भारतीय सिनेमा की पहली ‘ड्रैगन फ्लाई’: देविका रानी और बॉम्बे टॉकीज़ का स्वर्णिम इतिहास
जब भारतीय समाज में महिलाएँ चारदीवारी के भीतर घूंघट में सिमटी हुई थीं, तब विशाखापत्तनम की माटी से उठी एक आवाज़ ने सात समंदर पार लंदन और जर्मनी तक अपनी कला का परचम लहराया। वे न केवल भारतीय रजतपट (हिन्दी सिनेमा) की पहली नायिका बनीं, बल्कि देश की पहली महिला ‘फ़िल्म स्टार’ और ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की मालकिन बनकर रूढ़ियों के सारे सिंहासन हिला दिए। यह दास्तान है भारतीय सिनेमा की ‘फर्स्ट लेडी’ और दादासाहब फाल्के पुरस्कार की प्रथम विजेता देविका रानी की।
कुलीन घराना और लंदन में उच्च शिक्षा का सफर
देविका रानी का जन्म ३० मार्च १९०८ को वाल्टेयर (विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश) में एक बेहद समृद्ध और शिक्षित परिवार में हुआ था। कला और विज़न उनके खून में था, क्योंकि वे विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के खानदान से ताल्लुक रखती थीं; गुरुदेव उनके चचेरे परदादा थे। उनके पिता कर्नल एम.एन. चौधरी मद्रास के पहले सर्जन जनरल थे और माता श्रीमती लीला चौधरी थीं।
स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद, २० के दशक के शुरुआती वर्षों में वे नाट्य शिक्षा के लिए लंदन चली गईं। वहाँ उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें प्रतिष्ठित ‘रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट’ (RADA) और ‘रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक’ में स्कॉलरशिप मिली। देविका सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं रहीं; उन्होंने आर्किटेक्चर, टेक्सटाइल और डेकोर डिज़ाइन्श जैसी आधुनिक विधाओं का गहन अध्ययन किया और बाद में लंदन की विख्यात कंपनी ‘एलिजाबेथ आर्डन’ में काम भी करने लगीं।
हिमांशु राय से मुलाकात और जर्मनी का ‘यू.एफ.ए.’ स्टूडियो
लंदन में पढ़ाई के दौरान ही देविका रानी की मुलाकात दूरदर्शी निर्माता-निर्देशक हिमांशु राय से हुई। हिमांशु राय उनकी डिज़ाइन्श की समझ से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म ‘लाइट ऑफ एशिया’ (The Light of Asia) के लिए देविका को सेट डिज़ाइनर नियुक्त कर लिया। जल्द ही यह कलात्मक जुड़ाव वैवाहिक बंधन में बदल गया और दोनों ने शादी कर ली।
शादी के बाद हिमांशु राय को जर्मनी के प्रख्यात यू.एफ.ए. (UFA) स्टूडियो में ‘ए थ्रो ऑफ डाइस’ (A Throw of Dice) फ़िल्म बनाने का काम मिला, तो देविका भी उनके साथ जर्मनी चली आईं। वहाँ उन्होंने फ़िल्म निर्माण, एडिटिंग और अभिनय की बारीकियों को यूरोपीय तकनीक के साथ सीखा। जब भारत में बोलती फ़िल्मों का दौर शुरू हुआ, तो यह जोड़ी अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए स्वदेश वापस लौट आई।
’कर्मा’ की सफलता और ‘बॉम्बे टॉकीज़’ का उदय
भारत लौटकर हिमांशु राय ने फिल्में बनानी शुरू कीं और देविका रानी उनकी मुख्य नायिका बनीं। वर्ष १९३३ में उनकी ऐतिहासिक फ़िल्म ‘कर्मा’ प्रदर्शित हुई। इस फ़िल्म ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। लोग देविका रानी की अदाकारी और उनकी अंतरराष्ट्रीय शैली के दीवाने हो गए। यह इस फ़िल्म की लोकप्रियता का ही असर था कि दर्शकों ने उन्हें ‘कलाकार’ के स्थान पर भारत की पहली महिला ‘फ़िल्म स्टार’ का दर्जा दे दिया।
इसके बाद इस पति-पत्नी की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा का चेहरा बदलने के लिए भारत के पहले अत्याधुनिक फ़िल्म स्टूडियो ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की नींव रखी। जर्मनी से मंगाए गए उस समय के सबसे आधुनिक उपकरणों और विदेशी तकनीशियनों से सुसज्जित यह स्टूडियो उस दौर की सबसे बड़ी फ़िल्म यूनिवर्सिटी बन गया।
महान कलाकारों की नर्सरी: अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर और मधुबाला जैसे महान दिग्गज कलाकार बॉम्बे टॉकीज़ में काम करने के लिए हमेशा लालायित रहते थे। (दिलीप कुमार को तो फ़िल्म इंडस्ट्री में लाने और उनका नाम ‘युसूफ खान’ से ‘दिलीप कुमार’ रखने का श्रेय भी देविका रानी को ही जाता है।)
कालजयी फ़िल्में: इस बैनर के तले ‘अछूत कन्या’, ‘किस्मत’, ‘शहीद’ और ‘मेला’ जैसी अत्यधिक लोकप्रिय फ़िल्मों का निर्माण हुआ। इनमें से ‘अछूत कन्या’ (१९३६) सामाजिक कुरीतियों पर चोट करने वाली बॉम्बे टॉकीज़ की सबसे बहुचर्चित और मील का पत्थर साबित हुई फ़िल्म रही।
अकेलेपन का अंधेरा और ‘फ़िल्मलिस्तान’ का गठन
देविका रानी की हंसती-खेलती जिंदगी और करियर में अंधेरा तब छाया, जब उनके पति और बॉम्बे टॉकीज़ के मुख्य संचालक हिमांशु राय का असामयिक देहांत हो गया। अचानक पूरे स्टूडियो का संचालन और आर्थिक भार देविका रानी के कंधों पर आ पड़ा। उन्होंने स्टूडियो को बचाने के लिए अपनी जान लड़ा दी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।
स्टूडियो के भीतर वैचारिक मतभेद शुरू हो गए। परिणामस्वरूप, शशधर मुखर्जी, अशोक कुमार और अन्य कुछ विश्वसनीय लोगों ने स्टूडियो से अपना नाता तोड़ लिया, जिससे देविका रानी बिल्कुल असहाय हो गईं। इन लोगों ने बॉम्बे टॉकीज़ से अलग होकर ‘फ़िल्मलिस्तान’ नामक नया स्टूडियो बना लिया। इस बिखराव से टूटकर देविका रानी ने भारी मन से फ़िल्म इंडस्ट्री और बॉम्बे टॉकीज़ से हमेशा के लिए अपना नाता तोड़ लिया।
रूसी चित्रकार से विवाह और पद्मश्री व फाल्के सम्मान
फ़िल्मों से संन्यास लेने के बाद देविका रानी के जीवन में एक नया और खूबसूरत मोड़ आया। उनकी मुलाकात मशहूर रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रॉरिक से हुई। दोनों परिणय सूत्र में बंध गए और बंगलौर (अब बेंगलुरु) के पास एक खूबसूरत एस्टेट में जाकर बस गए, जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बाकी दिन कला और प्रकृति के सानिध्य में शांति से बिताए।
भारतीय सिनेमा और समाज में उनके इस अपूर्व, साहसिक और ऐतिहासिक योगदान के लिए देश ने उन्हें सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा:
पद्मश्री (१९५८): महामहिम राष्ट्रपति ने उन्हें कला के क्षेत्र में अद्वितीय साहस और योगदान के लिए ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।
प्रथम दादासाहब फाल्के पुरस्कार (१९७०): जब भारत सरकार ने सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान ‘दादासाहब फाल्के पुरस्कार’ शुरू किया, तो वर्ष १९७० में पहली बार इस पुरस्कार को प्राप्त करने का गौरव देविका रानी को ही मिला।
निष्कर्ष: सदा अमर रहेगी सिनेमा की यह देवी
देविका रानी सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं थीं, वे भारतीय नारी के उस साहस का प्रतीक थीं जिसने रूढ़ियों के घूंघट को फाड़कर अपनी प्रतिभा के दम पर दुनिया को झुकने पर मजबूर किया। उनकी अद्वितीय सुंदरता, उनका विज़न और बॉम्बे टॉकीज़ का वो स्वर्णिम इतिहास भारतीय सिनेमा के पन्नों पर हमेशा सुनहरे अक्षरों में चमकता रहेगा।
धन्यवाद!
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