अयोध्या राम मंदिर की न्यायिक और ऐतिहासिक यात्रा: भाग-५ (अंतिम भाग) – सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और भव्य प्राण-प्रतिष्ठा
(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का पाँचवाँ और अंतिम भाग है। पिछले चार भागों में हमने त्रेतायुग से मुगल काल, ब्रिटिश दौर की कानूनी शुरुआत, १९९२ का घटनाक्रम और २००३ के एएसआई सर्वेक्षण के अकाट्य साक्ष्यों को समझा था। इस अंतिम भाग में हम देश की सर्वोच्च अदालत की मैराथन सुनवाई, ऐतिहासिक सर्वसम्मत फैसले और सदियों पुराने संकल्प की सिद्धि का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत करेंगे।)
वर्ष २००३ में पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट आने के बाद भी इस मामले को अंतिम निर्णय तक पहुँचने में डेढ़ दशक से अधिक का समय लग गया। सितंबर २०१० में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को तीन बराबर भागों (रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड) में बांटने का आदेश दिया था। लेकिन यह फैसला किसी भी पक्ष को मंजूर नहीं था, क्योंकि हिंदू पक्षकार भगवान राम के वास्तविक जन्मस्थान का कोई विभाजन नहीं चाहते थे। अंततः यह महा-मुकदमा देश की सबसे बड़ी अदालत—सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुँचा।
आइए इस अंतिम भाग में सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक सुनवाई, फैसले की बारीकियों और २०२४ में हुए नव-निर्माण के गौरवशाली क्षणों को विस्तार से समझते हैं।
१. सुप्रीम कोर्ट की ४० दिनों की ऐतिहासिक मैराथन सुनवाई
वर्ष २०१९ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील और दशकों पुराने मामले को हमेशा के लिए सुलझाने का दृढ़ संकल्प लिया।
- संवैधानिक पीठ का गठन: मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ५ जजों की एक विशेष संवैधानिक पीठ (Constitutional Bench) बनाई गई। इस पीठ में CJI रंजन गोगोई, जस्टिस एस. ए. बोबडे, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर शामिल थे।
- ४० दिनों की लगातार सुनवाई: ६ अगस्त २०१९ से १६ अक्टूबर २०१९ तक, सुप्रीम कोर्ट ने बिना रुके लगातार ४० दिनों तक मैराथन सुनवाई की। देश के इतिहास में यह दूसरी सबसे लंबी चलने वाली अदालती सुनवाई थी। हिंदू पक्षकारों की ओर से के. परासरन और हरिशंकर जैन जैसे दिग्गज वकीलों ने अकाट्य राजस्व रिकॉर्ड, इतिहास ग्रन्थ और एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट को कोर्ट के सामने रखा।
२. ९ नवंबर २०१९: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक और सर्वसम्मत फैसला
शनिवार, ९ नवंबर २०१९ की सुबह भारत के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। सुप्रीम कोर्ट के पाँचों जजों ने बिना किसी मतभेद के, सर्वसम्मति (५-०) से एक ऐतिहासिक और संतुलित फैसला सुनाया :
- रामलला विराजमान को मिला मालिकाना हक: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विवादित स्थल का बाहरी और भीतरी अहाता पूरी तरह से एक ही इकाई है। अदालत ने पूरी २.७७ एकड़ की विवादित भूमि का मालिकाना हक ‘भगवान श्री रामलला विराजमान’ (कानूनी रूप से नाबालिग इकाई) को सौंप दिया।
- ट्रस्ट निर्माण का आदेश: केंद्र सरकार को आदेश दिया गया कि वह तीन महीने के भीतर एक विशेष ट्रस्ट का गठन करे, जो वहां भव्य राम मंदिर के निर्माण की रूपरेखा तैयार करे। इसी आदेश के तहत ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ का गठन हुआ।
- मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक भूमि: न्याय और संतुलन बनाए रखने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद १४२ के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग किया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि मस्जिद के निर्माण के लिए मुस्लिम पक्ष (सुन्नी वक्फ बोर्ड) को अयोध्या में ही किसी अन्य प्रमुख स्थान पर ५ एकड़ की वैकल्पिक जमीन आवंटित की जाए।
- एएसआई की रिपोर्ट पर मुहर: कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि बाबरी ढांचे का निर्माण किसी खाली जमीन पर नहीं हुआ था, बल्कि उसके नीचे एक विशाल प्राचीन गैर-इस्लामिक (हिंदू मंदिर) संरचना मौजूद थी, जैसा कि एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे में साबित हुआ था।
[ ९ नवंबर २०१९: सुप्रीम कोर्ट का सर्वसम्मत फैसला ]
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[ हिंदू पक्ष (रामलला विराजमान) ] [ मुस्लिम पक्ष (सुन्नी वक्फ बोर्ड) ]
• पूरी २.७७ एकड़ भूमि पर मालिकाना हक। • विवादित स्थल पर दावा खारिज।
• 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' का गठन। • अयोध्या में ही ५ एकड़ की वैकल्पिक जमीन।
• भव्य मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त। • सामाजिक सौहार्द और संतुलन की मिसाल।
३. २२ जनवरी २०२४: भव्य राम मंदिर की ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ और संकल्प की सिद्धि
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मंदिर निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर शुरू हुआ। देश-विदेश के करोड़ों राम भक्तों ने स्वेच्छा से इस भव्य कार्य के लिए दान दिया। लार्सन एंड टुब्रो (L&T) जैसी शीर्ष कंपनी और देश के बेहतरीन शिल्पकारों ने बिना लोहे (Iron-free structure) के, शुद्ध पत्थरों से नागर शैली (Nagara Style) में इस भव्य मंदिर को आकार दिया, जो आने वाले हजारों वर्षों तक अडिग रहेगा।
- ऐतिहासिक क्षण: ५०० वर्षों के लंबे इंतजार, अनगिनत संघर्षों और सैकड़ों कानूनी लड़ाइयों के बाद अंततः २२ जनवरी २०२४ का वह पावन दिन आया।
- रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संतों, आचार्यों और समाज के हर वर्ग के प्रतिनिधियों की गरिमामयी उपस्थिति में नवनिर्मित गर्भगृह में भगवान श्री राम के ५ वर्ष के बाल स्वरूप की श्यामवर्णी दिव्य मूर्ति की ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ पूरी धार्मिक मर्यादा के साथ संपन्न हुई। इसी के साथ टेंट में विराजमान रामलला अपने भव्य और स्थाई राजमहल में स्थापित हो गए।
श्रृंखला का तार्किक निष्कर्ष (Closing Statement)
अयोध्या राम मंदिर की यह पूरी यात्रा इस बात का साक्षात प्रमाण है कि सत्य को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है, लेकिन उसे कभी पराजित नहीं किया जा सकता। सन १५२८ में मीर बाकी की तोपों से शुरू हुआ यह विवाद तलवारों, लाठियों और गोलियों से होता हुआ भारत के संविधान और न्यायपालिका के गलियारों तक पहुँचा। यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी न्यायिक विजय है, जिसने बिना किसी हिंसा या कटुता के, पूरी तरह वैधानिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर देश के एक बहुत बड़े ऐतिहासिक घाव को हमेशा के लिए भर दिया। आज अयोध्या का यह भव्य मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था, धैर्य और राष्ट्रीय एकता का सबसे चमकता हुआ प्रतीक है।