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हसरत भरी नजर
हसरत भरी नजर से देखा,
मुझे मिठाइयाँ खरीदते हुए।
फ़ुरसत न थी तब,
जब वह मिला मुझे।
दीये की रोशनी में
अनायास ही फिर,
गरीबी को ओढ़े हुए
वह नजर आया मुझे।
छत की ओर ताकते हुए,
खुद से खुद को छुपाते हुए।
अपनी किस्मत को छुपाते हुए,
रोशनी से खुद को छलाते हुए।
मैंने पूछा तुझे क्या चाहिए?
‘ना’ में सर को हिलाते हुए,
अपने जमीर को जगाते हुए,
जगमगाती रोशनी के दूसरे पहलू से,
आज उसने मिलाया मुझे।