images (17)

पास बैठे हैं सब, पर कोई पास नहीं,
धड़कनों में अब पहले जैसी प्यास नहीं।
चेहरों पर बिखरी है इक नीली सी छाया,
इस कांच के टुकड़े ने कैसा जाल बिछाया?

 

एक अदृश्य भूत है, जो कमरे में बैठा है,
रिश्तों की गर्माहट को, चुपचाप वह गटक रहा है।
हाथों में अंगूठे बस स्क्रीन सहलाते हैं,
हम साथ होकर भी, न जाने कहाँ खो जाते हैं।

 

मेले सा शोर है इन डिजिटल गलियों में,
पर सन्नाटा पसरा है घर की दहलीज में।
आंखें थक चुकी हैं रोशनी को पीते-पीते,
हम अपनी ही परछाईं के साए में जीते-जीते।

 

बातों के सिलसिलों को इमोजी ने ढक लिया,
जीते-जागते इंसान को ‘प्रोफाइल’ ने रख लिया।
जागो कि इससे पहले रूह पत्थर हो जाए,
कहीं इस चमक में, असली ज़माना न खो जाए।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *