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कहीं शहद सी घुलती मिश्री,

कहीं वीरता की हुंकार है,

मेरे बिहार की बोलियों में,

सदियों के संस्कार हैं।

 

मैथिली की कोमल थापें,

विद्यापति का गान है,

मिथिलांचल की पाग-मखान,

इसमें बसती जान है।

 

“कखयब अओब हे कन्हैया”

की झंकार जहाँ मिल जाती है,

लगता है माँ जानकी खुद,

लोरी हमें सुनाती है।

 

पश्चिम से जब चले भोजपुरी,

माटी सोनल हो जाए,

भिखारी ठाकुर के गीतों में,

मन जोगी सा खो जाए।

 

“का हाल बा?” की उस पुकार में,

अपनापन का भाव है,

गँगा-जमुना सी बहती इसमें,

मस्ती भरा स्वभाव है।

 

मगध खंड की मगही बोले,

चाणक्य की नीति सी,

स्पष्ट धार है शब्दों में,

पर मन में भरी प्रीति सी।

 

“का हाल हई हो?” पूछ के जो,

मन का बोझ हटाती है,

गया-नालंदा की थाती यह,

गौरव गाथा गाती है।

 

अंगिका के सुर मंडल में,

कर्ण का दान झलकता है,

भागलपुर के रेशम सा,

हर शब्द यहाँ चमकता है।

 

वज्जिका की बोली में भी,

वैशाली का मान खड़ा,

लोकतंत्र की पहली जननी,

इसका इतिहास बड़ा।

 

ये बोलियाँ नहीं बस भाषा,

ये पुरखों का आशीर्वाद हैं,

छठ मैया के गीतों का,

इनमें ही छिपा प्रसाद है।

 

भले पढ़ लें हम सात समंदर,

पार की ऊँची बोलियाँ,

पर मन भरता जब घर आकर,

खेलें इन्हीं में टोलियाँ।

 

धन्यवाद

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