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आजादी का निर्मोही खेल

​— विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​हर बार क्यों वो आजादी की बात करते हैं,

बस पाए हुए का क्यों वो हिसाब करते हैं।

जिसने देखा था कुछ और ही सपना,

उस हसरत को क्यों यूं ही बर्बाद करते हैं।।

 

​हर साल आज के दिन टीस सी उठती है,

कभी तो चीख, कभी आह भी निकलती है।

बहाए थे खून उसने जिसके लिए,

अधूरे सपने को क्यों हम सरताज कहते हैं।।

 

​खेला गया था एक दिन

आजादी का निर्मोही खेल,

भरा गया था, काटकर उस दिन

आजादी के परवानों से रेल।।

 

​खेली गई थी, जब अस्मिता से होली,

काटे गए थे गले, मारी गई थी गोली।

खुशियां उस कलंक की तुम आज मनाते हो,

टुकड़े किए देश की आजादी क्यों मनाते हो।।

 

​किसी ने चाहा भी नहीं था, कभी

किसी ने मांगा भी नहीं था, कभी

बिखर गए थे, जिनके चहचहाते घोंसले

आज वो भारत और पाकिस्तान में रहते हैं।।

 

​अभी तो सिर्फ आधी आजादी पाई है,

अभी तो उन टुकड़ों को भी मिलाना है।

परवानों ने, जो देखा था सपना,

हम उस आजादी की बात करते हैं।।

 

 

आधी अधूरी आजादी

 

 

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