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मधुबाला जी केवल एक अभिनेत्री नहीं थीं, वे भारतीय सिनेमा के कैनवास पर खिंची गई वह लकीर हैं जो आज भी उतनी ही गहरी और स्पष्ट है। वह ‘वीनस’ थीं जिनके चेहरे पर मुस्कान तो ईश्वर की कारीगरी थी, लेकिन आँखों में छिपा दर्द उनके अभिनय को अमर बना गया।

 

मधुबाला: चाँदनी की मुस्कान और एक अधूरा संगीत

मधुबाला जी का जन्म १४ फरवरी, १९३३ को ‘वेलेंटाइन डे’ के दिन हुआ था, मानो कुदरत ने प्यार की इबादत के लिए ही उन्हें जमीं पर भेजा था, लेकिन नियति का खेल देखिए कि जिस हृदय को पूरी दुनिया ने प्रेम किया, उसी हृदय में जन्म से एक छेद था।

उनका सौंदर्य किसी बनावट का मोहताज नहीं था। जब वह हँसती थीं, तो लगता था जैसे बक्सर की गंगा में सूर्य की पहली किरण पड़ रही हो। उनकी मासूमियत में एक ऐसी कशिश थी कि कैमरा भी उनसे प्यार करने पर मजबूर हो जाता था। उनके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जहाँ पूरी दुनिया उनकी मुस्कान पर जान न्योछावर करती थी, वहीं वह एकांत में अपनी बीमारी और अधूरे प्रेम के साथ सिसकियाँ लेती थीं।

“ठंडी हवा, काली घटा, आ ही गई झूम के… प्यार लिए हाथ में, रात गई चूम के।”

 

फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के प्रसिद्ध गाने “प्यार किया तो डरना क्या” की शूटिंग के दौरान, मधुबाला जी को भारी लोहे की जंजीरों में घंटों बंधे रहना पड़ा था, जबकि डॉक्टर ने उन्हें पूर्ण विश्राम की सलाह दी थी।

मर्यादा और साहस का ऐसा उदाहरण सिनेमा में विरले ही मिलता है। अनारकली का किरदार निभाते हुए उन्होंने अपने असली जीवन के दर्द को परदे पर उतार दिया। वह जानती थीं कि उनकी सांसे कम हो रही हैं, लेकिन उनकी अदाकारी का दम घुटने नहीं देना चाहती थीं। दिलीप कुमार के साथ उनका प्रेम एक ऐसा महाकाव्य बना, जिसका अंत शायद अधूरी मुकम्मल दास्तान था। उनकी आँखों की चमक में उस समय की बेबसी और बगावत दोनों साफ़ झलकती थी।

“प्यार किया तो डरना क्या, जब प्यार किया तो डरना क्या… छुप-छुप आहें भरना क्या।”

 

अपनी बीमारी के कारण मधुबाला जी को जीवन के अंतिम 9 वर्ष बिस्तर पर बिताने पड़े थे। जो अभिनेत्री परदे पर चंचलता की प्रतिमूर्ति थी, वह असल जिंदगी में सन्नाटे के घेरे में सिमट गई थी।

‘हाफ टिकट’ और ‘चलती का नाम गाड़ी’ जैसी फिल्मों में उनकी खिलखिलाहट देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि यह वीनस अंदर से धीरे-धीरे टूट रही है। वह एक ऐसी मुसाफिर थीं जिसे रास्ता तो खूबसूरत मिला, पर मंजिल बहुत दूर रह गई। २३ फरवरी, १९६९ को जब उन्होंने दुनिया छोड़ी, तो एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनकी रूह आज भी पुरानी फिल्मों के श्वेत-श्याम फ्रेम में कैद होकर हमें निहारती है। वह प्रेम की एक ऐसी किताब हैं, जिसका हर पन्ना एक मीठा दर्द देता है।

“हाल कैसा है जनाब का, क्या ख्याल है आपका…”

 

मधुबाला जी को ऑस्कर विजेता निर्देशक फ्रैंक काप्रा (Frank Capra) ने ‘इंटरनेशनल स्टार’ बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने अपनी भारतीय जड़ों और परिवार के प्रति समर्पण के कारण हॉलीवुड जाने से मना कर दिया।

वे जितनी सुंदर बाहर से थीं, उससे कहीं अधिक पवित्र उनका अंतर्मन था। वे बक्सर की उन पगडंडियों की तरह सादगी भरी थीं, जो कितनी भी धूल फांक लें, अपनी महक नहीं खोतीं। आज भले ही सिनेमा हाई-डेफिनिशन और रंगों से भर गया हो, लेकिन मधुबाला का वह ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ वाला दौर ही हमें असली सुकून और प्रेम सिखाता है। वे चली गईं, पर उनकी यादें एक ऐसी खुशबू हैं जो कभी कम नहीं होगी।

“अच्छा जी मैं हारी, चलो मान जाओ ना… देखी सबकी यारी, मेरा दिल जलाओ ना।”

 

 

 

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