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सात समंदर पार गूँजती,

मॉरीशस से सूरीनाम तक,

भोजपुरी की गंध महकती,

सुबह से लेकर शाम तक।

 

कबीर की साखी, बिदेसिया की तान,

जहाँ भी गए साथ गई,

माटी की यह सोंधी खुशबू,

हर प्रवासी के हाथ गई।

 

करोड़ों कंठों की भाषा यह,

पर अपने ही देश में मौन है,

आठवीं अनुसूची के पन्नों पर,

पूछता ‘मेरा स्थान कौन है?’

 

जिसकी बोली में शहद घुला,

जिसमें बसते संस्कार हैं,

आज वही अपने गौरव हेतु,

खड़ी किए गुहार है।

 

यह केवल बोली नहीं,

यह तो एक संस्कृति की जान है,

छठ के गीत, सोहर और कजरी,

हम सबकी पहचान है।

 

भिखारी ठाकुर का स्वप्न यह,

महेंद्र मिसिर का सार है,

अब तो जागो ऐ सत्ताओं,

यह जन-जन का अधिकार है।

 

विश्व पटल पर चमक रही,

फिजी से लेकर नेपाल तक,

किंतु घर में हक माँग रही है,

बीते कई साल तक।

 

संविधान की गरिमा का,

यह सम्मान अभी तो बाकी है,

आठवीं अनुसूची के माथे पर,

वरदान अभी तो बाकी है।

 

रुकेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं,

यह प्राणों का आह्वान है,

भोजपुरी को हक दिलाना ही,

अब हम सबका अभियान है!

 

 

 

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