।। अवधपुरी का प्रकाश ।।
भय प्रगट कृपाला,
दीनदयाला, कौसल्या हितकारी,
बक्सर की इस पावन रज पर,
छटा अलौकिक न्यारी।
रामरेखा के तट पर गूँजे,
फिर वही विजय गान,
नवमी की पावन बेला में,
जागे हिंदू स्वाभिमान।
जनकपुर की राह चली थी,
जहाँ चरण की धूल,
ताड़का का मान मर्दन,
खिले अहिल्या फूल।
वही धनुष, वही प्रत्यंचा,
वही राम का बाण,
सत्य और मर्यादा का,
फिर से हो निर्माण।
कण-कण में व्यापे हैं राघव,
घट-घट में विश्राम,
अधर्म के तिमिर को हर ले,
एक ‘राम’ का नाम।
रघुकुल की रीत निभाएँ हम,
धर्म ध्वजा फहराएँ,
घर-घर में हम दीप जलाकर,
अवधपुरी सजाएँ।
साहित्य की सरिता में बहे,
शील-शक्ति का सार,
रामनवमी की मंगल बेला,
महके सारा संसार।
त्याग और संकल्प का,
हम सब लें संज्ञान,
राम ही हैं भारत की आत्मा,
राम ही हिंदुस्तान।
जय श्री राम!