मंदिर: प्राचीन भारत के भव्य विश्वविद्यालय और ज्ञान की प्रयोगशालाएं
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण
प्रस्तावना: धारणा बनाम यथार्थ
भारतीय इतिहास के प्रति औपनिवेशिक दृष्टि ने हमारे मानस में यह बिठा दिया कि प्राचीन शिक्षा व्यवस्था केवल जंगलों में ऋषि-मुनियों की झोपड़ियों तक सीमित थी। निस्संदेह, प्राथमिक और आध्यात्मिक शिक्षा के लिए तपोवन एक आदर्श स्थान थे, लेकिन जब हम जटिल विज्ञान, खगोलशास्त्र (Astronomy), धातु विज्ञान (Metallurgy), व्याकरण और तर्कशास्त्र (Logic) की बात करते हैं, तो भारत के विशाल मंदिर परिसर ही इन विधाओं के ‘हब’ थे। ये मंदिर केवल पत्थरों की संरचनाएं नहीं थीं, बल्कि वे ज्ञान की ऐसी प्रयोगशालाएं थीं जहाँ ‘अर्चना’ और ‘अन्वेषण’ साथ-साथ चलते थे।
मंदिर विश्वविद्यालय: एक स्थापत्य और शैक्षणिक समन्वय
प्राचीन भारत में ‘मंदिर’ (Temple) और ‘मठ’ (Monastery) अक्सर एक-दूसरे के पूरक थे। दक्षिण भारत के पल्लव, चोल और होयसल राजवंशों के काल में मंदिरों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि उनमें हजारों छात्रों के रहने, भोजन करने और अध्ययन के लिए पर्याप्त स्थान हो।
उदाहरण के तौर पर, कांचीपुरम के मंदिरों को देखिए। कांची को प्राचीन काल में ‘घटिका’ (Ghatika) कहा जाता था, जिसका अर्थ था ‘उच्च शिक्षा का केंद्र’। ये घटिकाएं अक्सर बड़े मंदिर परिसरों के भीतर स्थित होती थीं। यहाँ केवल धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि ऋग्वेद से लेकर मीमांसा और धर्मशास्त्र तक का गहन अध्ययन होता था। शिलालेख बताते हैं कि इन केंद्रों में प्रवेश पाना आज के आधुनिक IIT या वैदेशिक विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने जितना ही कठिन और गरिमामय था।
शिलालेखों की गवाही: हलेबिडु और धारवाड़ के प्रमाण
कर्नाटक के हलेबिडु (Halebidu) और बेलूर के मंदिरों की दीवारों पर केवल नक्काशी नहीं है, बल्कि वे उस समय के ‘सिलेबस’ (पाठ्यक्रम) की गवाही देते हैं। धारवाड़ जिले में स्थित नागाई (Nagai) के मंदिर परिसर के शिलालेख एक अद्भुत जानकारी देते हैं। वहाँ १०५८ ईस्वी के एक शिलालेख के अनुसार, एक ‘घटिका’ में २०० छात्र वेदों का और ५० छात्र शास्त्रों का अध्ययन करते थे।
सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इन मंदिरों में व्याकरण (Grammar) के लिए अलग से प्रोफेसर होते थे। शिलालेखों में ‘शास्त्री’ और ‘भट्ट’ जैसे शब्दों का प्रयोग शिक्षकों के लिए किया गया है, जिन्हें मंदिर की ओर से भूमि और धन का अनुदान दिया जाता था ताकि वे केवल ज्ञान-दान में लीन रह सकें।
ज्ञान की प्रयोगशाला: विज्ञान और खगोलशास्त्र का संगम
मंदिरों को ‘ज्ञान की प्रयोगशाला’ कहना अतिशयोक्ति नहीं है। मंदिरों का वास्तु स्वयं में खगोलशास्त्र और गणित का जीवंत प्रमाण था।
खगोलशास्त्र (Astronomy): कोणार्क का सूर्य मंदिर हो या हंपी के विट्ठल मंदिर के स्तंभ, ये सौर मंडल की गति और समय की गणना के लिए सटीक यंत्रों की तरह कार्य करते थे। छात्र यहाँ बैठकर नक्षत्रों की गति का प्रत्यक्ष अनुभव करते थे।
धातु और रसायन विज्ञान (Chemistry): मंदिरों के बड़े घंटों का निर्माण, मूर्तियों के लिए ‘पंचधातु’ का संयोजन और स्तंभों की ऐसी पॉलिश जो हजारों साल बाद भी नहीं उतरी, यह सब मंदिरों से जुड़ी प्रयोगशालाओं में हुए शोध का परिणाम था। छात्र इन विधाओं को ‘ऑन-फील्ड’ (On-field) सीखते थे।
शिक्षण पद्धति: तर्क, वाद-विवाद और शास्त्रार्थ
मंदिरों के ‘मंडप‘ (Hall) आज की ‘कॉन्फ्रेंस हॉल’ की तरह थे। यहाँ केवल प्रवचन नहीं होते थे, बल्कि यहाँ ‘शास्त्रार्थ’ (Debate) की परंपरा थी।
नाट्यशाला और सभा मंडप: इन स्थानों पर तर्कशास्त्र (Nyaya) के छात्र आपस में वाद-विवाद करते थे। किसी भी नए दार्शनिक सिद्धांत को तब तक मान्यता नहीं मिलती थी जब तक उसे विद्वानों की सभा में मंदिर के प्रांगण में सिद्ध न कर दिया जाए।
पुस्तकालय (सरस्वती भंडार): कई बड़े मंदिरों में ‘सरस्वती भंडार’ नामक पुस्तकालय होते थे। यहाँ ताड़ के पत्तों पर लिखी हजारों पांडुलिपियां (Manuscripts) संरक्षित थीं। आक्रमणकारियों ने जब मंदिर जलाए, तो वास्तव में उन्होंने भारत के हजारों वर्षों के वैज्ञानिक शोध को जलाकर राख कर दिया।
सामाजिक और आर्थिक प्रबंधन: शिक्षा का वित्तपोषण
एक विश्वविद्यालय को चलाने के लिए विशाल धन की आवश्यकता होती है। प्राचीन भारत के मंदिर ‘संपन्न बैंक’ थे। राजा और धनी सेठ मंदिरों को गाँव के गाँव दान करते थे। इस दान का उपयोग ‘विद्यादान’ के लिए किया जाता था। छात्रों से कोई ‘ट्यूशन फीस’ नहीं ली जाती थी। उनके भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था मंदिर की आय से होती थी। यह एक ऐसा मॉडल था जहाँ ज्ञान किसी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि समाज का सामूहिक उत्तरदायित्व था।
विनाश का प्रभाव: शिक्षा का अंधकार युग
जब विदेशी आक्रांताओं ने मंदिरों को निशाना बनाया, तो उनका लक्ष्य केवल पत्थर की मूर्तियाँ तोड़ना नहीं था। वे जानते थे कि यदि मंदिर का विनाश कर दिया जाए, तो उस क्षेत्र की पूरी शिक्षा व्यवस्था ठप हो जाएगी। मंदिर टूटने के साथ ही:
१. छात्रवृत्ति और वित्तपोषण खत्म हो गया।
२. विशिष्ट विषयों (जैसे खगोलशास्त्र और चिकित्सा) के आचार्य विस्थापित हो गए।
३. पांडुलिपियों के भंडार नष्ट कर दिए गए।
यही कारण है कि जिसे हम आज ‘मध्यकाल का अंधकार’ कहते हैं, वह वास्तव में हमारे मंदिर-विश्वविद्यालयों के ध्वंस का परिणाम था। जो शिक्षा महलों से नहीं, बल्कि मंदिरों से संचालित होती थी, वह महलों के सुरक्षित रहने के बावजूद मंदिरों के टूटने से समाप्त हो गई।
निष्कर्ष: आधुनिक संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन
आज हमें अपनी ‘मंदिर’ और ‘गुरुकुल’ की परिभाषा को व्यापक बनाने की आवश्यकता है। मंदिर केवल घंटी बजाने और माथा टेकने की जगह नहीं थे; वे भारत की मेधा के प्रकाश स्तंभ थे। दक्षिण भारत के भव्य मंदिर आज भी उन लुप्त विश्वविद्यालयों के अवशेष के रूप में खड़े हैं।
यदि हम पुनः भारत को ‘विश्वगुरु’ के रूप में देखना चाहते हैं, तो हमें मंदिरों के उस ‘अकादमिक और वैज्ञानिक’ स्वरूप को पहचानना होगा। हमें समझना होगा कि हलेबिडु और कांचीपुरम की दीवारों पर उकेरा गया ज्ञान, किसी भी आधुनिक डिग्री से कहीं अधिक गहरा और प्रयोगात्मक था।
यह आलेख हमें प्रेरित करता है कि हम अपने अतीत को केवल श्रद्धा की आँखों से नहीं, बल्कि तर्क और शोध की दृष्टि से भी देखें।
संदर्भ:
अभिलेखीय साक्ष्य: दक्षिण भारतीय शिलालेख (South Indian Inscriptions – SII).
ऐतिहासिक संदर्भ: ए.एस. अल्टेकर की ‘Education in Ancient India’.
वास्तु शास्त्र: मयमतम् और मानसार के सिद्धांत।
‘चिकित्सा और आरोग्यशाला’ की ओर बढ़ें!