July 22, 2024

आर्य समाज का एक आदर्श वाक्य है, “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” जिसका अर्थ है, विश्व को आर्य बनाते चलो। आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वर्ष १८७५ में मथुरा के स्वामी विरजानन्द जी की प्रेरणा से बंबई में की थी, परंतु इससे पूर्व उन्होंने ६ या ७ सितम्बर, १८७२ को वर्तमान बिहार राज्य अंतर्गत आरा जिला के अपने आगमन पर आर्य समाज की स्थापना की थी, जो उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह प्रथम आर्य समाज था। परन्तु अफसोस की बात है कि वहां उसके एक या दो ही अधिवेशन हो पाए थे कि स्वामी जी को आरा से जाना पड़ा। स्वामी जी के चले जाने के थोड़े ही दिनों के पश्चात् ही नव·स्थापित आर्य समाज की गतिविधियां वहां बन्द हो गई। हां तो, आर्य समाज की स्थापना अथवा आन्दोलन; पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारम्भ की गई थी। आर्य समाजी शुद्ध वैदिक परम्परा पर ही विश्वास करते हैं तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड व अन्धविश्वासों को अस्वीकार करते हैं। इसमें छुआछूत व जातिगत भेदभाव का पुरजोर विरोध किया गया है तथा स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने तथा वेद पढ़ने का अधिकार दिया गया है।

आर्य समाज के बुद्धिजीवियों ने धर्म और समाज के क्षेत्र में प्रचलित रूढ़ियों, अंधविश्वासों आदि का खण्डन करके हिंदी भाषा के माध्यम से धर्म एवं सदाचार के शुद्ध रूप को प्रकाशित किया, जिससे समाज में जागृति की एक नई लहर और बौद्धिक चेतना का एक नया प्रकाश फैला, जिसका प्रभाव साहित्य और भाषा पर पड़ना ही था, सो पूर्ण रूप से पड़ा। स्वामी जी स्वयं संस्कृत भाषा के महान ज्ञाता थे, इसके वावजूद उन्होंने अपने कई ग्रंथों की रचना हिंदी भाषा में ही की जिनमें ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसका प्रथम संस्करण वर्ष १८६५ में तथा द्वितीय संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण वर्ष १८८३ में प्रकाशित हुआ। स्वामी जी ने एक नई शैली “प्रश्न शैली” आरम्भ की, जिसमें स्वामी जी पाठकों के सामने स्वयं एक प्रश्न रखते थे और फिर स्वयं ही उस प्रश्न का उत्तर बड़े विस्तार से बताया करते थे। स्वामी जी न केवल साहित्य में ही अपितु व्याख्यानों व शास्त्रार्थों में भी इस शैली का प्रयोग बड़ी सुंदर ढंग से करते थे। स्वामी जी के प्रभाव ऐसा था कि अछूते रह गए विषयों पर भी कलमें चलने लगीं। कथा और कहानियों में दर्शन भी नजर आने लगा। सत्यार्थ प्रकाश में जो दार्शनिक, अध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रश्नों की विवेचना की गई है, उनके सम्बन्ध में आचार्य चतुरसेन जी कहते हैं, “तुलसी कृत रामायण के पश्चात् सत्यार्थ प्रकाश ही इस युग का इतना लोकप्रिय ग्रन्थ हुआ है।” बाबू श्याम सुन्दर दास के अनुसार “सत्यार्थ प्रकाश” और आर्य समाज के प्रभाव से पंजाब में हिंदी का वह असर हुआ, जिसकी कदापि आशा नहीं थी।” रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार स्वामी जी के ब्रह्मचर्य, नैतिक शुद्धता और पवित्रता पर बल देना हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महान् उल्लेखनीय तथ्य है।

आर्यभाषा हिन्दी…

आर्य समाज ने हिन्दी को आर्यभाषा’ कहा और सभी आर्य समाजियों के लिये इसका ज्ञान आवश्यक बताया। स्वामी जी ने वेदों की व्याख्या संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी में भी की। स्वामी श्रद्धानन्द ने हानि उठाकर भी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन देवनागरी लिपि में किए जबकि उनका प्रकाशन पहले उर्दू में किया जाता रहा था। आर्य समाज ने हिन्दी के विकास के लिए कमर कस लिया था और आने वाला वक्त अब हिन्दी का होने वाला था।

सैकड़ों गुरुकुलों, डीएवी विद्यालयों और महाविद्यालयों में हिंदी भाषा को प्राथमिकता दी गई और इस कार्य के लिए नवीन पाठ्यक्रम की पुस्तकों की रचना हिंदी भाषा के माध्यम से गुरुकुल कांगड़ी एवं लाहौर आदि स्थानों पर हुई जिनके विषय विज्ञान, गणित, समाज शास्त्र, इतिहास आदि थे। यह एक अलग ही किस्म का हिन्दी भाषा में परीक्षण था जिसके वांछनीय परिणाम निकले। विदेशों में भवानी दयाल सन्यासी, भाई परमानन्द, गंगा प्रसाद उपाध्याय, डॉ. चिरंजीव भारद्वाज, मेहता जैमिनी, आचार्य रामदेव, पंडित चमूपति आदि ने हिंदी भाषा का प्रवासी भारतीयों में प्रचार किया जिससे वे मातृभूमि से दूर होते हुए भी उसकी संस्कृति, उसकी विचारधारा से न केवल जुड़े रहे अपितु विदेश में जन्मी अपनी सन्तति को भी उससे अवगत करवाया। आर्य समाज द्वारा न केवल पंजाब में हिंदी भाषा का प्रचार किया गया अपितु सुदूर दक्षिण भारत में, असम, बर्मा आदि तक हिंदी को पहुँचाया गया। न्यायालय में दुष्कर भाषा के स्थान पर सरल हिंदी भाषा के प्रयोग के लिए भी स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा प्रयास किये गये थे।

स्वामी जी की विचारधारा…

हिंदी साहित्य के आदि काल के उन्नायक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने हिंदी के पूर्व साहित्यिक काल “रीतिकाल” के सन्धि समय में ही हुए थे तथा श्रृन्गारिकता के दुष्परिणाम स्वरूप जो देश को पराधीनता का मुंह देखना पड़ा था, उससे जन मानस को बचाने के लिए न केवल जनभाषा हिंदी की खड़ी बोली में प्रचार आरम्भ किया अपितु साहित्य का मुख, स्वाधीनता, स्वावलंबन, देशभक्ति, पूर्व वैभव का स्मरण तथा अंधविश्वासों के खंडन की और मोड़ दिया। जिस कारण तत्कालीन युगाचार्य भारतेंदु हरिश्चंद्र, जो श्रृंगार काव्य द्वारा ही अपना लेखन कार्य आरम्भ कर चुके थे, को भी इस उलटी गंगा के बहाव में स्वयं को बहाने को बाध्य होना पड़ा। इतना ही नहीं द्विवेदी युग पर भी स्वामी जी की विचारधारा का प्रभाव पड़ा और वो भी भारतेंदु युग से भी अधिक। परिणाम स्वरूप श्रृन्गारिकता को विषय बनाना पाप समझा जाने लगा, जिसकी वजह से कवि नाथूराम शंकर ने अपना श्रृंगारिक काव्य ग्रन्थ “कलित कलेवर“ को स्वयं ही अपने हाथों से नष्ट कर दिया। कहानीकार सुदर्शन जी को भी अपनी कहानियों को नई दिशा देनी पड़ी। परिणाम यह हुआ कि इस युग के कवि श्रृंगार रस की कविता छोड़ राष्ट्र-प्रेम, राष्ट्रोद्धार, समाज सुधार आदि ज्वलंत विषयों पर अपना कलम चलाने लगे, जिनमें मैथिलिशरण गुप्त, नाथूराम शंकर आदि मुख्य कवि हुए। स्वामी जी के निर्देशन में आर्य समाज ने जो सुधारवादी मार्ग अपनाते हुए बाल विवाह, विधवा विवाह, अनमेल विवाह, छुआछूत आदि कुप्रथाओं के विरोध में आवाज उठाई थी, साहित्यकारों के एक बड़े वर्ग ने उसपर भी कई महत्त्वपूर्ण रचनाएं की।

यहां हम जानकारी के लिए बताते चलें कि कविश्रेष्ठ मैथिलीशरण गुप्त जी की “भारत भारती“ में स्वामी जी के प्राय: सब तरह के सुधारों का वर्णन है। दिनकर ने तो यहां तक कह दिया है कि “साकेत के राम तो स्वामी दयानंद जी के ‘कृण्वन्तो विश्वार्यम्’ का नारा लगाते हैं।” आर्य समाज इतने पर भी नहीं रुका, देव भाषा संस्कृत के वैदिक तथा शास्त्रीय साहित्य को भी आमजन की सहूलियत के लिए अनुवाद द्वारा हिंदी में सुलभ किया गया। यहाँ तक कि चारों वेदों का भाष्य भी हिंदी में उपलब्ध कराए गए।

विद्वानों का संक्षिप्त परिचय…

आर्य समाज के प्रमुख कार्यकर्ता एवं प्रचारक थे पंडित लेखराम जी जिनका सारा जीवन आर्य समाज के प्रचार-प्रसार में लगा रहा। उन्होंने अहमदिया मुस्लिम समुदाय के नेता मिर्जा गुलाम अहमद से शास्त्रार्थ कर उसके दुष्प्रचारों का जमकर खण्डन किया। उन्होंने स्वामी दयानन्द जी के जीवनचरित् लिखने के उद्देश्य से देश के अनेकानेक स्थानों का दौरा किया, जिसकी वजह से उनका नाम ‘आर्य मुसाफिर’ पड़ गया। उन्होंने ३३ पुस्तकों की रचना की। उनकी सभी कृतियों को एकीकृत रूप में कुलयात-ए-आर्य मुसाफिर नाम से प्रकाशित किया गया है।

लाला लाजपतराय के पत्र ‘दैनिक वन्देमातरम्’ तथा महाशय कृष्ण के दैनिक ‘प्रताप’ पत्रों के सहायक सम्पादक रहे महाशय चिरंजीलाल ‘प्रेम’ को पंजाब की आर्य प्रतिनिधि सभा ने पं. लेखराम की स्मृति में ‘आर्य मुसाफिर’ नामक मासिक उर्दू पत्र का आद्य सम्पादक बनाया। ‘आर्य मुसाफिर’ अपने समय का प्रमुख व सर्वश्रेष्ठ पत्र था। आर्यसमाज के उर्दू जानने वाले विद्वानों के लेख तो इस पत्र में प्रकाशित होते ही थे। पंडित इन्द्र विद्यावाचस्पति, पंडित भीमसेन विद्यालंकार तथा पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार आदि जैसे उर्दू न जानने वाले विद्वानों के लेख भी इसमें उर्दू रूपान्तर के साथ प्रकाशित होते थे।

आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि स्वामी श्रद्धानन्द के पुत्र थे पंडित इन्द्र विद्यावाचस्पति जी, जो कुशल पत्रकार, गंभीर विचारक एवं इतिहासवेत्ता थे। उन्होंने ‘आर्यसमाज का इतिहास’, ‘उपनिषदों की भूमिका’ तथा ‘संस्कृत्ति का प्रवाह’ आदि पुस्तकों की रचना की। उनकी स्वामी जी पर आधारित ‘महर्षि दयानन्द का जीवन-चरित’ उल्लेखनीय जीवन-ग्रन्थ है। मेरठ स्थित ‘गुरुकुल प्रभात आश्रम’ के संस्थापक बुद्धदेव विद्यालंकार अर्थात स्वामी समर्पणानन्द संस्कृत के विद्वान एवं आर्यसमाजी लेखक थे। वे वेदों के अनन्य प्रचारक तथा शास्त्रार्थ महारथी थे। इन्होने अनेकों विषयों पर लेख लिखे और गीता, वेदों के मन्त्रों का भाष्य भी किया। इनका शतपथ ब्राह्मण का भाष्य विशेष महत्व का है।

महर्षि स्वामी दयानन्दजी कृत यजुर्वेद भाष्य के प्रथम १५ अध्यायों पर पण्डित ब्रह्मदत्त ‘जिज्ञासु’ जी ने विस्तृत विवरण लिखा। विवरणकार ने ऋषि दयानन्द भाष्य पर विस्तृत टिप्पणियाँ लिखीं तथा भाष्य में प्रयुक्त संस्कृत भाषा के व्याकरण विषयक तथाकथित अपप्रयोगों की साधुता सिद्ध की है। विवरण की विस्तृत भूमिका में वेद ज्ञान के स्वरुप, वेद और उसकी शाखाएँ, देवता वाद, छंदोंमीमांसा, धातुओं का अनेकार्थत्व तथा यौगिक वाद, वेदार्थ की विविध प्रक्रिया आदि महत्वपूर्ण विषयों का विवेचन किया गया है।

साहित्यकारों का विवरण…

१. कहानीकार : पंडित गौरी दत्त, मुंशी प्रेमचंद, सुदर्शन, धनीराम, द्विजेन्द्रनाथ मिश्र, निर्गुण, सूर्यदेव परिव्राजक, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, यशपाल, श्रीमती स्त्यावती मलिक, श्रीमती चन्द्रकिरण सोमरिक्षा, डा. अशोक आर्य आदि।

२. निबंध लेखक : काली चरण, पंडित मोहनलाल विष्णु लाल पंड्या, पंडित रुद्रदत्त शर्मा, डॉक्टर हरिशंकर शर्मा, वैदिक, कृष्ण प्रसाद गौड़ बेढब, डॉक्टर वासुदेव शरण अग्रवाल, डॉक्टर नागेन्द्र, डॉक्टर सत्येन्द्र, डॉक्टर विजयेन्द्र स्नातक, डॉक्टर मुंशीराम शर्मा सोम, डॉक्टर धर्मवीर भारती, श्री क्षेमचंद्र सुमन आदि।

३. गद्यकार : आचार्य चतुरसेन, आचार्य अभयदेव विद्यालंकार, देवदत्त विद्यार्थी आदि।

४. सैद्धांतिक समीक्षक : पंडित शालिग्रमा शास्त्री, पंडित उदयवीर शास्त्री, डॉक्टर हरिदत्त शास्त्री, विश्वेश्वर सिद्धांतशिरोमणि, डॉक्टर सूर्यकांत शास्त्री, पंडित क्षेमचंद्र सुमन, डॉक्टर नगेन्द्र, तुलनात्मक समीक्षा पद्धति के जन्मदाता पद्मसिंह शर्मा, डॉक्टर मुंशी राम शर्मा, डॉक्टर विजयेन्द्र स्नातक, डॉक्टर सरयू प्रसाद अग्रवाल, डॉक्टर सुरेश कुमार विद्यालंकार, डॉक्टर हरदेव बाहरी आदि।

५. टीकाकार : पंडित पद्मसिंह शर्मा, डॉक्टर बाबूलाल सक्सेना, डॉक्टर वासुदेव सहारण अग्रवाल आदि।

६. इतिहासकार : डॉक्टर सूर्यकांत शास्त्री, डॉक्टर चर्तुरसेन शास्त्री, डॉक्टर विजयेन्द्र स्नातक, आ. क्षेमचन्द्र सुमन, डॉक्टर हरिवंश कोछड़, डॉक्टर धर्मवीर भारती, डॉक्टर नागेन्द्र, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु आदि।

७. तुलनात्मक साहित्य लेखक : डॉक्टर भर्ग सिंह, डॉक्टर विजयवीर विद्यालंकार, चंद्रभाणु सोणवाणे, डॉक्टर सुरेश कुमार विद्यालंकार, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु, डॉक्टर भवानी लाल भारती आदि।

८. हिंदी कवि : मुंशी केवल कृष्ण चारण, उमरदान, कविकुमार शेरसिंह वर्मा, पंडित बलभद्र मिश्रा, पंडित बाबूलाल शर्मा, सेठ मांगीलाल गुप्त, कविकिंकर नाथू राम शंकर, बद्रीदत्त शर्मा जोशी, नारायण प्रसाद बेताब, ठाकुर गदाधर सिंह, पंडित लोकनाथ तर्कवाचस्पति, स्वामी आत्मानंद, श्री कर्ण कवि, स. जसवंत सिंह टोहानवी, भूरा लाल व्यास, हरिशंकर शर्मा, विद्याभूषण विभु, पंडित चमूपति, पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार, पंडित दुलेराम देवाकरणी, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, पंडित विश्वंभर सहाय प्रेमी, राजकुमार रणवीर सिंह, पंडित अनूप शर्मा, पंडित सिद्धगोपाल कविरत्न, पंडित भद्रजीत चन्द्र, श्री हरिशरण श्रीवास्तव मराल, पंडित धर्मदत्त विद्यालंकार, राजा रणन्जय सिंह, डा. सूर्यदेव शर्मा, गायत्री देवी, डॉक्टर मुंशीराम शर्मा सोम, पंडित प्रकाश चन्द ‘कविरत्न’, पंडित सत्यकाम विद्यालंकार, स्वामी सत्यप्रकाश जी, पंडित अखिलेश शर्मा, पंडित लक्ष्मी नारायण शास्त्री( नारायणमुनि चतुर्वेदी), पंडित विद्यानीधि शास्त्री, रामनिवास विद्यार्थी, डॉक्टर सुशीला गुप्ता, कृष्णलाल कुसुमाकर, पंडित रमेशचंद्र शास्त्री, रामनारायण माथुर,(स्वामी ओम प्रेमी), प्रो.उत्तमचंद शरर, पंडित ओंकार मिश्र प्रणव, डॉक्टर मदन मोहन जावलिया, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु, कुँवर सुखलाल आर्य मुसाफिर, कुँ. जोरावर सिंह, प्रभादेवी, राधेश्याम आर्य, पंडित सत्यपाल पथिक आदि।

९. आत्मकथा लेखक : स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, भवानी दयाल संन्यासी, पंडित नरेंद्र जी, स्वामी विद्यानंद सरस्वती, स्वामी वेदानंद सरस्वती, भाई परमानंद, सत्यव्रत परिव्राजक, देवेन्द्र सत्यार्थी, पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय, गंगाप्रसाद जज, आचार्य नरदेव, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, महात्मा नारायण स्वामी, पंडित इंद्र विद्यावाचस्पति, संतराम बीए, पृथ्वी सिंह आजाद, आचार्य रामदेव, सत्यव्रत सिधान्तालंकार , पंडित रुचिराम जी, डॉक्टर भवानी लाल भारतीय, पंडित युधिष्ठिर मीमांसक, लाला लाजपत राय, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु, डॉक्टर अशोक आर्य, पंडित कमलेश कुमार आर्य अग्निहोत्री आदि।

१०. जीवनी लेखक : गोपालराव हरि देशमुख, चिम्मनलाल वैश्य, सत्यव्रत शर्मा द्विवेदी, दयाराम मुन्शी, रामविलास शारदा, चौधरी रायसिंह, स्वामी सत्यानन्द, दीपचंद्र, जगदीश विद्यार्थी (स्वामी जगादीश्वरानंद), त्रिलोक चन्द आर्य, म. आनंद स्वामी, पंडित मुनीश्वर देव, भूदेव शास्त्री, वैद्य गुरुदत्त, डॉक्टर भवानी लाल भारतीय, प्रा. राजेन्द्र जिग्यासु, डॉक्टर अशोक आर्य, श्रीमती राकेश रानी, विश्वंभर प्रसाद शर्मा, हरिश्चंद्र विद्यालंकार, इंद्र विद्यावाचस्पति, भारतेन्द्र नाथ, वेदानंद तीर्थ, श्रीराम शर्मा, स्वामी वेदानंद सरस्वती (दयानंद तीर्थ), सत्यप्रिय शास्त्री, डा. रामप्रकाश, आ. विष्णुमित्र, अलगुराय शास्त्री, प्रा. रामविचार, भक्त राम, डा. देशराज, सत्यव्रत, अवनींद्र, कृष्ण दत्त, स्वामी श्रद्धानंद, पंडित शंकर शर्मा, वीरेंद्र सिद्धू, ईश्वर प्रसाद वर्मा, धर्मवीर, उषा ज्योतिष्मती, स्वामी स्वतान्त्रानंद, देवी लाल पालीवाल, डॉक्टर बृजमोहन जावलिया, फतहसिंह मानव, दीनानाथ शर्मा, परमेश शर्मा, रघुवीर सिंह शास्त्री, पृथ्वीसिंह आजाद, ओमप्रकाश आर्य, महावीर अधिकारी, परमेश शर्मा, भाई परमानंद, जगदीश्वर प्रसाद, पंडित लेखराम जी आदि।

ग्रंथ और उसके ग्रंथाकार…

गोपाल शर्मा कृत ‘दयानंद-दिग्विजय’, ‘दयानन्द की दिनचर्या’, जगन्नाथ कृत ‘स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन चरित’, रामविलास शारदा कृत ‘आर्य धर्मेन्दु जीवन’, चिम्मनलाल वैश्य कृत ‘स्वामी दयानंद’, स्वामी सत्यानंद कृत ‘दयानंद प्रकाश’, देवेन्द्रनाथ कृत ‘दयानंद चरित’ आदि। आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों पर लिखित मौखिक ग्रंथों में नारायण स्वामी के ‘आत्मदर्शन’, ‘मृत्यु और कर्मलोक’, ‘कर्म रहस्य आदि ग्रन्थ’, ‘नित्यनांद एवं विश्वेश्वरानंद द्वारा प्रणीत पुरूषार्थ-प्रकाश’, ‘लाल दीवानचंद की स्वाध्याय–संग्रह’, ‘जीवन-ज्योति’, ‘नीति-विवेचन’, ‘जीवन-तत्व’ आदि, मुंशीराम शर्मा ने ’आर्य धर्म’, ‘प्रथम झा’ आदि उल्लेखनीय है तथा आर्य समाज के इतिहास पर पंडित नरेन्द्रदेव, पंडित इंद्र विद्यावाचस्पति, हरिचन्द्र विद्यालंकार आदि ने महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। भारत के राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के क्षेत्र में जयशंकर विद्यालंकार, हरिदत्त विद्यालंकार, सत्यकेतु विद्यालंकार आदि ने महत्वूपर्ण ग्रंथों की रचना की। इसके अलावा साहित्यक ग्रंथों में पंडित रूद्रदेव की ‘स्वर्ग में संबजेक्ट कमेटी’, ‘स्वर्ग में महासभा’, ‘पाखण्ड मूर्ति’, ‘कण्डी जनेउ का विवाह’ आदि प्रमुख हैं।

पत्र-पत्रिकाएँ…

आर्य समाज की प्ररेणा से प्रकाशित होने वाली निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाएँ हैं– १८८४ में वेद-प्रकाश (कानपुर), १८८५ में आर्य-पत्र (बरेली), आर्य समाचार, आर्य विनय (मुरादाबाद), १८८६ में आर्य सिद्धांत (प्रयाग ), आर्यावर्त (कलकत्ता), भारत-भगिनी (प्रयाग), राजस्थान समाचार (अजमेर), १८९० में तिमिर नाशक, ब्रह्मवर्त, १८९६ में परोपकारी अगारा, आर्य मित्रा, पांचाल-पण्डित, १८९९ में सिद्धर्म-प्रचारक, १९९० में आर्य-सेवक, १९०६ में दयानंद पत्रिका, १९०९ में भारतोदय, उषा, १९१० में नवजीवन, १९२० में भारती, १९२१ में वैदिक संदेश, १९२३ में अर्जुन, आर्य शक्ति, आर्य-मार्तण्ड, १९२४ में आर्य-जगत, १९२८ में हिन्दी मिलाप, १९४० में जागृति, १९४८ में गुरूकुल-पत्रिका, १९४९ में वेदवाणी, वेदपथ, वीर प्रताप इत्यादि।

इन सब के अलावा हिंदी के संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, शिकार कथा, नाटक- एकाकी लेखकों की भी आर्य समाज में भरमार है। वास्तव में हिंदी साहित्य की सेवा के क्षेत्र में आर्य समाजियों के नामों की पूर्ण गणना कर पाना संभव नहीं है। इतना कहा जा सकता है कि हिंदी लेखन क्षेत्र में आर्य समाजियों की असीमित संख्या के अतिरिक्त ऐसे भी सैंकड़ों नाम मिलेंगे, जो सीधे रूप में आर्य समाजी न होते हुए भी आर्य समाज से प्रभावित हैं।

विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

महामंत्री, अखील भारतीय साहित्य परिषद्, बक्सर (बिहार)

पता :–

ग्राम : मांगोडेहरी, डाक : खीरी,

जिला : बक्सर (बिहार)

पिन : ८०२१२८ 

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