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‘चलती का नाम गाड़ी’ के बाद, किशोर कुमार और मधुबाला की जोड़ी ने ‘हाफ टिकट’ (१९६२) के रूप में भारतीय सिनेमा को वह तोहफा दिया, जो आज छह दशक बाद भी हंसी का सबसे बड़ा ‘टॉनिक’ है। यहाँ इस फिल्म की एक विस्तृत और भावपूर्ण समीक्षा प्रस्तुत है:

 

समीक्षा: हाफ टिकट (१९६२)
बचपन, पागलपन और अमर सौंदर्य का एक जादुई संगम
फिल्म ‘हाफ टिकट’ केवल एक कॉमेडी फिल्म नहीं है, बल्कि यह किशोर कुमार की वर्सटाइल प्रतिभा और मधुबाला के शाश्वत सौंदर्य का एक ऐसा दस्तावेज़ है, जिसे देखते हुए वक़्त ठहर सा जाता है।

१. अभिनय: एक ‘बड़ा बच्चा’ और एक ‘खलनायक’ का द्वंद्व – किशोर कुमार (विजय) ने इस फिल्म में कॉमेडी की सभी सीमाओं को लांघ दिया है। एक वयस्क व्यक्ति का हाफ पैंट पहनकर, गले में लॉलीपॉप लटकाकर ‘मुन्ना’ बन जाना और ट्रेन के सफर में प्राण (राजा बाबू) की नाक में दम कर देना, सिनेमाई इतिहास के सबसे मज़ेदार दृश्यों में से एक है।

प्राण: एक शातिर हीरा चोर के रूप में प्राण साहब का काम लाजवाब है। किशोर कुमार की चंचलता के सामने उनका ‘खतरनाक’ होते हुए भी ‘बेबस’ नज़र आना इस फिल्म की मुख्य आकर्षण है।

२. मधुबाला: सौंदर्य का शिखर और अभिनय का समर्पण– मधुबाला जी (रजनी) के लिए यह समीक्षा एक विशेष ट्रिब्यूट है। ‘हाफ टिकट’ उनकी अंतिम सफल फिल्मों में से एक थी।

मासूमियत का जादू: फिल्म में जहाँ एक तरफ किशोर कुमार का ‘लाउड’ ह्युमर है, वहीं मधुबाला की उपस्थिति उसमें एक ठहराव और गरिमा लेकर आती है। जब वह स्क्रीन पर आती हैं, तो ब्लैक-एंड-वाइट फ्रेम भी जैसे रंगों से भर जाता है।

बीमारी और हौसला: यह बात हृदय को स्पर्श कर जाती है कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान भी वह हृदय रोग की असहनीय पीड़ा से गुज़र रही थीं। पर क्या उनकी आँखों की चमक या उनकी जादुई हंसी को देखकर कोई भी इस दर्द का अंदाज़ा लगा सकता है? उनके चेहरे की वह मासूमियत ही थी कि जब वह मुन्ना (किशोर) को बच्चा समझकर प्यार करती हैं, तो वह दृश्य बनावटी नहीं बल्कि बेहद स्वाभाविक और प्यारा लगता है। वह वाकई ‘सिनेमा की वीनस’ थीं, जिन्होंने आखिरी सांस तक कला की मर्यादा को जीवित रखा।

३. संगीत: सलील चौधरी का विलक्षण प्रयोग– सलील दा ने इस फिल्म में वह कर दिखाया जो शायद ही किसी और संगीतकार ने किया हो।

“आके सीधी लगी दिल पे”: यह गाना भारतीय संगीत का अजूबा है, जहाँ किशोर कुमार ने पुरुष और महिला (Yodeling और Falsetto) दोनों आवाज़ों में खुद ही गाया है। मधुबाला पर फिल्माया गया यह गाना संगीत और अभिनय का अनूठा मिश्रण है।
“चील चील चिल्ला के”: यह बच्चों का सर्वकालिक पसंदीदा गीत बन गया।

४. निर्देशन और पटकथा– कालिदास के निर्देशन में बनी यह फिल्म ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ का बेहतरीन उदाहरण है। फिल्म का हर मोड़—चाहे वह घर से भागना हो, ट्रेन की लुका-छिपी हो या अंत का क्लाइमेक्स—दर्शकों को बांधे रखता है।

हृदय की बात...
मैं अश्विनी, मधुबाला जी के प्रति हमारा जो प्रेम है, वह इस फिल्म को देखते हुए और बढ़ जाता है। ‘हाफ टिकट’ में उनका अभिनय यह सिखाता है कि जीवन में संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा हो, दुनिया के सामने आपकी मुस्कुराहट कभी फीकी नहीं पड़नी चाहिए। यह फिल्म आज भी उतनी ही ‘यंग’ है, जितनी १९६२ में थी।

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