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सवाल खड़ा सामने, बनकर कठिन सवाल,

‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच, फंसा हुआ है हाल।

‘हाँ’ कहूँ तो ज़िम्मेदारी, एक नया आगाज़ है,

‘ना’ कहूँ तो डर सा, कि टूटता विश्वास है।

 

ज़ुबान तक आ के रुक गया, मौन गहरा है,

इरादों की दहलीज़ पर, दुविधा का पहरा है।

सहमति में सुकून, या इनकार में चैन है?

कशमकश भरी रात में, जागते ये नैन हैं।

 

हाँ बदल दे रास्ता, ना बचा ले ख़ुद को,

किसे चुनूँ यहाँ, कैसे समझाऊँ ख़ुद को?

शब्द नहीं केवल, ये जीवन का आधार हैं,

किसी की मंज़िल, तो किसी की हार हैं।

 

कब तक इस भँवर में, यूँ ही झुला करेंगे,

सच्चाई के आईने से, कब तक डरा करेंगे?

मशविरा ये, कि जो भी हो चुन लीजिये,

मझधार से बेहतर, साहिल चुन लीजिये।

 

“क्या आप वर्तमान में किसी ऐसे ही ‘हाँ’ या ‘ना’ के चौराहे पर खड़े हैं? कभी-कभी निर्णय न लेना, गलत निर्णय लेने से भी अधिक भारी पड़ता है।”

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