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‘मिलन’ (1946): गुरुदेव की ‘नौका डूबी’ का पहला हिंदी रूपहला पन्ना और एक ऐतिहासिक भूल

 

जब हम गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की इस अमर कृति के सिनेमाई इतिहास को खंगालते हैं, तो एक अद्भुत तथ्य सामने आता है। यह फिल्म ‘मिलन’ (१९४६), रवींद्रनाथ टैगोर के किसी उपन्यास पर बनने वाली पहली हिंदी फिल्म थी। इस ऐतिहासिक फिल्म के निर्माण और इसके तकनीकी पक्षों की दास्तान अपने आप में उतनी ही रोमांचक है, जितनी इसकी कहानी।

 

बॉम्बे टॉकीज का वो जादुई दौर और दिलीप कुमार का उदय

यह वह दौर था जब भारतीय सिनेमा करवट ले रहा था। उस समय के सबसे प्रतिष्ठित स्टूडियो ‘बॉम्बे टॉकीज’ (Bombay Talkies) ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का बीड़ा उठाया। अपनी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ (१९४४) के बाद, एक युवा और उभरते हुए अभिनेता के लिए यह अपनी प्रतिभा को साबित करने की सबसे बड़ी कसौटी थी। और उस युवा का नाम था—दिलीप कुमार।

मशहूर निर्देशक नितिन बोस का बॉम्बे टॉकीज के साथ यह पहला और बेहद बड़ा प्रोजेक्ट था। उपन्यास का खूबसूरत पटकथा रूपांतरण सजनीकांत दास ने किया था, और इसके संवादों को धार देने का काम किया था हिंदी के प्रसिद्ध लेखक पी. एल. संतोषी ने। दिलीप कुमार ने ‘रमेश’ के उस अंतर्द्वंद्व को, जो कर्तव्य, समाज और हेमनालिनी के प्रति निष्कपट प्रेम के बीच पिस रहा था, अपने अभिनय से जीवंत कर दिया।

 

राधू कर्माकर का कैमरा और अनिल बिस्वास के सुर

फिल्म व्यावसायिक रूप से भले ही बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी हिट साबित नहीं हुई, लेकिन तकनीकी और रचनात्मक रूप से इसे एक मील का पत्थर माना गया।

तूफ़ान का वो जादुई दृश्य: फिल्म के छायाकार (Cinematographer) राधू कर्माकर थे। उस दौर की सीमित तकनीकों के बावजूद, राधू कर्माकर ने हुगली नदी के उस भयानक तूफ़ान और रात के दृश्यों (Night Sequences) को जिस खूबी से कैमरे में कैद किया, उसकी समीक्षकों ने दिल खोलकर प्रशंसा की।

संगीत की मिठास: महान संगीतकार अनिल बिस्वास ने फिल्म को अपने सुरों से सजाया। उस दौर में मुकेश और पारुल घोष की आवाज़ में गाए गीत जैसे “सुहानी बेरिया बीत जाए” और “वो कहें आपकी दो चाह का इनाम मुझे” सीधे दर्शकों के दिलों में उतर गए थे।

 

संपादन की वो ऐतिहासिक भूल: जब फिल्म भंवर में फंसी

फिल्म की चूक: फिल्म के में कहानी का प्रवाह यह है कि जब कमला घर छोड़कर अपने असली पति की तलाश में काशी चली जाती है, तो रमेश पहले ही काशी आ चुका होता है। वह वहाँ हेमनालिनी और उसके पिता से मुलाकात कर चुका होता है। इसके बाद के घटनाक्रम में वह कोलकाता आता है।

उपन्यास का मूल प्रवाह: लेकिन गुरुदेव के मूल उपन्यास ‘नौका डूबी’ में कमला के काशी जाने के बाद, रमेश गाजीपुर से हेमनालिनी से मिलने उसके कोलकाता वाले घर आता है। वहाँ उसे पता चलता है कि वे लोग तो काशी जा चुके हैं। फिर वह हेमनालिनी के भाई (अपने दोस्त) से मिलने उसके स्कूल जाता है, अपनी आपबीती सुनाता है, और फिर वे दोनों काशी के लिए रवाना होते हैं। फिल्म में यह सीक्वेंस पूरी तरह से उलट गया, जिससे क्रोनोलॉजी में एक विरोधाभास पैदा हो गया।

परंतु, इस तकनीकी खामी के बाद भी, दिलीप कुमार (रमेश), मीरा मिश्रा (कमला), रंजना (हेमनालिनी) और पहाड़ी सान्याल (अक्षय) के सधे हुए अभिनय ने फिल्म की भव्यता और गुरुदेव की रूह को कम नहीं होने दिया।

 

निष्कर्ष: बक्सर, कलकत्ता और सिनेमा का त्रिवेणी संगम

कलकत्ता के हुगली तट से शुरू हुई ‘नौका डूबी’ की यह कश्ती, गंगा की लहरों के साथ हमारे अपने पावन बक्सर का नाम लेते हुए, काशी के घाटों तक पहुँचती है और जब इस साहित्यिक कश्ती को बॉम्बे टॉकीज और दिलीप कुमार जैसे अभिनय सम्राट का साथ मिलता है, तो इतिहास बन जाता है।

यह आलेख अब केवल एक उपन्यास की समीक्षा नहीं रहा, बल्कि यह साहित्य, सिनेमा, इतिहास, बक्सर के गौरव और तकनीकी बारीकियों का एक अनूठा दस्तावेज़ बन चुका है।

धन्यवाद !

 

नौका डूबी उपन्यास की संपूर्ण कहानी: गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का कालजयी सामाजिक दर्शन

 

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