वंदे मातरम! वंदे मातरम!
यही मंत्र है, यही तंत्र है, मुक्ति का उल्लास,
अपनी माटी, अपनी मेहनत, अपना ही विश्वास।
जब हाथों में हुनर जगा, और चाक ने ली अंगड़ाई,
तब कंचन बनकर उभरी है, भारत की ये परछाईं।
विदेशी चकाचौंध को तजकर, स्वावलंबन को अपनाएँ,
खादी के हर धागे में हम, आत्मनिर्भरता गाएँ।
वंदे मातरम! वंदे मातरम!
गाँव-गाँव के कुटीर अब, स्वाभिमान से बोलें,
अपनी कला और संस्कृति की, सुंदर गाँठें खोलें।
नहीं चाहिए उधार की रोशनी, हम अपना सूरज खुद हैं,
स्वदेशी की इस पावन धारा में, अंतर्मन अब शुद्ध है।
मिट्टी के उस छोटे दीपक में, गौरव का प्रकाश भरें,
अपने देश की थाती से ही, हम जग का उद्धार करें।
संकल्प हमारा अटल रहे, हर घर स्वदेशी गूँजे,
भारत माता के चरणों में, नित नए समर्पण पूँजे।
वंदे मातरम! वंदे मातरम!