किताबों की सूखी हुई वो महक याद है,
बिना बात के ही खिलखिलाना याद है।
कंधे पर बस्ता खुशियों का पिटारा था,
गलियों में सिमटा हमारा जग सारा था।
कागज़ की कश्ती समंदर पार कराती थी,
दादी की लोरी हर रात सुलाती थी।
खिलौनों में भी तब जान हुआ करती थी,
इंसानियत असली पहचान हुआ करती थी।
न हाथ में फोन, न रिश्तों में दिखावा,
नीम की छाँव में दादा का बुलावा।
नमक रोटी में भी स्वाद पूरा था,
कंचे की जीत पर मन खिलता था।
चिट्ठियों के इंतज़ार में दिन गुज़र जाते,
साल भर न मिलते, वो त्योहारों में आते।
साइकिल की सवारी, घुटनों की खरोंच,
सादा थी ज़िंदगी, ऊँची थी सोच।
धुंधली पड़ गई अब बचपन की गलियां,
मुरझा गई हैं आज यादों की कलियां।
आज भी हवा का झोंका पन्ने पलटता है,
बचपन का भोलापन आंखों में खटकता है।
स्याही अब फीकी पड़ चुकी है शायद,
मगर यादों की गूँज अब भी बड़ी बुलंद है।
शोर-शराबा तो बस एक मुखौटा है,
सुकून तो आज भी ‘अतीत’ में बंद है।
“बचपन की वो कौन सी बात है जिसे आप आज की आधुनिक सुख-सुविधाओं के बदले भी वापस पाना चाहेंगे? कमेंट्स में अपनी यादें साझा करें।”