व्यंग्य: ‘मुद्दों का सर्कस और अक्ल की चाबी’
सिलेंडर बाबा रूठ गए हैं,
चूल्हे पर अब मौन है,
डिग्री लेकर घूम रहे जो,
पूछता उनको कौन है?
अस्पताल की पर्ची कहती—
‘धीरज धरिए, राम भली’,
पर विज्ञापन कहते हैं—
‘स्वर्ग बन गई हर एक गली!’
हँसते-हँसते समझें ज़रा:
विपक्ष कहता ‘ईवीएम’ में
भूत कोई घुस जाता है,
सत्ता कहती ‘जाति-धर्म’ बिन
चैन कहाँ मिल पाता है?
मंदिर-मस्जिद की बहस में,
रोटी ठंडी पड़ गई,
पर टीवी पर तो ‘सीमा’ की,
साड़ी की चर्चा चढ़ गई!
न्यूज़ एंकर चिल्लाते हैं—
“मंगलसूत्र की कीमत क्या?”
मुस्कान के घर झांक रहे हैं,
छोड़ के अपनी मर्यादा।
खोज रहे हैं छठवां बच्चा,
किसका कुनबा कितना है?
भूल गए कि देश का असली,
दुख और दर्द ही जितना है।
सुधार की राह (हास्य के साथ):
सुनो ओ भाइयों-बहनों,
सर्कस बंद अब करना होगा,
सिर्फ शोर से काम न चलता,
ख़ुद ही पढ़ना-लिखना होगा।
नेताजी से पूछो— ‘बेटा,
स्कूल में कुर्सी आई क्या?’
मीडिया से कहो— ‘पड़ोसी छोड़ो,
खेती-बारी दिखाई क्या?’
वोट उसे जो ‘कल’ की सोचे,
न कि ‘कलह’ को बोता हो,
जो जनता के आंसू पोंछे,
न कि ख़ुद ही सोता हो।
जब मुद्दे होंगे पढ़ाई-कमाई,
और सुधरेगा सबका आचरण,
तभी बनेगा ‘विकसित भारत’,
और होगा ‘सुखद वातावरण’।