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आशा गणपतराव भोसले (जन्म: ८ सितम्बर, १९३३ – मृत्यु: १२ अप्रैल २०२६) भारतीय संगीत इतिहास की सबसे प्रभावशाली और बहुमुखी पार्श्वगायिका थीं। पंडित दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री और ‘सुर सम्राज्ञी’ लता मंगेशकर की अनुज आशा जी ने अपनी जादुई आवाज़ से लगभग १६,००० से अधिक गीतों को जीवंत किया। उन्हें ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ द्वारा संगीत इतिहास में सबसे अधिक रिकॉर्डिंग करने वाली कलाकार के रूप में भी मान्यता दी गई।

 

१. संक्षिप्त जीवनी और प्रारंभिक संघर्ष

आशा जी का जन्म महाराष्ट्र के सांगली में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। जब वे मात्र ९ वर्ष की थीं, तब उनके पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए उन्होंने और लता जी ने गाना शुरू किया। १६ वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अपनी मर्जी से गणपतराव भोसले से विवाह किया, लेकिन यह वैवाहिक जीवन अत्यंत कष्टकारी रहा। १९६० में वे अपने बच्चों के साथ घर लौट आईं। बाद में, १९८० में उन्होंने महान संगीतकार आर. डी. बर्मन (पंचम दा) से विवाह किया, जिनके साथ उनकी जोड़ी ने संगीत के सुनहरे युग की रचना की।

 

२. दिग्गज संगीत निर्देशकों के साथ जुगलबंदी

आशा जी की आवाज़ में वह लचीलापन था कि वे हर संगीतकार की पहली पसंद बनीं:

ओ. पी. नैय्यर: उन्होंने आशा जी की आवाज़ में चंचलता को पहचाना (‘आईये मेहरबां‘, ‘जाईये आप कहाँ जायेंगे‘ )।

आर. डी. बर्मन: इस जोड़ी ने संगीत की परिभाषा बदल दी। चाहे वह ‘दम मारो दम‘ जैसा रॉक गीत हो या ‘ओ मेरा सोना रे‘ जैसा रोमांटिक।

एस. डी. बर्मन:रात अकेली है‘ जैसे गीतों में उनकी आवाज़ की नज़ाकत देखते ही बनती थी।

ए. आर. रहमान: आधुनिक दौर में ‘रंगीला रे‘ और ‘कही आग लगे‘ जैसे गीतों से उन्होंने नई पीढ़ी को भी अपना मुरीद बना लिया।

 

३. भोजपुरी गीतों में योगदान

आशा जी का भोजपुरी मिट्टी से गहरा लगाव था। उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के स्वर्ण युग में अपनी आवाज़ दी:

‘दंगल’ और ‘धरती मैया’ जैसी फिल्मों में उनके गीत आज भी लोक-संस्कृति का हिस्सा हैं।

कइसन बनल बाड़ू“, “सैयां जी भइले कोतवाल” और “गोरिया कर के सिंगार” जैसे गीतों ने उन्हें उत्तर भारत के गांव-गांव में लोकप्रिय बना दिया।

 

४. हिंदी सिनेमा के कालजयी गीत

उनके हिंदी गानों की सूची अनंत है, जिन्हें शैलियों में बांटा जा सकता है:

क्लासिक/गज़ल: ‘इन आँखों की मस्ती के’, ‘दिल चीज़ क्या है’ (फिल्म: उमराव जान)।

रोमांटिक: ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’, ‘अभी न जाओ छोड़कर’।

कैबरे/डांस: ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘ये मेरा दिल प्यार का दीवाना’।

 

५. अन्य भाषाओं में जादुई विस्तार

आशा जी केवल हिंदी तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने मराठी (भावगीत), बंगाली (रवींद्र संगीत), गुजराती, पंजाबी, तमिल, मलयालम और यहाँ तक कि अंग्रेजी और रूसी भाषाओं में भी अपनी आवाज़ का परचम लहराया। उनके मराठी गीत “मी रात टाकली” आज भी महाराष्ट्र के हर घर में गूंजते हैं।

 

६. पुरस्कार और सम्मान

दादा साहब फाल्के पुरस्कार (२०००): भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान।

पद्म विभूषण (२००८): भारत सरकार द्वारा दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: दो बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार (‘उमराव जान’ और ‘इजाज़त’ के लिए)।

फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट: अनेक फिल्मफेयर पुरस्कारों के बाद उन्हें इस सम्मान से नवाजा गया।

 

७. अंतिम विदाई (देहांत)

१२ अप्रैल, २०२६ को सुरों की यह देवी पंचतत्व में विलीन हो गई। उनके निधन की खबर ने न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों को शोक में डुबो दिया। १३ अप्रैल को राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंतिम विदाई हुई, जहाँ हर आँख नम थी और हर ज़ुबान पर उनके ही गीत थे।

 

विशेष टिप्पणी: ‘अजेय जीजीविषा’ की मिसाल

आशा जी के व्यक्तित्व की सबसे विशेष बात उनका ‘कभी न हार मानने वाला स्वभाव’ था। उन्होंने अपनी बड़ी बहन लता जी की छाया से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाई। जहाँ लोग दुखों में टूट जाते हैं, उन्होंने अपनी बेटी वर्षा और बेटे हेमंत के असमय निधन के गम को अपने भीतर समेटा और मंच पर हमेशा एक मुस्कुराता हुआ चेहरा लेकर आईं।

वे केवल एक गायिका नहीं थीं, वे एक कुशल रसोइया (Cook) भी थीं और उनका मानना था कि “भोजन और संगीत दोनों सीधे आत्मा को तृप्त करते हैं।”

“वो सुरीली यादें, वो हसीन तराने, हमेशा हमारे दरमियाँ रहेंगे।”

 

आलेख: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

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