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ताजमहल का ऐतिहासिक सच (भाग-५/अंतिम): गुंबद का त्रिशूल, ‘द ताज स्टोरी’ फिल्म का सच और विवाद का कानूनी भविष्य

(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का पाँचवाँ और अंतिम भाग है। पिछले भागों में हमने अदालती मुकदमों, ‘बादशाहनामा’ के पन्नों और बंद २२ कमरों का सिलसिलेवार विश्लेषण किया था। इस अंतिम भाग में हम स्थापत्य के प्रतीकों, इस विवाद पर बनी हालिया फिल्म, अदालतों में पेश की गई किताबों के सबूत और इस महा-विवाद के तार्किक निष्कर्ष की ओर बढ़ेंगे।)
ताजमहल के बंद तहखानों से बाहर निकलकर जब हम इसके विशाल और भव्य मुख्य गुंबद (Main Dome) की ओर नजर उठाते हैं, तो स्थापत्य कला का एक और अनसुलझा विरोधाभास सामने आता है। हिंदू पक्षकारों और पारंपरिक वास्तुकारों का दावा है कि ताजमहल की बाहरी रूपरेखा और इसके शीर्ष पर चमकने वाला कलश शुद्ध रूप से सनातन मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture) के सिद्धांतों पर आधारित है।

१. मुख्य गुंबद पर स्थित कलश और त्रिशूल का रहस्य

ताजमहल के सबसे ऊपरी हिस्से पर एक विशाल धात्विक कलश (Finial) स्थापित है। १९वीं सदी की शुरुआत तक यह कलश शुद्ध सोने का हुआ करता था, जिसे बाद में तांबे (Copper) से बदल दिया गया।
  • त्रिशूल और पूर्ण कुंभ का आकार: यदि इस कलश की बनावट को ध्यान से देखा जाए, तो यह पारंपरिक इस्लामी ‘चाँद-तारे’ (Crescent and Star) की आकृति से बिल्कुल अलग है। यह एक उलटे रखे हुए कमल के ऊपर ‘पूर्ण कलश’ (Amrita Kalasha) और उसके ऊपर एक उर्ध्वगामी त्रिशूल (Trident) जैसी आकृति है। त्रिशूल सीधे तौर पर भगवान शिव का मुख्य आयुध है।
  • कलश का रेखाचित्र (Ground Inscription): ताजमहल के पूर्वी प्रांगण (Courtyard) की फर्श पर इस विशाल कलश का एक वास्तविक आकार का रेखाचित्र चूने के पत्थरों से उकेरा गया है। हिंदू शोधकर्ताओं के अनुसार, इस रेखाचित्र को ध्यान से देखने पर नारियल की आकृति, आम के पत्ते और शिव मंदिर के ‘गगनचुम्बी त्रिशूल’ की रूपरेखा साफ दिखाई देती है।


२. अदालती लड़ाई में ‘पुस्तकों के सबूत’ और गवाहियाँ (Book Evidences & Testimonies)

अदालती कार्यवाहियों में केवल स्थापत्य का ही हवाला नहीं दिया गया, बल्कि दोनों पक्षों की ओर से कई ऐतिहासिक पुस्तकों को बतौर सबूत (Documentary Evidence) और विशेषज्ञों की गवाहियों को दर्ज कराया गया है:

क) हिंदू पक्ष (वादी) द्वारा पेश की गई पुस्तकें

  • “Taj Mahal: The True Story” (लेखक: पी. एन. ओक): इस किताब में ओक ने १०० से अधिक ऐसे संरचनात्मक और भाषाई तर्क दिए हैं जो ताजमहल को शिव मंदिर (तेजो महालय) सिद्ध करते हैं।
  • कछवाहा इतिहास ग्रंथ: जयपुर राजघराने के गुप्त अभिलेखों (पोथियों) और कछवाहा राजपूतों के इतिहास पर लिखी किताबों को कोर्ट में यह साबित करने के लिए पेश किया गया है कि राजा मानसिंह और राजा जयसिंह के समय यहाँ एक भव्य इमारत और बाग था, जिसे शाहजहाँ ने अधिगृहीत किया था।

ख) मुस्लिम पक्ष और एएसआई (प्रतिवादी) द्वारा पेश की गई पुस्तकें

विपक्ष ने यह साबित करने के लिए कि यह केवल एक मुगल मकबरा है, शाहजहाँ के समकालीन इतिहासकारों के तीन ग्रंथों को मुख्य सबूत बनाया है:
  1. “पादशाहनामा / बादशाहनामा” (अब्दुल हमीद लाहौरी): शाहजहाँ का आधिकारिक इतिहास।
  2. “अमल-ए-सालिह” (मुहम्मद सालेह कंबोह): शाहजहाँ के काल का एक और प्रामाणिक दरबारी ग्रंथ, जिसमें ताजमहल के निर्माण, सामग्री और खर्च का विस्तृत लेखा-जोखा है।
  3. “शाहजहाँनामा” (इनायत खान): इस पुस्तक को भी यह साबित करने के लिए पेश किया गया कि मुमताज की मृत्यु के बाद शाहजहाँ ने इस मकबरे का निर्माण अपनी देखरेख में कराया था।

ग) इतिहासकारों और विशेषज्ञों की गवाहियाँ (Expert Opinions)

  • ASI के विशेषज्ञों का बयान: एएसआई के पूर्व निदेशकों और पुरातत्वविदों ने अदालतों में लिखित गवाही दी है कि ताजमहल के निर्माण के दौरान जो वास्तुकला (जैसे पिएट्रा ड्यूरा या संगमरमर पर महीन नक्काशी) इस्तेमाल हुई है, वह विशुद्ध रूप से १७वीं सदी की मुगल शैली की है, जो दिल्ली में हुमायूं के मकबरे से मेल खाती है।
  • हिंदू पक्ष के गवाहों का मत: इसके विपरीत, हिंदू पक्षकारों ने कुछ ऐसे स्वतंत्र स्थापत्य विशेषज्ञों (Architects) की गवाहियाँ दर्ज कराई हैं जिन्होंने ताजमहल के बंद कमरों के वेंटिलेशन और बलुआ पत्थर की दीवारों की पुरानी राजपूत शैली की वास्तुकला का अध्ययन किया था। उनका मानना है कि मकबरों की नींव इस तरह नहीं रखी जाती।


३. सांस्कृतिक प्रभाव: फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ (२०२५) का विवाद

ताजमहल के इस मंदिर बनाम मकबरा विवाद की गूँज सिनेमाई पटल पर भी सुनाई दी।
  • फिल्म का विवरण: साल २०२५ के उत्तरार्ध में रिलीज हुई हिंदी फिल्म “द ताज स्टोरी” (The Taj Story) पूरी तरह इसी विवाद पर आधारित एक कोर्टरूम ड्रामा है।
  • मुख्य भूमिका: इसमें दिग्गज अभिनेता परेश रावल ने मुख्य भूमिका निभाई है। उन्होंने ‘विष्णु दास’ नाम के एक स्थानीय गाइड का किरदार निभाया है, जो ताजमहल के वास्तविक इतिहास को जानने और उसके बंद कमरों का सच सामने लाने के लिए एक कानूनी लड़ाई (कोर्ट केस) शुरू करता है।
  • विवाद: फिल्म के मोशन पोस्टर में ताजमहल के मुख्य सफेद गुंबद के नीचे से भगवान शिव की मूर्ति (शिवलिंग) के प्रकट होने का दृश्य दिखाया गया था। इस पर भारी सामाजिक विवाद हुआ और इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई थी, जिसमें फिल्म पर इतिहास से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया गया। बाद में मेकर्स ने डिस्क्लेमर जारी कर स्पष्ट किया कि यह फिल्म केवल अदालती तर्कों पर आधारित एक रचनात्मक प्रस्तुति है।


४. क्लोजिंग स्टेटमेंट: इस महा-विवाद का कानूनी भविष्य

ताजमहल को ‘तेजो महालय’ शिव मंदिर घोषित करने की कानूनी लड़ाई अब अपने सबसे निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को जारी किए गए नोटिस के बाद अब यह मामला पूरी तरह से वैज्ञानिक साक्ष्यों पर टिक गया है।
अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मामले और वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर की तर्ज पर, आने वाले समय में अदालत ताजमहल के बंद २२ कमरों और उसके आधारभूत ढांचे का जीपीआर (Ground Penetrating Radar) सर्वेक्षण करने का आदेश दे सकती है। बिना किसी तोड़-फोड़ के की जाने वाली यह आधुनिक वैज्ञानिक जांच ही इस सदियों पुराने इतिहास का अंतिम सत्य सामने ला पाएगी।
ताजमहल केवल सफ़ेद संगमरमर की एक खूबसूरत इमारत नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के दो अलग-अलग कालखंडों, संस्कृतियों और आस्थाओं का महा-संगम और टकराव है। जहाँ एक तरफ दुनिया इसे मुगलों के प्रेम का प्रतीक मानती है, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों हिंदुओं की आस्था इसे ‘भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर’ का पवित्र स्थान मानती है। न्यायपालिका का आगामी रुख ही तय करेगा कि दुनिया के इस अजूबे का वास्तविक इतिहास क्या लिखा जाएगा।

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