केवल तुम और मैं: एक शाश्वत राग
१९ वर्षों की इस यात्रा में, अब शब्द भी कम पड़ते हैं,
जब हम एक-दूसरे की आँखों में, पूरी उम्र पढ़ते हैं।
इस कागज़ पर आज कोई और नाम, कोई और जिक्र न हो,
बस हमारी धड़कनें हों, और कल की कोई फ़िक्र न हो।
मैं शब्द हूँ अगर, तो तुम मेरा अर्थ हो,
तुम्हारे बिना मेरा हर छंद, नितांत व्यर्थ हो।
मैं अगर एक कवि हूँ, तो तुम मेरी पूर्ण कविता हो,
मैं अगर प्यासा राही, तो तुम बहती हुई सरिता हो।
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में, जब कभी मैं हारा हूँ,
तुम्हारी आवाज़ में ही, मैंने अपना किनारा पाया है।
मैं अगर पार्थ सा अर्जुन, तो तुम कृष्ण की गीता हो,
मेरे अंतर्मन की शुद्धि, तुम पावन माँ सीता हो।
कभी मेरा रूठ जाना, कभी तुम्हारा धीरे से मुस्कुराना,
जैसे सूखी धरती पर, सावन का चुपके से आ जाना।
बिछड़ने की उन चंद घड़ियों में, जो टीस हमने जागी थी,
मिलने की उस तड़प ने ही, ये डोर और कस के बाँधी थी।
कोई और न हो इस महफ़िल में, बस हम और हमारा साथ हो,
मेरी हर एक कलम की स्याही में, बस तुम्हारा ही हाथ हो।
१९ बरस तो बस इक पड़ाव हैं, हमें सदियों तक चलना है,
तुम्हारे ही साये में रहकर, मुझे हर रोज़ निखरना है।
१९वीं वर्षगाँठ की अनंत शुभकामनाएँ!