images (23)

सुरों का द्वंद्व और आदर्शों का अवसान: ऋषिकेश मुखर्जी की ‘आलाप’ का संपूर्ण और ईमानदार कूट-विमर्श

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

प्रस्तावना: ‘आनंद’ और ‘अभिमान’ के बाद ऋषिका का एक गंभीर प्रयोग

सत्तर के दशक में जहाँ भारतीय सिनेमा एंग्री यंग मैन के उभार और मारधाड़ वाली फिल्मों की तरफ बढ़ रहा था, वहीं ऋषिकेश मुखर्जी (ऋषिका) मानवीय संवेदनाओं के मूक झरोखों से जीवन की सच्चाई दिखा रहे थे। सन १९७७ में प्रदर्शित फिल्म ‘आलाप’ ऋषिका के करियर की सबसे गंभीर, उदास और वैचारिक रूप से सुदृढ़ फिल्मों में से एक है। ‘आनंद’ और ‘अभिमान’ की अपार सफलता के बाद अमिताभ बच्चन और ऋषिका की यह जोड़ी एक ऐसे कथानक के साथ आई, जो व्यावसायिक रूप से भले ही बॉक्स ऑफिस पर वैसी सफलता न पा सकी, लेकिन कला और संवेदना के धरातल पर यह हिंदी सिनेमा की एक अमर धरोहर बन गई। यह फिल्म शास्त्रीय संगीत की पवित्रता, पिता-पुत्र के वैचारिक मतभेद, और पूँजीवाद बनाम कला के संघर्ष का एक मार्मिक दस्तावेज़ है।

 

कलाकार

अमिताभ बच्चन – अलोक प्रसाद

रेखा – राधाकुमारी (रधिया)

ओम प्रकाश – वकील त्रिलोकी प्रसाद

विजय शर्मा – अशोक प्रसाद

लिली चक्रवर्ती – गीता अशोक प्रसाद

मास्टर रवि – अलोक व राधा का पुत्र

छाया देवी – सरजूबाई बनारसवाली

असरानी – गणेश (गणेशी)

मनमोहन कृष्णा – महाराज दीनानाथ

युनुस परवेज़ – गुप्ता

ललिता कुमारी – श्रीमती गुप्ता

फरीदा जलाल – सुलक्षणा गुप्ता

बेंजामिन गिलानी – किशन

ए के हंगल – पंडित जमुना प्रसाद (अतिथि पात्र)

संजीव कुमार – राजा बहादुर (अतिथि पात्र)

 

कथानक का वितान: वर्ग-संघर्ष और आदर्शों की टकराहट

‘आलाप’ की कहानी कोई साधारण पारिवारिक ड्रामा नहीं है। इसके केंद्र में है—आलोक प्रसाद (अमिताभ बच्चन), जो एक बेहद अमीर और कड़क मिजाज वकील त्रिलोकी प्रसाद (ओम प्रकाश) का छोटा बेटा है।

पिता का दृष्टिकोण (पूँजीवादी व्यवस्था): त्रिलोकी प्रसाद के लिए जीवन का अर्थ केवल पैसा, रूतबा, कानून और सामाजिक प्रतिष्ठा है। वे चाहते हैं कि आलोक भी वकालत सीखे और उनके इस साम्राज्य को आगे बढ़ाए।

पुत्र का दृष्टिकोण (कलात्मक स्वतंत्रता): आलोक का झुकाव संगीत की तरफ है। वह पैसे की इस अंधी दौड़ से दूर सुरों की साधना में शांति खोजता है। वह वकालत सीखने के बजाय शास्त्रीय संगीत की एक वयोवृद्ध और परित्यक्ता गायिका सरजू बाई (छवि विश्वास / जद्दनबाई की याद दिलाती संजीवनी) के पास जाकर संगीत सीखता है और गरीबों के साथ समय बिताता है।

यह कहानी तब एक बड़ा मोड़ लेती है जब आलोक अपने पिता की सुख-सुविधाओं और धन-दौलत को लात मारकर एक तांगे वाले गणेश (असरानी) के घर रहने चला जाता है और अपनी आजीविका के लिए स्वयं तांगा चलाने लगता है। यह विद्रोह एक पुत्र का पिता के प्रति नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान का शोषक पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति है।

 

अध्याय-दर-अध्याय (Chapter-wise) गहन विश्लेषण

फिल्म के नैरेटिव (कथानक) को हम मुख्य रूप से चार अध्यायों में विभाजित करके समझ सकते हैं:

अध्याय १: शांत आलाप और अंतर्द्वंद्व की शुरुआत

फिल्म की शुरुआत आलोक के शहर लौटने और पिता के घर में व्याप्त एक ठंडी औपचारिकता से होती है। आलोक का बड़ा भाई सर्वेश (विजय शर्मा) पिता की उँगली पर नाचने वाला एक आज्ञाकारी पुत्र है, लेकिन आलोक के भीतर एक छटपटाहट है। इस अध्याय में ऋषिका ने बहुत ही शांति से आलोक के अंतर्मन को दिखाया है, जो महलों की चकाचौंध में भी अकेला है और उसे सुकून केवल सरजू बाई के कोठे से आने वाली शास्त्रीय तानों में मिलता है।

अध्याय २: विद्रोह और निष्कासन

जब पिता त्रिलोकी प्रसाद को पता चलता है कि उनका बेटा एक वेश्या/गायिका के यहाँ जाकर समय बिताता है और कोर्ट जाने के बजाय तांगे वालों की बस्ती में बैठता है, तो उनके अहंकार को गहरी चोट पहुँचती है। यहाँ वर्ग-संघर्ष खुलकर सामने आता है। पिता अपनी कूटनीति से सरजू बाई के मकान को खाली करवा देते हैं। यह घटना आलोक को हिलाकर रख देती है और वह घर छोड़ने का ऐतिहासिक निर्णय लेता है। यह अध्याय व्यक्ति की स्वतंत्रता और पारिवारिक तानाशाही के बीच के द्वंद्व को दर्शाता है।

अध्याय ३: यथार्थ का धरातल और तांगे का पहिया

घर छोड़कर आलोक अपनी प्रेमिका राधा (रेखा) की मदद और तांगे वाले दोस्त गणेश के सहयोग से अपनी नई जिंदगी शुरू करता है। वह अभिजात्य वर्ग का चोगा उतारकर खुद तांगा चलाता है। यह अध्याय फिल्म का सबसे मजबूत वैचारिक हिस्सा है। एक बैरिस्टर का बेटा सड़कों पर तांगा चला रहा है—यह समाज की उस रूढ़ि पर प्रहार है जो श्रम को छोटा समझती है।

अध्याय ४: त्रासदी, बीमारी और मानवीय विवशता

अंतिम अध्याय में कहानी एक गहरी त्रासदी (Tragedy) की ओर बढ़ती है। लगातार कठिन परिश्रम और गरीबी के कारण आलोक गंभीर रूप से बीमार हो जाता है (तपेदिक/टीबी का शिकार)। इस अध्याय में ऋषिका ने दिखाया है कि आदर्शों की राह कितनी पथरीली होती है। जब तक पिता को अपनी गलती का अहसास होता है, तब तक आलोक जीवन और मृत्यु के कगार पर खड़ा हो जाता है।

 

संगीत विमर्श: फिल्म की आत्मा और जयदेव का अमर अवदान

‘आलाप’ का संगीत संगीतकार जयदेव की साधना का शिखर है। जब ऋषिका की नियमित पसंद राहुल देव बर्मन या लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के बजाय उन्होंने जयदेव को चुना, तो इसका कारण था कि इस फिल्म को फिल्मी गानों की नहीं, बल्कि ‘शास्त्रीय शुचिता’ की आवश्यकता थी। डॉ. हरिवंश राय बच्चन की कविताओं और कवींद्र रवींद्रनाथ टैगोर की धुनों का इसमें जो उपयोग हुआ है, वह अद्वितीय है।

हर एक गाने का सूक्ष्म मूल्यांकन:

१. “कोई गाता मैं सो जाता” (गायक: के. जे. येसुदास, गीत: डॉ. हरिवंश राय बच्चन):

यह गाना फिल्म की बुनियाद है। येसुदास की मखमली और गहरी आवाज में जब बच्चन जी की पंक्तियाँ गूँजती हैं, तो वह आलोक के अकेलेपन और मानसिक थकान को पूरी तरह बयां कर देती हैं। गाने का फिल्मांकन बेहद सादगी भरा है, जहाँ कोई तामझाम नहीं बल्कि केवल चेहरे के भाव और सुरों का जादू है।

२. “चाँद अकेला जाए रे” (गायिका: लता मंगेशकर):

यह विरह और अलगाव का एक अद्भुत गीत है। यह गाना सरजू बाई के अकेलेपन और आलोक की अंतहीन खोज को एक साथ जोड़ता है। जयदेव ने इसमें वाद्य यंत्रों का न्यूनतम उपयोग करके लता जी की आवाज की शुद्धता को उभारा है।

३. “माता सरस्वती शारदा” (गायिका: लता मंगेशकर और दिलराज कौर):

यह एक शुद्ध शास्त्रीय बंदिश और प्रार्थना है। यह गीत फिल्म में संगीत की पवित्रता और गुरु-शिष्य परंपरा को स्थापित करता है। सरजू बाई के सानिध्य में आलोक का संगीत की दीक्षा लेना इस गीत के माध्यम से पवित्र हो जाता है।

४. “ज़िंदगी को सँवारना होगा” (गायक: के. जे. येसुदास):

यह एक आशावादी गीत है जो तब आता है जब आलोक घर छोड़कर अपनी नई दुनिया बसाने की कोशिश करता है। यह कर्म और श्रम के महत्व को प्रतिपादित करता है।

५. “नैया मोरी चलत नहीं” (गायिका: असग़री बाई / कुमारी निवेदिता के भाव):

यह पारंपरिक लोक और शास्त्रीयता का अद्भुत मिश्रण है, जो जीवन रूपी नैया के डगमगाने और ईश्वर से प्रार्थना को दर्शाता है।

 

संवाद (Dialogue) विमर्श: शब्दों की कटीली धार

राही मासूम रज़ा और बीरेन ट्राई ने फिल्म के संवाद लिखे हैं। इसके संवाद लंबे और लच्छेदार नहीं हैं, बल्कि छोटे और सीधे दिल पर चोट करने वाले हैं।

त्रिलोकी प्रसाद (ओम प्रकाश) का संवाद: “कानून जज्बात को नहीं मानता, और मैं वकालत में जज्बात की वकालत नहीं कर सकता।” यह संवाद उनके चरित्र की क्रूरता और व्यावसायिकता को एक ही बार में स्पष्ट कर देता है।

आलोक (अमिताभ) का संवाद: “पिताजी, आपकी अदालत में इंसान के गुनाहों का फैसला होता होगा, लेकिन सरजू बाई के कोठे पर इंसान की रूह का सुधार होता है।” यह संवाद समाज की कृत्रिम नैतिकता पर एक करारा तमाचा है।

गणेश (असरानी) का संवाद: “अमीर जब गरीब के घर आता है बाबूजी, तो वह अपनी अमीरी का अहसान जताने आता है, लेकिन आप तो अपना दिल लेकर आए हैं।” यह संवाद वर्ग-भेद की खाई को बहुत ही खूबसूरती से पाटता है।

 

अवगुण पक्ष: समीक्षा में पूर्ण ईमानदारी

एक निष्पक्ष समीक्षक के रूप में ‘आलाप’ में कुछ कमजोरियाँ साफ नजर आती हैं:

अत्यधिक सुस्ती और धीमापन (Pacing Issue): फिल्म की गति इतनी धीमी है कि सत्तर के दशक का आम दर्शक इससे खुद को जोड़ नहीं पाया। ऋषिका ने दृश्यों को इतना लंबा खींचा है कि कई जगहों पर फिल्म ‘आलाप’ न रहकर एक लंबा मौन बन जाती है।

चरित्रों का अति-आदर्शवाद (Melodramatic Idealism): आलोक का चरित्र कुछ ज्यादा ही मसीहा जैसा (Too idealistic) दिखाया गया है। एक बैरिस्टर के बेटे का तांगा चलाना और फिर बीमार होकर लगभग मरणासन्न हो जाना, कहानी को अत्यधिक मेलोड्रामैटिक और दुखांतिका की ओर धकेलता है, जो व्यावहारिक जीवन से थोड़ा दूर प्रतीत होता है।

अमिताभ बच्चन की छवि का विरोधाभास: १९७७ तक अमिताभ बच्चन ‘जंजीर’, ‘दीवार’ और ‘शोले’ के माध्यम से ‘एंग्री यंग मैन’ बन चुके थे, जो व्यवस्था को लात मारता था और अन्याय के खिलाफ लड़ता था। ‘आलाप’ में भी वे व्यवस्था (पिता) के खिलाफ लड़ते हैं, लेकिन उनका यह रूप अत्यंत लाचार, मूक और बीमार है। दर्शक अमिताभ को इस कदर बेबस और खांसते हुए टीबी के मरीज के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए, जिससे फिल्म का व्यावसायिक संतुलन बिगड़ गया।

अंतिम दृश्य में जल्दबाजी: पूरी फिल्म जहाँ कछुए की गति से चलती है, वहीं इसका अंत अचानक बहुत तेजी से बदलता है, जहाँ पिता का हृदय परिवर्तन और आलोक का बचना बहुत ही पारंपरिक फिल्मी अंदाज में समेट दिया गया है।

 

फिल्म का अंत और निष्कर्ष (Conclusion)

‘आलाप’ का अंत ऋषिका की अन्य फिल्मों की तरह पूरी तरह से दुखद नहीं है, लेकिन यह एक गहरा ज़ख्म छोड़ जाता है। पिता त्रिलोकी प्रसाद का अहंकार तब टूटता है जब उनका अपना बेटा वकालत की डिग्री को उनके पैरों में फेंककर जिंदगी और मौत से लड़ रहा होता है। अंत में पिता स्वयं तांगे की कमान संभालते हैं, जो उनके वैचारिक आत्मसमर्पण और श्रम के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

निष्कर्ष के तौर पर कहें तो, ‘आलाप’ केवल एक फिल्म नहीं बल्कि एक गंभीर कलात्मक प्रयोग थी। यह दिखाती है कि जब समाज में कला (संगीत) का मूल्यांकन पैसे से होने लगता है, तो समाज का सांस्कृतिक पतन निश्चित है। अमिताभ बच्चन का संजीदा अभिनय, ओम प्रकाश का कड़क सधे हुए खलनायक और पिता का रूप, असरानी का बेहतरीन चरित्र अभिनय और जयदेव का अमर संगीत मिलकर ‘आलाप’ को हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक ऐसा मूक आलाप बनाते हैं, जिसकी गूँज आज लगभग ५० वर्षों बाद भी सिनेमा प्रेमियों के कानों में उतनी ही मधुर और प्रामाणिक लगती है।

दल

निर्देशक – हृषिकेश मुखर्जी

कथा – हृषिकेश मुखर्जी

पटकथा – बिमल दत्ता

संवाद – राही मासूम रज़ा, बीरेन त्रिपाठी, जेहन नय्यर

सम्पादक – खान ज़मान खान

निर्माता – हृषिकेश मुखर्जी, एन सी सिप्पी, रोमू एन सिप्पी

निर्माण संस्था – रूपम चित्रा

चलचित्रण – जयवंत पाठारे

कला निर्देशक – अजित बेनर्जी

वस्त्राभिकल्पना – भानु अथैया, शालिनी शाह

वस्त्र एवं भूषा – बाबू घाणेकर

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *