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सिग्नल की चार लकीरें, जब मरघट सी सो जाती हैं,

जुड़ी हुई ये सारी दुनिया, पल में तन्हा हो जाती है।

स्मार्ट घरों की दीवारें तब, बस ईंट-गारा लगती हैं,

एलेक्सा की वो मीठी बातें, तब ख़ामोश ही रहती हैं।

 

जहाँ गूगल मैप के बिना, राही रस्ता भूल जाता है,

बिना ‘लाइक’ के चेहरा अपना, सबको धुला नज़र आता है।

सुरक्षा के वो तीखे कैमरे, बस पत्थर की आँखें हैं,

आधुनिकता की उड़ान वाली, कतर दी गई पाँखें हैं।

 

सन्नाटा ऐसा पसरा है, जैसे रूहें काँप रही हों,

अँधेरे में वो स्मार्ट लाइटें, बस रास्ता नाप रही हों।

न कोई रील, न कोई चैट, न ख़बरों का वो शोर रहा,

इंसान अपनी ही परछाईं से, जैसे अब तो बोर रहा।

 

पर शायद इस रेगिस्तान में, एक फूल उम्मीद का खिल जाए,

मोबाइल छोड़कर एक इंसान, दूजे इंसान से मिल जाए।

तकनीक का दामन छूटे तो, रूह का संगीत सुनाई दे,

वाई-फ़ाई के इस सन्नाटे में, अपनों का चेहरा दिखाई दे।

 

पर सच तो ये है कि हम सब, इस जाल के ही आदी हैं,

बिना नेटवर्क के जीवन में, लगती बस बर्बादी है।

एक ‘बफरिंग’ के पहिये में, थमा हुआ सा जहान है,

वाई-फ़ाई का ये रेगिस्तान, डिजिटल युग का श्मशान है।

“क्या आप २४ घंटे बिना वाई-फाई और डेटा के रहने की कल्पना कर सकते हैं? क्या हम वाकई तकनीक के बिना ‘अपूर्ण’ हो गए हैं? अपने विचार साझा करें।”

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