यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक विषय है। भोजपुरी न केवल उत्तर भारत के एक विशाल क्षेत्र की भाषा है, बल्कि यह मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और गयाना जैसे देशों में भी अपनी गहरी जड़ें जमा चुकी है।
भोजपुरी भाषा की संवैधानिक मान्यता : वैश्विक विमर्श
भूमिका….
भोजपुरी मात्र एक बोली नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति और वैश्विक पहचान है। विश्व स्तर पर लगभग 25 से 30 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली यह भाषा आज अपने अस्तित्व और अस्मिता की लड़ाई लड़ रही है। भारत में इसे ‘आठवीं अनुसूची’ में शामिल करने की मांग दशकों पुरानी है, लेकिन वैश्विक पटल पर इसकी गूँज ने इस विमर्श को एक नया आयाम दिया है।
1. संवैधानिक स्थिति और वर्तमान संघर्ष
भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएं शामिल हैं। भोजपुरी को इसमें शामिल करने के लिए कई दशकों से आंदोलन चल रहे हैं।
तर्क: भाषाई विशेषज्ञों का मानना है कि भोजपुरी का अपना समृद्ध साहित्य, व्याकरण और शब्दकोश है।
अवरोध: अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि भोजपुरी को मान्यता देने से हिंदी की शक्ति कम हो सकती है, जबकि वास्तविकता यह है कि भोजपुरी हिंदी की सहायक और पूरक रही है।
2. वैश्विक परिप्रेक्ष्य: ‘गिरमिटिया’ देशों में सम्मान
भारत में जहाँ भोजपुरी संवैधानिक मान्यता की प्रतीक्षा कर रही है, वहीं सात समंदर पार कई देशों में इसे राजकीय सम्मान प्राप्त है:
मॉरीशस: यहाँ भोजपुरी को न केवल संरक्षण प्राप्त है, बल्कि ‘भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन’ जैसे संस्थान सरकारी तौर पर कार्य कर रहे हैं।
फिजी और सूरीनाम: इन देशों में भोजपुरी (हिंदुस्तानी) को भाषाई विविधता के ढांचे में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
यूनेस्को (UNESCO): यूनेस्को ने ‘भोजपुरी गीतों’ (विशेषकर जंतसार और सोहर) को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कर इसे वैश्विक गौरव प्रदान किया है।
3. आर्थिक और सांस्कृतिक पक्ष
वैश्विक विमर्श में भोजपुरी का ‘सॉफ्ट पावर’ अत्यंत प्रभावशाली है।
भोजपुरी सिनेमा और संगीत: दुनिया के हर कोने में भोजपुरी संगीत की पहुँच है, जिससे एक विशाल बाजार तैयार हुआ है।
प्रवासन (Migration): मॉरीशस से लेकर खाड़ी देशों और अमेरिका-कनाडा तक फैला ‘भोजपुरी डायस्पोरा’ इस भाषा को वैश्विक संपर्क भाषा (Link Language) के रूप में स्थापित कर चुका है।
4. संवैधानिक मान्यता की आवश्यकता क्यों?
संवैधानिक मान्यता केवल एक तकनीकी दर्जा नहीं है, इसके कई व्यावहारिक लाभ हैं:
शिक्षा में स्थान: प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने की नई शिक्षा नीति (NEP) का लाभ बच्चों को मिलेगा।
रोजगार: प्रशासनिक सेवाओं (UPSC/BPSC) में वैकल्पिक विषय के रूप में मजबूती मिलेगी।
सांस्कृतिक संरक्षण: भाषा के संरक्षण के लिए सरकारी बजट और अकादमियों का गठन होगा।
निष्कर्ष
भोजपुरी का वैश्विक विमर्श यह स्पष्ट करता है कि यह भाषा सीमाओं को लांघ चुकी है। जब मॉरीशस जैसा छोटा देश अपनी जड़ों को बचाने के लिए भोजपुरी को राजकीय सम्मान दे सकता है, तो भारत में इसकी उपेक्षा तर्कसंगत नहीं लगती। भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करना न केवल करोड़ों लोगों की भावनाओं का सम्मान होगा, बल्कि यह भारत की भाषाई विविधता को और अधिक समृद्ध करेगा।
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