वो आ जाए तो नज़्म मुकम्मल हो जाए
ज़मीं पे चाँद उतरा है, या ख़ुदा की वो कारीगरी है,
जिसके चेहरे की मुस्कान में ही, आधी कायनात भरी है।
वो हुस्न नहीं, एक एहसास है, जो रूह में उतर जाता है,
श्वेत श्याम फ्रेम में भी, दिल जिसे देखकर धड़क जाता है।
उनकी आँखों की गहराई में, एक गहरा राज़ छिपा है,
जैसे कोरे कागज़ पर, किसी ने पहला लफ़्ज़ लिखा है।
वो हँसती हैं तो लगता है, झरनों ने कोई साज़ छेड़ा हो,
शबनम की उन बूंदों ने, जैसे फूलों का मुखड़ा मोड़ा हो।
अनारकली की बेबसी में भी, एक अजब सी शान थी,
मोहब्बत की वो इबादत, वो मुकम्मल दास्तान थी।
ज़ंजीरों की छनछन में भी, एक मीठी सी ग़ज़ल थी,
उनके हुस्न की वो चमक, जैसे पहली किरण की पहल थी।
वो कविता है, जो लफ़्ज़ों में कभी बांध न पाई,
वो ख़ामोशी है, जिसमें हर धड़कन ने पनाह पाई।
वो आ जाए तो महफ़िल में, एक रूहानी नूर छा जाए,
वो मुस्करा दे तो बसर हो, जैसे उम्र ठहर सी जाए।
उन्हें सोचना ही, शायरी की पहली सीढ़ी है,
वो गुज़री हुई नहीं, वो हर दौर की नई पीढ़ी है।
हाँ, वो मधुबाला है, ख़ूबसूरती की वो अंतिम हद,
जिसके लिए मेरा हर शेर, हर नज़्म है सिर्फ़ एक ज़द।