चैप्लिन सिनेमा: भारतीय सिनेमा के उदय की पहली गवाह, जो अब केवल यादों में है
कोलकाता की सड़कों पर जहाँ आज आधुनिकता का शोर है, वहीं एक समय भारतीय सिनेमा की पहली धड़कन सुनाई दी थी। हम बात कर रहे हैं चैप्लिन सिनेमा (Chaplin Cinema) की, जो न केवल कोलकाता का बल्कि भारत का पहला सिंगल-स्क्रीन सिनेमा हॉल था। आज वह इमारत वजूद में नहीं है, लेकिन इतिहास के पन्नों में उसका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
स्थापना और एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस का उदय
इस ऐतिहासिक सिनेमा हॉल की नींव 1907 में पारसी कारोबारी और भारतीय सिनेमा के अग्रदूत जमशेदजी फ्रामजी मदान (J.F. Madan) ने रखी थी। उस समय इसे ‘एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस’ (Elphinstone Picture Palace) के नाम से जाना जाता था। यह वह दौर था जब फिल्में अभी बोलना भी नहीं सीखी थीं। मूक फिल्मों के उस युग में यह भारत का पहला स्थायी मूवी थिएटर बना, जहाँ लोग पहली बार एक छत के नीचे जादुई परदे पर चलती-फिरती तस्वीरों को देखने जमा हुए थे।
महानायक उत्तम कुमार से अनूठा संबंध
चैप्लिन सिनेमा का इतिहास केवल फिल्मों से नहीं, बल्कि सिनेमा के महानायकों के व्यक्तिगत जीवन से भी जुड़ा है। बंगाली सिनेमा के महान अभिनेता उत्तम कुमार के पिता इसी सिनेमा हॉल में प्रोजेक्टर ऑपरेटर का काम किया करते थे। यह सोचना भी सुखद लगता है कि जिस परदे पर बाद में उत्तम कुमार ने राज किया, उसी के प्रकाश की लौ कभी उनके पिता ने जलाई थी।
‘एल्फिंस्टन’ से ‘चैप्लिन’ बनने तक का सफर
समय के साथ इसका नाम ‘मिनर्वा’ (Minerva) पड़ा। लेकिन 1980 के दशक में कोलकाता नगर निगम (KMC) ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। विश्व के महानतम हास्य कलाकार चार्ली चैप्लिन के 100वें जन्मदिन के अवसर पर इस हॉल का नाम बदलकर ‘चैप्लिन सिनेमा’ कर दिया गया। यह वैश्विक स्तर पर एक कलाकार को दिया गया एक अद्भुत सम्मान था।
पतन और विस्मृति का दौर
बदलते दौर में मल्टीप्लेक्स के आगमन और सिंगल-स्क्रीन की घटती लोकप्रियता ने इस ऐतिहासिक धरोहर को हाशिए पर धकेल दिया। दर्शकों की कमी और रखरखाव के अभाव में 2013 में इसे आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया। अंततः प्रशासन द्वारा इसे ध्वस्त कर दिया गया, जिससे सिनेमा प्रेमियों के एक युग का अंत हो गया।
आज की स्थिति: विरासत का क्या बचा?
वर्तमान में उस स्थान पर कोलकाता नगर निगम का एक नागरिक केंद्र ‘चैप्लिन भवन’ (Chaplin Bhawan) खड़ा है। वह भव्य पर्दा और कुर्सियां तो नहीं रहीं, लेकिन ‘चैप्लिन स्क्वायर’ का नाम आज भी वहां आने-जाने वालों को याद दिलाता है कि यहाँ कभी भारत के सिनेमाई स्वप्न ने पहली बार आँखें खोली थीं।
निष्कर्ष:
चैप्लिन सिनेमा का ढहना केवल एक इमारत का गिरना नहीं था, बल्कि कोलकाता की उस सांस्कृतिक विरासत का खोना था जिसने भारतीय सिनेमा को शैशवावस्था से युवा होते देखा था। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि ‘विकास’ की दौड़ में हम अक्सर अपनी ‘विरासत’ के चिराग बुझा देते हैं।