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अयोध्या राम मंदिर की न्यायिक और ऐतिहासिक यात्रा: भाग-२ (ब्रिटिश काल की कानूनी लड़ाई और १९४९ का घटनाक्रम)

(नोट: यह इस विशेष श्रृंखला का दूसरा भाग है। पहले भाग में हमने त्रेतायुग से गुप्तवंश तक अयोध्या के प्राचीन वैभव, सम्राट विक्रमादित्य द्वारा कराए गए जीर्णोद्धार और सन 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी द्वारा किए गए विध्वंस का विश्लेषण किया था। इस भाग में हम कानूनी दस्तावेजों की शुरुआत, ब्रिटिश नीति और १९४९ की उस रात की कहानी जानेंगे जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।)
सन १५२८ के विध्वंस के बाद भी हिंदू समाज ने प्रभु श्री राम की जन्मभूमि पर अपनी आस्था और उपस्थिति को कभी कम नहीं होने दिया। समय बदला और देश की सत्ता मुगलों के हाथों से निकलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर ब्रिटिश क्राउन के पास चली गई। अंग्रेजों के आते ही यह सदियों पुराना संघर्ष हथियारों के साथ-साथ आधुनिक अदालती कागजों और कानूनी बहसों के पन्नों में भी दर्ज होने लगा।
इस दूसरे भाग में हम ब्रिटिश काल के पहले कानूनी मुकदमे और सन १९४९ की उस ऐतिहासिक घटना को सिलसिलेवार तरीके से समझेंगे जिसने स्वतंत्र भारत में इस आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ दिया।

१. सन १८५८: निहंग सिखों का आगमन और पहला आधिकारिक रिकॉर्ड

ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार, इस परिसर को लेकर पहला लिखित और आधिकारिक विवाद नवंबर १८५८ में दर्ज हुआ था। यह घटना इतिहास के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साबित करती है कि सिख समुदाय भी इस स्थान को एक पवित्र हिंदू मंदिर ही मानता था।
  • निहंग बाबा फकीर सिंह की कार्रवाई: २८ नवंबर १८५८ को पंजाब के निहंग सिखों के एक समूह ने बाबा फकीर सिंह खालसा के नेतृत्व में विवादित परिसर के भीतर प्रवेश किया। उन्होंने न केवल वहां कब्जा किया, बल्कि परिसर के भीतर चबूतरे पर एक ‘हवन’ और पूजा-अर्चना भी शुरू कर दी।
  • पहला पुलिस रिकॉर्ड (FIR): इस घटना के बाद अवध के तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन ने सिखों के खिलाफ एक आधिकारिक रिपोर्ट दर्ज की। यह पहला ऐसा सरकारी दस्तावेज बना, जिसमें हिंदुओं/सिखों द्वारा जन्मभूमि पर निरंतर दावा करने की बात कानूनी रूप से प्रमाणित हुई।


२. ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप और ‘बाड़’ (Fencing) का निर्माण (१८५९)

१८५८ की घटना के बाद हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच तनाव लगातार बढ़ने लगा। स्थिति को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सन १८५९ में एक दमनकारी लेकिन ऐतिहासिक विभाजनकारी नीति अपनाई:
  • परिसर का भौतिक विभाजन: अंग्रेजों ने विवादित स्थल के चारों ओर लोहे की एक मजबूत बाड़ (Fencing) खड़ी कर दी।
  • भीतरी और बाहरी हिस्सा: बाड़ के भीतर का हिस्सा (मुख्य गुंबद वाला भाग) मुस्लिम समुदाय को नमाज पढ़ने के लिए दे दिया गया। वहीं, बाड़ के ठीक बाहर स्थित ‘राम चबूतरा’ और ‘सीता की रसोई’ का हिस्सा हिंदू भक्तों को पूजा-अर्चना के लिए सौंप दिया गया। हिंदू पक्ष इस विभाजन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं था, लेकिन उन्होंने जन्मभूमि के स्पर्श और दूर से दर्शन की परंपरा को जारी रखा।

                        [ संपूर्ण विवादित परिसर ]
                                    │
                    (सन 1859: ब्रिटिश सरकार द्वारा विभाजन)
                                    │
              ┌─────────────────────┴─────────────────────┐
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   [ बाड़ के भीतर का हिस्सा ]                  [ बाड़ के बाहर का हिस्सा ]
 • मुख्य गुंबददार ढांचा।                     • 'राम चबूतरा' और 'सीता की रसोई'।
 • मुस्लिमों को नमाज की अनुमति।               • हिंदुओं को अनवरत पूजा की अनुमति।


३. सन १८८५: महंत रघुवर दास का पहला दीवानी मुकदमा (Civil Suit)

इस पूरे विवाद को पहली बार अदालत के दरवाजे तक ले जाने का श्रेय महंत रघुवर दास को जाता है। जनवरी १८८५ में उन्होंने फैजाबाद के सब-जज की अदालत में एक दीवानी मुकदमा दायर किया।
  • मांग क्या थी?: महंत रघुवर दास ने मांग की कि चूंकि ‘राम चबूतरा’ हिंदुओं का पवित्र पूजा स्थल है, इसलिए उन्हें वहां एक छोटा लेकिन पक्का मंदिर (राम मंदिर) बनाने और उसके ऊपर छत डालने की अनुमति दी जाए।
  • अदालत का फैसला: ब्रिटिश जज पंडित हरि किशन ने माना कि वह स्थान हिंदुओं के लिए बेहद पवित्र है, लेकिन कानून-व्यवस्था बिगड़ने के डर से उन्होंने वहां किसी भी नए निर्माण की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद जिला अदालत और कमिश्नर कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इस प्रकार, ब्रिटिश काल में यह मामला जस का तस बना रहा।


४. २२-२३ दिसंबर १९४९ की रात: जब प्रकट हुए ‘रामलला विराजमान’

१५ अगस्त १९४७ को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन विभाजन के दर्द और दंगों के बीच अयोध्या का मामला शांत रहा। लेकिन आज़ादी के ठीक दो साल बाद, २२ और २३ दिसंबर १९४९ की दरमियानी रात को एक ऐसी घटना घटी जिसने इस पूरे विवाद के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। 

घटनाक्रम का सच

कड़ाके की ठंड की उस रात को विवादित ढांचे के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे (केंद्रीय कक्ष में) अचानक भगवान श्री राम के बाल स्वरूप यानी ‘रामलला’ की एक छोटी सी मूर्ति प्रकट हो गई।
  • भक्तों का दावा: सुबह होते ही यह खबर पूरी अयोध्या और देश में आग की तरह फैल गई कि भगवान रामलला स्वयं अपनी जन्मभूमि पर प्रकट (Pr प्रकट) हो गए हैं। हजारों की संख्या में श्रद्धालु वहां जमा हो गए और कीर्तन-भजन शुरू हो गया।
  • प्रशासनिक रिपोर्ट: तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट (DM) के. के. नायर और नगर मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह ने इस घटना की सूचना उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को दी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मूर्ति को तुरंत वहां से हटाने का आदेश दिया, लेकिन डीएम के. के. नायर ने यह कहते हुए इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया कि मूर्ति हटाने से अयोध्या में भयंकर सांप्रदायिक दंगे भड़क सकते हैं।

कोर्ट का ताला और रिसीवर की नियुक्ति

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए फैजाबाद प्रशासन ने धारा १४५ के तहत विवादित परिसर को कुर्क (Attach) कर लिया।
  • तालाबंदी: मुख्य द्वारों पर लोहे के बड़े-बड़े ताले लगा दिए गए।
  • रिसीवर (Receiver) की नियुक्ति: नगरपालिका के अध्यक्ष प्रियदत्त राम को इस परिसर का आधिकारिक रिसीवर बनाया गया। अदालत ने आदेश दिया कि आम जनता अंदर नहीं जा सकेगी, लेकिन एक पुजारी को प्रतिदिन अंदर जाकर रामलला को भोग लगाने और सुबह-शाम की आरती करने की विशेष अनुमति दी जाएगी।


भाग-२ का निष्कर्ष

दिसंबर १९४९ की घटना ने इस विवाद को एक नया मोड़ दे दिया। अब वह स्थान केवल एक खाली विवादित ढांचा नहीं था, बल्कि वह कानूनी और धार्मिक रूप से “भगवान श्री रामलला विराजमान” का घर बन चुका था। यहाँ से ब्रिटिश काल की ढुलमुल नीतियां समाप्त हुईं और स्वतंत्र भारत की अदालतों में मुकदमों का एक लंबा दौर शुरू हुआ, जो अंततः २०१९ में सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। 

अगले भाग की ओर:
इस श्रृंखला के भाग-३ में हम चर्चा करेंगे—“राम मंदिर आंदोलन और ६ दिसंबर १९९२ का घटनाक्रम” हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे १९८० के दशक में विश्व हिंदू परिषद (VHP) और भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी द्वारा शुरू की गई ‘रथ यात्रा’ ने इसे एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बना दिया, और ६ दिसंबर १९९२ को विवादित ढांचे के ढहने की पूरी ऐतिहासिक कहानी क्या थी।

 

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