“आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू… जो भी है, बस यही एक पल है।”
भारतीय संगीत की सबसे बहुमुखी आवाज़, अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति और करोड़ों दिलों की धड़कन आशा भोंसले जी आज (१२ अप्रैल, २०२६) सुरों के संसार को सूना कर अनंत यात्रा पर निकल पड़ी हैं। उनका जाना एक कंठ का मौन होना नहीं, बल्कि संगीत के उस अध्याय का समापन है जिसने हमें जीना सिखाया।
१. दुखों के झंझावात और मुस्कुराहट का मुखौटा
“पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ…”
एक दौर था जब दुखों को सार्वजनिक करना वर्जित माना जाता था। आशा जी ने इस गरिमा को जिया। उनके जीवन में दुखों का पहाड़ टूटा—चाहे वह वैवाहिक जीवन की प्रताड़ना हो या अपनी संतान को खोने का असहनीय गम। साल २०१२ में बेटी वर्षा और २०१५ में बेटे हेमंत के बिछड़ने ने उन्हें भीतर से छलनी कर दिया था। लेकिन उन्होंने अपनी सिसकियों को कभी माइक तक नहीं पहुँचने दिया। उनकी खिलखिलाहट के पीछे छिपे इन जख्मों को दुनिया कभी पढ़ ही नहीं पाई।
२. भोजपुरी माटी से गहरा नाता
“अब छोड़ दे नचनिया के चाल, सैयां जी भइले कोतवाल…”
आशा जी ने केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि लोकभाषाओं को भी अपनी आवाज़ से अमर कर दिया। भोजपुरी संगीत में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। ‘सैयां जी भइले कोतवाल’ या ‘काहे के बनल बाड़ू’ जैसे गीतों में उन्होंने जो सोंधी खुशबू बिखेरी, उसने साबित किया कि एक कलाकार के लिए भाषा कोई सीमा नहीं होती। उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों को एक नई ऊंचाई और गरिमा प्रदान की।
३. बहुमुखी प्रतिभा: हर मिज़ाज की आवाज़
“इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं…”
जहाँ एक तरफ उन्होंने ‘उमराव जान’ में गज़लों की नज़ाकत पेश की, वहीं दूसरी तरफ “दम मारो दम” जैसे गीतों से आधुनिक संगीत में क्रांति ला दी। शास्त्रीय संगीत की समझ हो या कैबरे की चपलता, आशा जी ने हर साँचे में खुद को ढाला। उनकी आवाज़ में वह जादू था जो बुढ़ापे को जवानी और उदासी को उत्सव में बदल देता था।
४. संघर्ष से अर्श तक की मल्लिका
“रात अकेली है, बुझ गए दिए…”
दीदी (लता मंगेशकर) की छत्रछाया और संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने की चुनौती—आशा जी ने इसे एक योद्धा की तरह स्वीकार किया। उन्होंने न केवल अपनी जगह बनाई, बल्कि यह भी दिखाया कि एक औरत अपनी शर्तों पर, अपने संघर्षों को सीढ़ी बनाकर कैसे आकाश चूम सकती है। उनका पूरा जीवन हम सबके लिए एक सबक है कि हार मान लेना कोई विकल्प नहीं है।
५. एक शून्य जो कभी नहीं भरेगा
“अभी न जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं…”
आज (१२ अप्रैल, २०२६ को आशा जी का देहांत हुआ) भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हमारे दिल के उस कोने में जहाँ साँसें चलती हैं और प्रेम धड़कता है, वहाँ आशा जी हमेशा ज़िंदा रहेंगी। उनके गीत हमें याद दिलाते रहेंगे कि चाहे जीवन में कितनी ही ‘धुंध’ क्यों न हो, संगीत की लौ कभी बुझनी नहीं चाहिए।
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
१३ अप्रैल, २०२६