पूरे भारत का चहेता संगीतकार बना दिया।

 

फ़िल्में और कालजयी गीत: सुरों का अमर खजाना

​सलिल दा की फिल्मोग्राफी भारतीय सिनेमा का वो स्वर्ण काल है, जिसके गीत आज भी हमारी रगों में बहते हैं। फिल्म ‘मधुमती’ (१९५८) में उनका संगीत अपने चरम पर था, जहाँ “आजा रे परदेसी”, “सुहाना सफ़र” और “चढ़ गयो पापी बिछुआ” जैसे गीतों ने धूम मचा दी। वहीं ‘आनंद’ (१९७१) में उन्होंने “जीना यहाँ मरना यहाँ” के दौर में “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” और “जिया लागे ना” जैसी अमर धुनें दीं। फिल्म ‘मेरे अपने’ (१९७१) का “कोई होता जिसको अपना” युवाओं के अकेलेपन की आवाज़ बना, तो ‘परख’ (१९६०) का “ओ सजना बरखा बहार आई” आज भी बारिश का सबसे सुरीला पर्याय है। उन्होंने मन्ना डे, मुकेश, लता मंगेशकर और किशोर कुमार जैसे महान गायकों से उनके करियर के कुछ सबसे बेहतरीन और कठिन गीत गवाए।

 

​’दो बीघा ज़मीन’ और इतिहास का पहला फ़िल्मफ़ेयर

​हिंदी सिनेमा में उनका पर्दापण (डेब्यू) किसी व्यावसायिक ढर्रे से नहीं, बल्कि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध गद्य-कविता ‘दुई बिघा जमि’ से प्रेरित होकर हुआ था। इस महान और मार्मिक कहानी को अपने शब्दों में ढाला था स्वयं सलिल चौधरी ने, और इसे परदे पर अमर करने का काम किया था महान निर्देशक बिमल रॉय ने। फिल्म थी—’दो बीघा ज़मीन’ (१९५३)।

​यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई। अपनी प्रगतिशील और यथार्थवादी विचारधारा के अलावा, इस फ़िल्म के नाम एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज़ है जो हमेशा अमर रहेगी:

​यह भारतीय सिनेमा के इतिहास की पहली फ़िल्म थी, जिसने ‘फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट मूवी अवॉर्ड’ जीता था।

​इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारी सराहना मिली और ‘कान फ़िल्म फेस्टिवल’ (Cannes Film Festival) में प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया।

​इस फ़िल्म में जब बलराज साहनी अपनी माटी के लिए छटपटाते हैं, तो बैकग्राउंड में सलिल दा के संगीत से सजी मन्ना डे और साथियों की आवाज़ आज भी रोंगटे खड़े कर देती है:

“गंगा और जमुना की गहरी है धार,

आगे या पीछे सबको जाना है पार…

धरती कहे पुकार के, बीज बिछा ले प्यार के,

मौसम बीता जाए…”

 

​’कहीं दूर जब दिन ढल जाए’: मृत्यु पर्व से पहले आस्था का गीत

​जब हम फ़िल्म ‘आनंद’ (१९७१) के इस अमर गीत पर आते हैं, तो यहाँ आपकी पैनी दार्शनिक दृष्टि सीधे आत्मा को छूती है:

​”कहीं दूर जब दिन ढल जाए,

सांध्य की दुलहन बदन चुराए, चुपके से आए…

मेरे ख्यालों के आंगन में,

कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए…”

​मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यह महज़ एक विरह या उदासी का गीत नहीं है। यह वास्तव में आस्था का गीत है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर, मृत्यु पर्व के ठीक पहले जब इंसान खड़ा होता है, तब यह गीत एक गहरे आभास और आश्वस्ति की तरह आता है। यह हमें भरोसा दिलाता है कि जब ज़िंदगी का ‘दिन ढल’ रहा होगा और चारों तरफ मौत का अंधेरा छाने लगेगा, तब भी उस महा-अंधेरे में, थोड़ी सी ही सही, मगर उम्मीद और आस्था की रौशनी कहीं गुम नहीं होगी। वह ‘सपनों का दीप’ जलता रहेगा जो आत्मा को अगली यात्रा के लिए संबल देगा।

 

निष्कर्ष: सफ़र सुहाना रहेगा हमेशा

​सलिल दा भले ही ५ सितंबर १९९५ को शारीरिक रूप से इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनके संगीत का यह ‘सुहाना सफ़र’ कभी ख़त्म नहीं हो सकता। जब तक इस धरती पर सावन आएगा, जब तक कोई परदेसी वतन को याद करेगा, और जब तक कोई इंसान ज़िंदगी के आख़िरी मोड़ पर सुकून की तलाश करेगा, तब तक सलिल दा की धुनें हमारे ख़्यालों के आँगन में ‘सपनों के दीप’ जलाती रहेंगी।

​भारतीय संगीत के इस महान शिल्पी और दार्शनिक संगीतकार को हमारी ओर से भावपूर्ण नमन!

​धन्यवाद!

 

 

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