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अयोध्या राम मंदिर की न्यायिक और ऐतिहासिक यात्रा: भाग-४ (एएसआई का वह वैज्ञानिक सर्वे जिसने कोर्ट में रुख बदल दिया)

 

(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का चौथा भाग है। पिछले तीन भागों में हमने प्राचीन इतिहास, ब्रिटिश काल की कानूनी शुरुआत, राम मंदिर आंदोलन और ६ दिसंबर १९९२ को विवादित ढांचा ढहने के घटनाक्रम को समझा था। इस भाग में हम उस वैज्ञानिक और पुरातात्विक साक्ष्य का विश्लेषण करेंगे जिसने इस पूरे मुकदमे की दिशा बदल दी और अदालत के सामने अकाट्य सत्य प्रस्तुत किया।)
६ दिसंबर १९९२ को विवादित ढांचा ढहने के बाद, राम जन्मभूमि की कानूनी लड़ाई पूरी तरह से वैज्ञानिक और पुरातात्विक साक्ष्यों (Archaeological Evidences) पर टिक गई थी। अब अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या १५२८ में मीर बाकी द्वारा बनाई गई इमारत किसी खाली जमीन पर खड़ी थी, या उसे किसी पहले से मौजूद विशाल हिंदू मंदिर को तोड़कर या उसके अवशेषों पर बनाया गया था?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश की सबसे प्रामाणिक संस्था—भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को जिम्मेदारी सौंपी। आइए इस भाग में एएसआई के उस ऐतिहासिक उत्खनन (Excavation) और उसके निष्कर्षों को विस्तार से समझते हैं।

१. हाईकोर्ट का आदेश और एएसआई (ASI) की खुदाई (वर्ष २००३)

वर्ष २००२ में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में इस भूमि विवाद की दैनिक सुनवाई चल रही थी। कोर्ट ने मामले की वैज्ञानिक सच्चाई जानने के लिए जीपीआर (Ground Penetrating Radar) सर्वे की रिपोर्ट देखने के बाद, मार्च २००३ में एएसआई को विवादित स्थल पर व्यापक खुदाई और पुरातात्विक सर्वेक्षण करने का ऐतिहासिक आदेश दिया।
  • एक निष्पक्ष और पारदर्शी टीम: एएसआई ने इस संवेदनशील कार्य के लिए जाने-माने पुरातत्वविदों की एक संयुक्त टीम बनाई, जिसका नेतृत्व बी. आर. मनी कर रहे थे। निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए टीम में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के विशेषज्ञों, गवाहों और मजदूरों को शामिल किया गया था।
  • खुदाई का पैमाना: मार्च से अगस्त २००३ के बीच, एएसआई ने विवादित स्थल और उसके आसपास के कुल ९० से अधिक गड्ढों (Trenches) की गहरी खुदाई की। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी धार्मिक स्थल पर किया गया सबसे बड़ा और सबसे गहन पुरातात्विक उत्खनन था।

                  [ इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश (२००३) ]
                                    │
                  (ASI द्वारा ९० से अधिक गड्ढों की खुदाई)
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                [ ज़मीन के नीचे दबे ५ सांस्कृतिक कालक्रम ]
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      [ ऊपरी परत का ढांचा ]                     [ निचली परत के अवशेष ]
• १६वीं सदी की बाबरी मस्जिद।               • १०वीं से १२वीं सदी का विशाल मंदिर।
• मंदिर के मलबे पर टिकी दीवारें।            • कसौटी के खंभे और गोलाकार मंदिर की नींव।


२. खुदाई में मिले अकाट्य हिंदू प्रतीक और अवशेष

लगभग 5 महीनों की कड़ी मेहनत और ज़मीन के कई फीट नीचे जाने के बाद, एएसआई की टीम को इतिहास की कई परतें मिलीं। इस खुदाई में उत्तर संवर्धन काल (Early Medieval Period) यानी १०वीं से १२वीं शताब्दी के बीच की एक बेहद विशाल और भव्य संरचना के अवशेष प्राप्त हुए।
एएसआई ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में निम्नलिखित महत्वपूर्ण निष्कर्ष और साक्ष्य अदालत के सामने रखे:

क) ५० से अधिक विशाल खंभों के आधार (Pillar Bases)

खुदाई के दौरान ज़मीन के नीचे ईंटों और पत्थरों से बने 50 से अधिक स्तंभों के आधार (Pillar Bases) एक कतारबद्ध और व्यवस्थित नक्शे में मिले। ये आधार दर्शाते थे कि यहाँ एक बहुत बड़ी बहु-स्तंभित (Multi-pillared) इमारत खड़ी थी, जिसका क्षेत्रफल किसी सामान्य रिहायशी इमारत या मस्जिद से कहीं अधिक विशाल था।

ख) कसौटी के खंभे और नक्काशी

खुदाई में काले कसौटी के पत्थरों (Touchstone) के वे हिस्से और नक्काशीदार टुकड़े मिले, जिनका वर्णन सदियों से हिंदू ग्रंथों और यात्रियों के वृत्तांतों में किया जा रहा था। इन पत्थरों पर कमल के फूल (Lotus Motifs), मांगलिक कलश, और कीर्तिमुख उकेरे गए थे, जो शुद्ध रूप से हिंदू मंदिर वास्तुकला के अनिवार्य अंग हैं।

ग) मगरमच्छ के मुख वाले तोरण द्वार (Devi-Devata Figures)

मलबे की निचली परतों से टेराकोटा (पकी मिट्टी) की कई ऐसी कलाकृतियाँ और मूर्तियाँ मिलीं, जिनमें देवी-देवताओं, इंसानी आकृतियों और मगरमच्छ के मुख वाले तोरण द्वार (Makara Pranala) के अवशेष शामिल थे। चूंकि इस्लामिक वास्तुकला में धार्मिक स्थलों के भीतर इंसानों या जानवरों की आकृतियों का निर्माण पूरी तरह वर्जित है, यह साक्ष्य इस बात का अकाट्य प्रमाण बना कि यह ढांचा गैर-इस्लामिक था।

घ) विशाल गोलाकार मंदिर की नींव (Circular Shrine)

खुदाई में सबसे नीचे की परत में १०वीं शताब्दी (कलचुरी या गढ़वाल काल) के एक विशाल गोलाकार मंदिर की नींव और चबूतरा मिला, जिसके ऊपर बाद में राजा विक्रमादित्य के काल में भव्य संरचना खड़ी की गई थी।

३. एएसआई (ASI) की अंतिम रिपोर्ट का अदालती महत्व

अगस्त २००३ में एएसआई ने अपनी कई सौ पन्नों की विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट को सौंप दी। रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष बेहद स्पष्ट और सीधा था:
“बाबरी ढांचे के ठीक नीचे एक अत्यंत विशाल और प्राचीन (१०वीं से १२वीं सदी की) गैर-इस्लामिक हिंदू धार्मिक संरचना मौजूद थी। १६वीं शताब्दी में बना विवादित ढांचा इसी पहले से मौजूद हिंदू इमारत के मलबे, खंभों और दीवारों के आधार का उपयोग करके बनाया गया था।”

हालांकि, मुस्लिम पक्षकारों और कुछ वामपंथी इतिहासकारों (जैसे इरफान हबीब व अन्य) ने एएसआई की इस रिपोर्ट पर सवाल उठाने का प्रयास किया और इसे एकतरफा बताया। लेकिन हाईकोर्ट और आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई की इस वैज्ञानिक रिपोर्ट को पूरी तरह प्रामाणिक और निष्पक्ष माना, क्योंकि इसमें रेडियोकार्बन डेटिंग और आधुनिक पुरातात्विक पद्धतियों का उपयोग किया गया था।

भाग-४ का निष्कर्ष

एएसआई के इस वैज्ञानिक सर्वे ने राम जन्मभूमि विवाद के पूरे नैरेटिव (विमर्श) को बदल दिया। अब यह केवल आस्था या मान्यताओं की लड़ाई नहीं रह गई थी, बल्कि विज्ञान और जमीन के भीतर से निकले पत्थरों ने यह गवाही दे दी थी कि विवादित ढांचे के नीचे वास्तव में भगवान श्री राम का एक भव्य मंदिर मौजूद था। इसी वैज्ञानिक रिपोर्ट को आधार बनाकर आगे चलकर देश की सर्वोच्च अदालत ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

अगले और अंतिम भाग की ओर:

इस श्रृंखला के भाग-५ (अंतिम भाग) में हम चर्चा करेंगे—“सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला (२०१९) और भव्य मंदिर का निर्माण (२०२४)” हम जानेंगे कि कैसे ९ नवंबर २०१९ को ५ जजों की संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से हिंदू पक्ष के हक में फैसला सुनाया, मस्जिद के लिए ५ एकड़ ज़मीन देने का आदेश दिया, और २२ जनवरी २०२४ को हुई भव्य ‘प्राण प्रतिष्ठा’ के साथ यह सदियों पुराना संघर्ष हमेशा के लिए अमर हो गया।
https://shoot2pen.in/author-ashwini-rai-arun/article/ayodhya-ram-mandir-history-part-5-supreme-court-verdict-pran-pratishtha/

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