पूर्णावतार श्रीकृष्ण: १६ कलाओं और ६४ विद्याओं का ब्रह्मांडीय विमर्श
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भूमिका: अवतारवाद और मानव सभ्यता का नवजीवन
सनातन संस्कृति में अवतारवाद केवल एक धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन और विकासवादी चेतना का जीवंत सिद्धांत है। जब-जब इस धरा पर अधर्म, अनाचार और आसुरी प्रवृत्तियों के कारण संकट गहराता है, तब-तब परम पुरुष भगवान श्रीहरि विष्णु मानव सभ्यता को एक नया जीवन प्रदान करने और चेतना का अभ्युत्थान करने के लिए देह धारण करते हैं।
धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस पृथ्वी पर कुल २४ अवतार लिए हैं, जिनमें से कई अवतार उन्होंने विकासात्मक क्रम के अनुसार मानव शरीर से इतर अन्य प्राणियों के रूप में भी लिए (जैसे मत्स्य, कूर्म और वराह)। इन २४ अवतारों में से २३ अवतार अब तक धरा पर अवतरित हो चुके हैं, जबकि चौबीसवां अवतार कलयुग के अंत में ‘कल्कि अवतार’ के रूप में होना शेष है।
दशावतार: चेतना के दस सोपान
इन चौबीस अवतारों में से दस को मुख्य अवतार या ‘दशावतार’ माना जाता है, जो मानव चेतना के क्रमिक विकास को भी दर्शाते हैं:
१. मत्स्य, २. कूर्म, ३. वराह, ४. नृसिंह, ५. वामन, ६. परशुराम, ७. राम, ८. कृष्ण, ९. बुद्ध और १०. कल्कि।
इन समस्त रूपों में से दो अवतार—त्रेतायुग के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और द्वापरयुग के लीलाधर श्रीकृष्ण—भारतीय जनमानस के मन-मस्तिष्क और अंतःकरण पर ईश्वर के पूर्ण स्वरूप में स्थापित हैं। यही कारण है कि युगों-युगों से संपूर्ण राष्ट्र इन दोनों रूपों में ईश्वर की साक्षात् पूजा और आराधना करता आ रहा है।
सूर्यवंश और चंद्रवंश: कलाओं का तात्विक भेद
यद्यपि श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों एक ही परम तत्त्व के रूप हैं, तथापि तात्कालिक युग की आवश्यकताओं और धर्मशास्त्रों की कसौटी पर तुलना की जाए, तो कृष्णावतार में रामावतार से अधिक कलाओं का प्रकटीकरण दिखाई देता है।
भगवान श्रीराम बारह कलाओं के साथ सूर्यवंश में अवतरित हुए थे। सूर्यवंश, भगवान सूर्य के तेज और मर्यादा का प्रतीक है। ज्योतिष और खगोल विज्ञान के अनुसार, सूर्य की बारह कलाएं (संक्रांतियां या राशियां) होती हैं; अतः श्रीराम सूर्य की संपूर्ण बारह कलाओं के साथ अवतरित होकर मर्यादा के सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित हुए।
इसके विपरीत, भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण चंद्रवंश में हुआ था। खगोलीय चक्र में चंद्रदेव आकाश को सोलह कलाओं (प्रतिपदा से पूर्णिमा तक) में विभाजित करते हैं। चंद्रमा शीतलता, सम्मोहन, रस और संपूर्णता का प्रतीक है; इसीलिए लीलाधर श्रीकृष्ण संपूर्ण सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर ‘पूर्णावतार’ कहलाए।
ब्रह्मांडीय चेतना का प्रकटीकरण: सोलह कलाएं
ईश्वरीय कलाओं का अर्थ है—वह क्षमता या शक्ति जिसके माध्यम से परमात्मा मानव रूप में अपनी असीम शक्तियों का प्रकटीकरण करते हैं। श्रीकृष्ण में ये सोलह कलाएं इस प्रकार परिलक्षित होती हैं:
१. श्रीधन (संपदा): भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि, जिससे जीवन में अभाव मिट जाए।
२. भू (अचल संपत्ति): पृथ्वी और प्रकृति पर आधिपत्य तथा चराचर जगत का स्वामित्व।
३. कीर्ति (यश-प्रसिद्धि): लोक-कल्याण के माध्यम से युगों-युगों तक फैला निष्कलंक यश।
४. इला (वाणी की सम्मोहकता): ऐसी वाणी, जिससे गीता जैसा कालजयी उपदेश प्रस्फुटित हो और जो शत्रु को भी सम्मोहित कर ले।
५. लीला (आनंद-उत्सव): जीवन के हर संघर्ष (जेल के जन्म से लेकर महाभारत के युद्ध तक) को एक उत्सव और क्रीड़ा बना देना।
६. कांति (सौंदर्य और आभा): वह अलौकिक दिव्य मुखमंडल, जिसे बार-बार निहारने के बाद भी तृप्ति न हो।
७. विद्या (मेधा-बुद्धि): श्रेष्ठ मेधा, जो परम सत्य और व्यावहारिक कूटनीति दोनों में सर्वोच्च हो।
८. विमला (पारदर्शिता): अंतःकरण की वह निष्छलता, जहाँ छल-कपट का लेश मात्र भी न हो; जो सभी के लिए एक समान सुलभ हों।
९. प्रेरणा: जनमानस की सुप्त चेतना को जाग्रत कर उन्हें सही मार्ग पर अग्रसर करने की शक्ति।
१०. ज्ञान (नीर-क्षीर विवेक): सत्य और असत्य का भेद करने वाला वह विवेक, जिससे उन्होंने बार-बार समाज को नई दिशा दी।
११. क्रिया (कर्मण्यता): कर्मयोग का वह सिद्धांत, जहाँ फल की इच्छा किए बिना निरंतर लोक-कल्याण हेतु सक्रिय रहना है।
१२. योग (चित्तलय): समस्त शक्तियों के स्वामी होने पर भी अनासक्त रहना; महायोगीश्वर रूप।
१३. प्रहवि (आत्यंतिक विनय): असीम शक्ति होने के बाद भी सुदामा के आगे सिर झुकाना और अग्रपूजा के समय ऋषियों के चरण धोना।
१४. सत्य (यथार्थ): धर्म की स्थापना के लिए शाश्वत सत्य के पक्ष में अडिग रहना।
१५. इसना (आधिपत्य): संपूर्ण सृष्टि पर अदृश्य और सार्वभौमिक संप्रभुता (Lordship)।
१६. अनुग्रह (कृपा): शरणागत पर अपनी असीम दया और कृपा बरसाकर उसका उद्धार करना।
परम मेधा का चमत्कार: ६४ दिनों में ६४ विद्याएँ
श्रीकृष्ण केवल आध्यात्मिक रूप से ही परिपूर्ण नहीं थे, बल्कि वे लौकिक और व्यावहारिक विधाओं के भी सिरमौर थे। अवंतिका नगरी (वर्तमान उज्जैन) में महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर उन्होंने मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार किया—उन्होंने मात्र ६४ दिनों में ६४ कलाओं और विद्याओं में पूर्ण निपुणता प्राप्त कर ली।
यह सूची अकादमिक, कलात्मक, सामरिक और वैज्ञानिक चेतना का अद्भुत कोलाज है:
कला, संगीत और अभिनय विधाएँ
१. गीत कला: गायन का संपूर्ण ज्ञान।
२. वाद्य कला: विविध वाद्ययंत्रों को बजाने की निपुणता।
३. नृत्यकला: आंगिक अभिनय और नृत्य का कौशल।
४. नाट्यकला: रंगमंच और अभिनय शास्त्र।
५. आलेख्य: चित्रकला और रेखाचित्र रचना।
६. विशेष कच्छेद्य: नाना प्रकार के तिलक, मांगलिक चिह्न और श्रृंगार रचना।
७. तण्डुल-कुसुमावलि विकार: अक्षत (चावल) और पुष्पों से देव-पूजन की वेदी व अल्पना बनाना।
८. पुष्पास्तरण: पुष्पों के माध्यम से सुरुचिपूर्ण शय्या और मंच तैयार करना।
९. दशन-वसनांगराग: दाँतों, वस्त्रों और अंगों को प्राकृतिक रंगों से सुसज्जित करना।
१०. मणिभूमिका कर्म: फर्श या वेदी को बहुमूल्य मणियों व रत्नों से जड़ना।
११. शयन-रचन: पलंग, आसन और बैठने-सोने के स्थानों का कलात्मक निर्माण।
१२. उदक-वाद्य: जलतरंग (कांच या मिट्टी के बर्तनों में जल भरकर संगीत निकालना) बजाना।
१३. उदक-घात: जल को स्तंभित करने या जल की धाराओं को नियंत्रित करने की विद्या।
श्रृंगार, भेषज और विलास कलाएँ
१४. चित्रयोग: विविध जड़ी-बूटियों और रसायनों से विस्मयकारी प्रदर्शन करना।
१५. माल्यग्रंथ विकल्प: पुष्पों की विविध प्रकार की मालाएँ और मुकुट गूँथना।
१६. नेपथ्ययोग: प्रसंगानुकूल वेशभूषा धारण करने और उसे सजाने की कला।
१७. शेखरापीड योजन: केश-सज्जा करना और बालों में पुष्पों को पिरोना।
१८. कर्णपत्र भंग: कानों के आभूषणों की सुंदर रचना व चंदन-कस्तूरी से सुगंधित इत्र (गंधयुक्ति) तैयार करना।
१९. भूषण योजना: रत्नों और धातुओं से आभूषण बनाना तथा उन्हें सही ढंग से पहनाना।
२०. इंद्रजाल: नजरबंदी या जादूगरी की कला।
२१. कौचुमार योग: रूप-परिवर्तन की विद्या; कुरूप को सुंदर या बहरूपिया बनने की कला।
२२. हस्तलाघव: हाथ की सफाई और क्षिप्रता से वस्तुओं को गायब या परिवर्तित करना।
पाककला, शिल्प और विलासिता
२३. चित्रशाकापूप-भक्ष्यविकार क्रिया: नाना प्रकार के शाक, पकवान, मिष्ठान और छप्पन भोग बनाने की पाककला।
२४. पानीय रस-रागासव योजन: विविध प्रकार के पेय पदार्थ, शर्बत और रसों का निर्माण व उन्हें स्वादिष्ट बनाना।
२५. सूचीवान कर्म: वस्त्रों की सिलाई, रफू और महीन कढ़ाई (कसीदाकारी) की कला।
२६. सूत्र-क्रीड़ा (या वीणा-डमरू वाद्य): धागों की कठपुतली नचाना या तार वाले वाद्ययंत्रों का विशेष संचालन।
बौद्धिक, भाषाई और साहित्यिक कलाएँ
२७. प्रहेलिका: पहेलियाँ बूझना और गुप्त कूट-संदेशों का अर्थ जानना।
२८. प्रतिमाला: अंत्याक्षरी या श्लोक-प्रतिश्लोक की बौद्धिक प्रतियोगिता।
२९. दुर्वाचक योग: अत्यंत कठिन, क्लिष्ट और दुःसाध्य शब्दों का उच्चारण व रचना करना।
३०. पुस्तक-वाचन: ग्रंथों के पठन की कला, स्वर-आरोह-अवरोह का ज्ञान।
३१. नाटिकाख्यायिका दर्शन: नाटकों और आख्यानों (कहानियों) की समीक्षा व उनका लेखन।
३२. काव्य-समस्या पूरण: कविता के छूटे हुए पदों या अधूरी पंक्तियों को तार्किक रूप से पूरा करना।
३३. पट्टिका-वेत्र-बाण विकल्प: बेंत, पट्टियों और रस्सी से खाट, कुर्सी, आसन व धनुष-बाण का निर्माण।
३४. तर्क कर्म: सूत कातना, बटना और वस्त्र बुनने का आधारभूत ज्ञान।
३५. तक्षण: काष्ठ-शिल्प यानी बढ़ई का काम।
३६. वास्तुकला: गृह-निर्माण, नगर नियोजन और दुर्ग (किले) निर्माण का विज्ञान।
वैज्ञानिक, धातु और प्राकृतिक विज्ञान
३७. रूप्य-रत्न परीक्षा: सोने, चाँदी, हीरों और रत्नों की शुद्धता की परख करना।
३८. धातुवाद: धातुओं का शोधन, मिश्रण और किमियागरी (रसायन शास्त्र)।
३९. मणिराग ज्ञान: मणियों और हीरों को तराशना तथा उन्हें रँगना।
४०. आकर ज्ञान: खदानों (पत्थर, कोयला, सोना आदि) की पहचान और भूगर्भ विज्ञान।
४१. वृक्षायुवेर्द् योग: पौधों, वृक्षों की चिकित्सा और बागवानी का विज्ञान।
४२. मेष-कुक्कुट-लावक युद्धविधि: बटेर, मुर्गों और मेढ़ों की युद्ध-प्रणाली और उनके मनोविज्ञान का ज्ञान।
४३. शुकसारिका प्रलापन: तोता-मैना जैसे पक्षियों को बोलना सिखाना और उनकी भाषा समझना।
४४. उत्सादन: अंग-मर्दन (मालिश) और उबटन आदि बनाने का कौशल्यात्मक ज्ञान।
४५. केशमार्जन कौशल: केश-कर्तन (बाल काटना) और वेणी गूँथने की कला।
गुप्त, कूटनीतिक और सामरिक विधाएँ
४६. अक्षर-मुष्टिका कथन: गुप्त लिपि, मुट्ठी में बंद वस्तु या सामने वाले के मन के अदृष्ट अक्षरों को जान लेना।
४७. म्लेच्छित काव्य-विकल्प: विदेशी या कूट भाषाओं (जैसे उस समय की अनार्य भाषाएँ) को समझने और लिखने की कला।
४8. देश-भाषा ज्ञान: विविध प्रान्तों और देशों की स्थानीय बोलियों का ज्ञान।
४९. पुष्प-शकटिका (या निमित्त ज्ञान): शकुन-अपशकुन, प्रकृति के संकेतों (वायु, वर्षा) से भविष्य का सटीक अनुमान लगाना।
५०. यंत्र-मातृका: यंत्रों, रक्षा-कवचों और तांत्रिक रेखाचित्रों का निर्माण व धारण विज्ञान।
५१. संपाठ्य (धारण मातृका): एक बार सुनकर कंठस्थ कर लेने की अद्भुत स्मरण शक्ति (श्रुतिधर होना)।
५२. मानसी काव्य क्रिया: किसी के मन की भावना को जानकर तत्काल कविता रच देना।
५३. क्रिया-विकल्प: किसी एक ही कार्य को अनेक युक्तियों और कूटनीतिक मार्गों से सिद्ध करने की कला।
५४. छलितक योग: शत्रु को भ्रमित करने या छद्म रूप धारण करने की कला (मायावी विद्या)।
५५. अभिधान कोष: विपुल शब्दकोश और व्याकरण का संपूर्ण ज्ञान।
५६. छंदोज्ञान: वैदिक और लौकिक छंदों के पिंगल शास्त्र का ज्ञान।
५७. वस्त्र-गोपन: साधारण वस्त्र को भी अपनी कला से अत्यंत बहुमूल्य या रेशमी जैसा प्रदर्शित करना।
५८. द्यूत विशेष: पाँसा फेंकने की कला और चौपड़ की विधा।
५९. आकर्ष क्रीड़ा: आकर्षण शक्ति (Magnetism या समाधि बल) से दूर स्थित वस्तुओं को पास खींचना।
६०. बालक्रीडनक: बच्चों के मनोरंजन के लिए मिट्टी, लकड़ी के कलात्मक खिलौने बनाना।
६१. वैनायिकी: शिष्टाचार, नीति, विनय और शासन-प्रशासन चलाने की विद्या।
६२. वैजयिकी: युद्ध कला, अस्त्र-शस्त्र संचालन और व्यूह रचना (जैसे चक्रव्यूह) का अभेद्य ज्ञान।
६३. व्यायामिकी: शरीर को सुदृढ़ रखने के लिए मल्लविद्या, आसन और व्यायाम का विज्ञान।
६४. वैतालिकी: तंत्र-मंत्र, वैताल साधना और परा-शक्तियों (Metaphysical energies) को नियंत्रित करने की विद्या।
निष्कर्ष: कृष्णत्व ही जीवन का पूर्णत्व है
श्रीकृष्ण केवल एक धार्मिक विग्रह नहीं, बल्कि ‘पूर्णता के विज्ञान’ हैं। उनकी १६ कलाएं जहाँ अध्यात्म और चेतना के उच्चतम शिखर को छूती हैं, वहीं उनकी ६४ विद्याएं जीवन के भौतिक, कलात्मक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों के प्रति उनकी पूर्ण दक्षता को रेखांकित करती हैं। श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि संसार से भागकर नहीं, बल्कि संसार की समस्त विधाओं में निपुण होकर ही जीवन को ‘पूर्णत्व’ दिया जा सकता है।
जय श्रीकृष्ण!