भीड़ भरी दुनिया में, मैं तन्हा सा रहता हूँ,
खामोशी की चादर ओढ़े, मन में कुछ कहता हूँ।
आँखों में सूखे सावन, होठों पर मुस्कान सजी,
अंदर एक सन्नाटा है, बाहर शहनाई बजी।
तलाश आज़ादी की, पर बेड़ियां मुझे प्यारी हैं,
जीत की हसरत रखता हूँ, पर हार भी स्वीकारी हैं
उजालों की सोहबत में भी, साये ढूँढता फिरता हूँ,
हवाओं के संग उड़ता हूँ, पर ज़मीं पे ही गिरता हूँ।
मंज़िल की है चाह बहुत, पर रास्तों से मोह बड़ा,
अकेला चलने का दम है, पर पीछे है हुजूम खड़ा।
ज्ञान का सागर पास मेरे, पर अज्ञान का प्यासा हूँ,
मैं सुलझा हुआ सच, या उलझी सी जिज्ञासा हूँ?
सब कुछ पाकर लगता, जैसे कुछ भी पास नहीं,
साँसें तो चल रही मगर, जीने का एहसास नहीं।
झूठ के ऊँचे महलों में, मैं सच्ची बुनियादें ढूँढूँ,
तपती धूप के सहरा में, मैं सावन की बूंदें ढूँढूँ।
रिश्तों की मखमली पकड़, चुभने लगती है,
पास जो आए कोई तो, दूरी बढ़ने लगती है।
कल को बेहतर करने में, आज को मैं खो देता हूँ,
हँसते-हँसते दुनिया के संग, एकांत में रो देता हूँ।
मैं अंत हूँ कल का, या आने वाली शुरुआत हूँ,
एक साफ़ सुनहरी सुबह, या काली घनी रात हूँ।
विरोधाभास के धागों से, बुना हुआ मेरा जीवन है,
खुद ही अपनी उलझन, खुद ही अपना दर्पन हूँ।